कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड चेतन दोनोंसे ही भिन्न है-जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य जड-वर्ग (क्षर) से तो वह सर्वथा भिन्न है और इस जड-वर्गको जाननेवाले परंतु स्वय जाननेमे न आनेवाले जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम है। ऐसी स्थितिमें उसके स्वरूपतत्त्वको वाणीके द्वारा व्यक्त करना कदापि सम्भव नहीं है। इसीसे उसको समझानेके लिये सकेतका ही आश्रय लेना पड़ता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध-अब उसी ब्रह्मको प्रश्नोंके अनुसार पुन' पाँच मन्त्रोंमें समझाते हैं— यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥ यत्=जो, वाचा=वाणीके द्वारा, अनभ्युदितम्=नहीं बतलाया गया है, [अपि तु=बल्कि,] येन=जिससे, वाक्=वाणी, अभ्युद्यते=बोली जाती है अर्थात् जिसकी शक्तिसे वक्ता बोलनेमे समर्थ होता है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि= जान, इदम् यत्=वाणीके द्वारा बतानेमे आनेवाले जिस तत्त्वकी, उपासते=(लोग) उपासना करते हैं, इदम्=यह, न=ब्रह्म नहीं है ४ व्याख्या--वाणीके द्वारा जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है तथा प्राकृत वाणीसे बतलाये हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। ब्रह्मतत्त्व वाणीसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्तिके किसी अगसे वाणीमें प्रकाशित होनेकी—बोलनेकी शक्ति आयी है, जो वाणीका भी ज्ञाता, प्रेरक और प्रवर्तक है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे वाणी बोली जाती है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ४ ॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥ यत्=जिसको, (कोई भी) मनसा=मनसे (अन्तःकरणकेद्वारा ), न=नहीं, मनुते=समझ सकता, [अपि तु=बल्कि,] येन=जिससे, मनः=मन, मतम्=( मनुष्यका ) जाना हुआ हो जाता है, आहुः=ऐसा कहते हैं, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=मन और बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी, उपासते= ( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=यह, न=ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥ व्याख्या-बुद्धि और मनका जो कुछ भी विषय है, जो इनके द्वारा जाननेमे आ सकता है तथा प्राकृत मन-बुद्धिसे जाने हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर मन और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो मन-बुद्धिका ज्ञाता, उनमें मनन और निश्चय करनेकी शक्ति देनेवाला तथा मनन और निश्चय करनेमें नियुक्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अगसे बुद्धिमें निश्चय करनेकी सामर्थ्य और मनमें मनन करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रसे 'जिसकी शक्ति और प्रेरणाको पाकर मन अपने ज्ञेय पदार्थोंको जानता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ५ ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥ यत्=जिसको (कोई भी); चक्षुषा=चक्षुके द्वारा, न=नहीं, पश्यति=देख सकता, [अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे; चक्षूंषि=चक्षु, (अपने विषयोंको ) पश्यति=देखता है, तत्=उसको, एव=ही; त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान; इदम् यत्=चक्षुके द्वारा देखनेमें आनेवाले जिस दृश्यवर्गकी, उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है ॥ ६ ॥ व्याख्या-चक्षुका जो कुछ भी विषय है, जो इसके द्वारा देखने-जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत आँखोंसे देखे जानेवाले जिस पदार्थसमूहकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक रूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर चक्षु आदि इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रत्यक्ष करनेमें समर्थ होती हैं, जो इनको जाननेवाला और इन्हें अपने विषयोंको जाननेमें प्रवृत्त करनेवाला