कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंबृहदारण्यकोपनिषद्में ऐतिहासिक अध्ययनकी सामग्री (लेखक—आचार्य वी० आर० श्रीरामचन्द्र दीक्षितार एम्० ए० )
भारतवर्षकी वास्तविक प्रतिभा यहाँके प्राचीन ऋषि- मुनियोंमें पायी जाती है। उनकी दृष्टि बड़ी दूरदर्शिनी थी । वे वस्तुओंको उनके वास्तविक रूपमे देखते थे। इन्हीं ऋषि- मुनियोंकी कृपासे वह वैदिक एव वेदान्तिक वाङ्मय उपलब्ध हुआ है, जिसे आज हम बड़ी रुचिके साथ एक निधिके रूप- मे सँजोते हैं। इस वाङ्मयमें उपनिषद् साहित्यका बहुत ऊँचा स्थान है और उसका यह गौरव न्याय्य भी है। उपनिषदोंमे बृहदारण्यकोपनिषद् एक विशेष स्थान रखता है। उपनिषदोंकी महत्ताका पार पाना दुष्कर है। उनकी गणना उस श्रेणीके साहित्यमें की जा सकती है, जिसका सृजन तब होता था, जब देशके गण्यमान्य व्यक्ति—प्रधानतया राजा तथा ऊँची श्रेणीके राजनीतिज्ञ अपने कठिन कर्मठ जीवनके बाद वन्य आश्रमोंमें चले जाते थे और मोक्षकी आकाङ्क्षासे अपने जीवनके सन्ध्याकालको भजन-ध्यानमें व्यतीत करते थे। उन आश्रमोंमें उन शिष्ट नरेशों एवं विद्वान् ब्राह्मणोंके बीच जो वार्तालाप होता था, उसे भावी सन्ततिके हितार्थ लिपिबद्ध कर लिया जाता था। उपनिषद् शब्दके वाच्यार्थ निकट उपवेशनसे ही उपनिषदोंके उद्भवकी उपर्युक्त सम्भावनाका सङ्केत मिल जाता है। उपनिषदोंके नामोंसे ही उनको जन्म देनेवाले भौगोलिक प्रदेशोंका भी सङ्केत मिलता है और यह भी पता चलता है कि सबका लक्ष्य उसी एक दुरधिगम महान् तत्त्व अर्थात् आत्म-साक्षात्कारका ही विवेचन और निर्णय करना है। उपनिषदोंमे मुख्यतया पुनर्जन्मके सिद्धान्तका प्रतिपादन हुआ है । इस सिद्धान्तका धर्म अथवा इतिहासकी अपेक्षा हिंदू-दर्शनसे अधिक सम्बन्ध है । संक्षेपमे यह सिद्धान्त हमे बतलाता है कि सभी प्राणियोंके हृदयमे एक ही परमात्माका निवास है, जो अमर और अविनाशी है। शरीरके शान्त हो जानेपर उसमे रहने- वाला देही उसको त्यागकर दूसरे शरीरमे प्रवेश कर जाता है। इसलिये वास्तवमे मृत्यु शरीरकी होती है, आत्माकी नही। इस तथ्यका अर्थात् आत्माकी अमरताका जिसको ज्ञान हो जाता है, वह जीवन-मरणके चक्करसे छूटकर ब्रह्मसे एकत्व प्राप्त कर लेता है। बृहदारण्यकका शाब्दिक अर्थ है एक विशाल वनसे सम्बन्धित । ऐसा अनुमान होता है कि किसी आत्मदर्शना- भिलाषी विद्वत्समाजने इस ग्रन्थरत्नको किसी वृहद्वनमे जन्म दिया होगा, जो प्राचीन भारतमे पर्याप्त प्रसिद्ध था । आज यह कहना सम्भव नहीं है कि वह वन कौन सा था तथा किस युगमे यह ग्रन्थ लिखा गया था। यह प्रमाणभूत वैदिक ग्रन्थ माध्यन्दिन और काण्व नामक दो शाखाओमें प्राप्त है, पर श्रीशङ्कराचार्यजीने अपनी भाष्यरचनाके लिये काण्व शाखाके पाठको ही ग्रहण किया है। यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण उपनिषदोंकी कोटिमे आता है। मधु, याज्ञवल्क्य और खिल नामसे इसके तीन खण्ड हैं। पर हम इस उपनिषद्में यत्र- तत्र प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रीपर ही विचार करेंगे। अश्वमेध प्रथम अध्यायके आरम्भमें ही अश्वमेध यज्ञका उल्लेख है । वास्तवमे प्रथम अध्यायके अन्तर्गत प्रथम खण्डका नाम ही अश्वब्राह्मण है। इसमे यज्ञीय अश्वके शरीरको यज्ञके अधिष्ठातृ देवता प्रजापतिका विराट् देह मानकर वर्णन किया गया है । अश्वमेध एक वैदिक यज्ञ है । ऊर्ध्वलोकोंमे सबसे ऊँचे ब्रह्मलोककी प्राप्ति ही इसके अनुष्ठानका उद्देश्य होता है। पर यह स्थिति नित्य नहीं है । यज्ञ करनेवालेको फिर जन्म लेना पड़ता है और आवागमनसे उसे तबतक मुक्ति नहीं मिलती, जबतक कि वह अज्ञानपर विजय पाकर ब्रह्मके साथ एकाकार नहीं हो जाता। वैदिक संहिताओंमें उल्लिखित तीन कर्म ऐसे हैं, जिनका स्वरूप राजनीतिक है। इन कर्मोंका राज्याभिषेक-संस्कारसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजसूय यज्ञके अनुष्ठानसे मनुष्य राजा बनता है। इसलिये जैसा कि मैने अपने ‘Hindu Administrative Institutions' नामक ग्रन्थमें कहा है, यह यज्ञ राजाके लिये राज्याधिकार ग्रहण सस्कार है। वाजपेय यज्ञका करनेवाला सम्राट्की पदवी प्राप्त करता है। स्मृतिकार^१ कात्यायनने राजसूयसे वाजपेय यज्ञकी श्रेष्ठता बतायी है। शतपथ ब्राह्मणमे^२ राजसूय यज्ञका विस्तृत वर्णन मिलता है। वाजपेयकी महत्ता- का वर्णन भी इस ग्रन्थमें^३ पाया जाता है। अश्वमेधका उद्देश्य भी राजनीतिक होता था। प्रत्येक प्रतापी नरेशसे यह आशा की जाती थी कि वह इस इन्द्रपद ( १ ) १५ १ १०.२, (२) ५ २, (३) ५ १. १. ८,