कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विद्यया=ज्ञानके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत् एव=दूसरा ही फल, आहुः=बतलाते हैं ( और ) अविद्यया=कर्मके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत्=दूसरा ( ही ) फल, आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; ( हमने ) धीराणाम्=( उन ) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम=वचन सुने हैं, ये=जिन्होंने; नः=हमें, तत्=उस विषयको, विचचक्षिरे=व्याख्या करके भली- भाँति समझाया था ॥ १० ॥ व्याख्या-सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है-नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाश- शील अनित्य इहलौकिक और पारलौकिक भोगसामग्रियो और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमित पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमे अखण्ड संलग्नता । इसके अनुष्ठानमे परब्रह्म पुरुषोत्तमका यथार्थ ज्ञान होता है और उसके अनन्तर उनकी प्राप्ति होती है ( गीता १८ । ४९-५५ ) । ज्ञानाभिमानमे रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है-कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग द्वेष और फलकामनाका अभाव एव अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्-सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन । इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष- शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है । सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १० ॥ सम्बन्ध-अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं- विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥ यः=जो मनुष्य, तत् उभयम्=उन दोनोंको, ( अर्थात् ) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको, च=और, अविद्याम्= कर्मके तत्त्वको, च=भी, सह=साथ-साथ, वेद=यथार्थतः जान लेता है, अविद्यया=( वह ) कर्मोंके अनुष्ठानसे, मृत्युम्= मृत्युको, तीर्त्वा=पार करके, विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे, अमृतम्=अमृतको, अश्नुते=भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमे बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते ह ( गीता ४। १६) । इसी कारण कर्म-रहस्यसे अनभिज्ञ ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हे और अपने वर्णा- श्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते है, परंतु इस प्रकारके त्यागसे उन्हें त्यागका यथार्थ फल-कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८।८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मावस्था-नैष्कर्म्य) का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते है। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरणमे प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमे अपने दुर्लभ मानव- जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं। इन दोनो प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथा- योग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा राग-द्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त