भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 173
  • बृहदारण्यकोपनिषद्में ऐतिहासिक अध्ययनकी सामग्री * १५९ प्रदान करनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करे । यद्यपि इस यज्ञका स्वरूप बड़ा जटिल है, फिर भी एगेलिंग (Eggeling) के शब्दोंमें यह एक राजकीय महोत्सव था। इस यज्ञके मूलका हमे कोई पता नहीं है । पर ऋग्वेदमे, यहाँतक कि पहले ही मण्डल ( १ । १६२-१६३ ) मे इसका उल्लेख मिलता है। अश्वमेधका, जिसका शतपथब्राह्मणके १३ वे खण्डमे निरूपण किया गया है, महाभारतमें भी रोचक वर्णन मिलता है। वहाँ पाण्डवोंने बड़े समारोहसे इसे किया है। उक्त इतिहास ग्रन्थमें इस प्रसङ्गके अन्तमे लिखा है 'अश्वमेध यजमानको समस्त पाप- कर्मों और दुष्कृतोंसे मुक्त कर देता है।' पर प्राय. इसका अनुष्ठान विश्व-विजय कर लेनेके उपरान्त ही होता था । दूसरे शब्दोंमें इसका यह अर्थ है कि प्राचीन हिन्दू राजा भारतवर्ष- को अपने शासनाधीन भूमण्डलका एक प्रदेश तथा अपनेको अखिल पृथ्वीका अधिपति मानते थे ।१ उपनिषदोंका प्रधान विषय ब्रह्मज्ञान है और इसको प्राप्त करनेके लिये उन विधियों और साधनोंका उल्लेख किया गया है, जिनसे हम आत्म-सम्बन्धी अपने अज्ञानको मिटाकर ब्रह्मत्व लाभ करें । प्रथम अध्यायके दूसरे खण्डका नाम अग्नि-ब्राह्मण है । इसमे अश्वमेधमे प्रयुक्त होनेवाली अग्निकी उत्पत्ति और स्वरूपका वर्णन है । यहाँ ध्यानपर भी जोर दिया गया है। जैसे यज्ञीय अश्वका प्रजापतिके रूपमे ध्यान किया जाता है, वैसे ही अग्निका भी उसी रूपमें ध्यान करना चाहिये । बृहदारण्यकोपनिषद्ने इस वैदिक अनुष्ठानको प्रत्येक सच्चे क्षत्रियके लिये विधेय बताया है । ऐतिहासिक कालमें भी पुष्यमित्र, शुङ्ग और समुद्रगुप्त आदि राजाओंने इस महान् यज्ञको किया था और इस प्रकार विजित प्रदेशोंपर अपने चक्रवर्तित्वकी प्रतिष्ठा की थी । इसका अनुष्ठान ईस्वी सन्की दसवीं शताब्दिके आसपास बद हुआ प्रतीत होता है। धर्म 'धर्म' शब्द बड़ा व्यापक और विभिन्न अर्थोंमें प्रयुक्त होता है । इससे सदाचारके विविध स्वरूपोंका बोध होता है । प्रत्येक मत एव सम्प्रदायका एक विशिष्ट धर्म होता है । इसीको हम हिंदू-धर्म, बौद्ध-धर्म या जैन-धर्म आदि नामोंसे पुकारते है । परंतु एक हिंदूके लिये सभी कुछ धर्म है, क्योंकि उसका सत्यमें विश्वास है । ससारकी सृष्टिके समय केवल मात्र एक विराट् था । इस विराट्ने अपनेको एकाकी पाया और अपने हितक लिये एव परिणामतः जगत्‌के हितार्थ उसने न केवल स्त्री-पुरुषों की वर इतर जीवों तथा अन्य पदार्थोंकी सृष्टि की। फिर भी उसको सतोष नहीं हुआ, तब उसने ब्राह्मण जातिकी रचना की । तत्पश्चात् क्षत्रियोकी उत्पत्ति हुई, जिन्हें रक्षाका भार सौंपा गया । क्षत्रियोंको ऐसे विशेष गुणोंसे विभूषित किया गया, जिनकी ब्राह्मण भी प्रशसा करते हैं। राजसूय यज्ञमे ब्राह्मणका आसन सदैव नीचे रहता है, यद्यपि क्षत्रियोंको प्रकट उन्होंने ही किया है । यज्ञके समाप्त हो जानेपर क्षत्रिय यजमान ब्राह्मणको प्रणाम करता था। ऐसा किये बिना वह अपने मूलको ही नष्ट करनेवाला हो जायगा । क्षत्रियकी राजाके रूपमे प्रतिष्ठा होती थी । इस वर्णकी सृष्टिके बाद भी धनका अभाव प्रतीत हुआ, जिसके बिना यज्ञादिका सपूर्ण होना असभव था । अतः वैश्योंकी उत्पत्ति हुई । किंतु विराट्‌को जीवनमे ऐश्वर्यसम्पन्न होनेके लिये एक भृत्यकी भी आवश्यकताका अनुभव हुआ । अतएव शूद्र जातिका आविर्भाव हुआ । इस वर्णके अधिष्ठातृ देवता पूषण हैं। इसका वाच्यार्थ है 'पोषण करनेवालां।'१ यह वर्णधर्मका ही वर्णन है । इससे हमें यह मान लेना चाहिये कि समाजका चार वर्णोंमें विभाजन एक वैदिक व्यवस्था है; और हिंदू होनेके नाते हमें यह भी मानना चाहिये कि यह मनुष्यकृत नहीं, भगवत्कृत है। ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे ही इस बातका प्रमाण मिल जाता है । वैदिक कालके बादके साहित्यमें एतद्विषयक प्रचुर प्रमाणोंका तो कहना ही क्या है । इसीलिये श्रीकृष्ण महाराज भगवद्गीतामें कहते है— 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश. ।' आधुनिक विद्वान् 'सृष्टम्' शब्दके वास्तविक तात्पर्यको बिना समझे ही इसकी इस प्रकारसे असदालोचना करते हैं— मानो यह व्यवस्था भगवान्‌की नहीं, बल्कि भारतीय प्राचीन पूर्वजोंकी बनायी हुई हो । यदि और कुछ नहीं तब भी यह एक दृढ आर्थिक व्यवस्था थी, जिसमे आधुनिक सभ्यताके प्रतियोगिता, योग्यतमावशेष आदि कई निकृष्ट दोषोंका सर्वथा अभाव था । दु.खकी बात है कि यह व्यवस्था धीरे- धीरे मिट रही है और अव्यवस्थाग्रस्त जगत्‌की दुरवस्था और भी बढ़ती जा रही है । जबतक हम ऐसी ही किसी व्यवस्थाका, जिसको ससार स्वीकार कर ले, पुनर्निर्माण नहीं कर लेंगे तबतक विश्वके अनेक आर्थिक और सामाजिक दोषोंका, जो आज हमारे सामने उपस्थित है, सन्तोषजनक परिहार नहीं होगा, चाहे हम कितने ही सभा-सम्मेलन कर लें । ( १ ) शतपथब्राह्मण १२ ७. १ ( १ ) १ ४. १०. १.