भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 832 में से

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पृष्ठ 170

१५६ ⁘ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁘ १९३ षोढोपनिषद् २०७ सिद्धान्तसारोपनिषद् १९४ सङ्कर्षणोपनिषद् २०८ सीतोपनिषद् १९५ सदानन्दोपनिषद् २०९. सुदर्शनोपनिषद् १९६ सन्न्यासोपनिषद् २१०. सुबालोपनिषद् १९७. सन्यासोपनिषद् ( अध्यायात्मक ) २११ सुमुख्युपनिषद् १९८ ,, ( वाक्यात्मक ) २१२ सूर्यनारायणोपनिषद् १९९ सरस्वतीरहस्योपनिषद् २१३. सूर्योपनिषद् २०० सर्वसारोपनिषद् ( सर्वोप० ) २१४ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् २०१. स ह वै उपनिषद् २१५ स्कन्दोपनिषद् २०२ सहितोपनिषद् २१६. स्वसंवेद्योपनिषद् २०३ सामरहस्योपनिषद् २१७. हयग्रीवोपनिषद् २०४ सावित्र्युपनिषद् २१८ हंसषोढोपनिषद् २०५. सिद्धान्तविष्ठलोपनिषद् २१९. हंसोपनिषद् २०६ सिद्धान्तशिखोपनिषद् २२०. हेरम्बोपनिषद् उपनिषद् हिंदू-जातिके प्राण हैं ( लेखक—भक्त रामशरणदासजी ) उपनिषद् हिंदू-जातिके प्राण हैं । यदि हिंदू-जाति जीवित रह सकती है तो वह उपनिषदोंके द्वारा ही रह सकती है । जिस समय भारतकी प्रत्येक सन्तान उपनिषदोंकी इस शिक्षाको कि, आत्मा अमर है—कभी मरता नहीं, याद रखता था और आत्माकी अमरतामें विश्वास रखता था, उस समय वह धर्म, गौ, स्वजाति, स्वधर्म और सभ्यता-संस्कृतिकी रक्षाके लिये उल्लासके साथ मृत्युका आलिङ्गन करता था और प्राण देकर उन्हें बचाता था । इस प्रकार वह हिंदूधर्मकी पंताकाको शानसे फहराता था, कभी झुकने नहीं देता था । यवनकालमे हजारों-लाखों क्षत्रियोंने धर्मरक्षा, चोटी जनेऊकी रक्षा- के लिये सिर दे दिये । श्रीगुरुगोविन्दसिंहजीके लाल दीवारोमे हँसते हँसते चुने गये । मतीराम आरेसे चीरे जानेपर भी हँसते रहे । बन्दावीरका मास नोचवाया गया, पर उसने उफ तक नहीं की । यह सब क्या था ? यह था उपनिषदोंकी शिक्षाका चमत्कार, जिससे आत्माकी अमरतामे विश्वास कर भारतयोंने धर्म-देशके लिये मर-मिटना सीखा था। जिस दिनसे हमने उपनिषदोंसे मुख मोड़ा और गंदे साहित्यको अपनाया, तभीसे हमारा घोर पतन हो गया । अतः यदि फिरसे भारतका और हिंदू-जातिका उत्थान करना है तो उपनिषदोंकी शरणमे आना होगा और आत्माकी अमरतामे और विश्वमे एक ही परमात्माकी व्यापकतापर विश्वास कर शरीरका मोह दूर करना होगा । महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यदेवने भी हिंदू-जातिका घोर पतन होते देख कलि- संतरणोपनिषद्का सहारा ले उसके बताये हुए महामन्त्र— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ —का जप और इसीका कीर्तन कराकर लोगोको जगाया । श्रीहरिनामके बलपर हिंदू-जातिका कल्याण कर दिखाया । कलिपावनावतार गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराजने श्रीरामनाम-महिमाको जान स्वय तो प्रभु श्रीरामका साक्षात्कार किया ही, लाखोंको श्रीरामनाम-मन्त्र देकर सन्मार्गपर लगाया और देश-धर्मकी डूबती नैयाको बचाया । इस प्रकार हिंदू-जाति जिस समय उपनिषदोंके बताये मार्गपर चलती थी, उन्नतिके शिखरपर थी और जिस दिन इसने इनसे मुख मोड़ा, इसका पतन हो गया । आज भी यदि हिंदू-जाति अपनी भूलको समझ ले और उपनिषदोंके मार्गपर चले तो इसमे तनिक भी सन्देह नहीं कि यह पुनः सच्ची उन्नतिके शिखरपर पहुँच जायगी ।

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