भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

१६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * बृहदारण्यकोपनिषद्में लिखा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, नाम भी हैं जैसे विश्वामित्र और जमदग्नि, गौतम और भरद्वाज, वैश्य एवं शूद्र आदि चारों वर्णोंकी सृष्टि कर लेनेके बाद भी वसिष्ठ और कश्यप, अत्रि और मैत्रेयी । यह मैत्रेयी विराट्‌को पूर्ण सन्तोष नहीं प्राप्त हुआ। उसके मनमें यह याज्ञवल्क्य ऋषिकी पत्नी थी । उपनिषद्के दूसरे अध्यायके आशङ्का छिपी हुई थी कि क्षत्रिय लोग उच्छृङ्खल हो जायेंगे। चौथे ब्राह्मणमें जो कथा है, उसका समावेश आत्म विद्याकी उनको नियन्त्रणमे तथा अपने उचित स्थानपर स्थिर प्राप्तिके लिये त्यागकी आवश्यकता बतानेके लिये किया गया रखनेके लिये धर्मकी उत्पत्ति हुई और सच्चे क्षत्रियको है, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयीका संवाद है। इस संलापका बताया गया कि धर्म ही राजाओंका भी राजा है। दूसरे शब्दोंमें निष्कर्ष यह है कि केवल आत्मा ही ध्यानीय है । एक धर्मसे बड़ा और कुछ नहीं था। चाहे कोई राजा कितना भी इतिहासका विद्यार्थी इससे इस निश्चयपर पहुँचता है कि शक्तिशाली हो, धर्मका अनुशासन मानना उसके लिये ये व्यक्ति बृहदारण्यकोपनिषद्‌की रचनाके पूर्वके एक युगमें अनिवार्य था। दुर्बल व्यक्ति भी धर्मकी शरणमे जाकर त्राण विद्यमान थे । उनमेंसे कुछ प्रसिद्ध वैदिक ऋषि हैं। मैत्रेयी पा सकते थे। उपनिषदोंके अनुसार धर्म ही सत्य है और इस बातके उदाहरणके रूपमें उपस्थित की जा सकती हैं कि सत्य ही धर्म है। किसी वस्तुके सैद्धान्तिक ज्ञानका नाम सत्य वैदिक कालमे भारतवर्षमें स्त्रियाँ न केवल शिक्षित और है, पर आचरणमे लानेपर वही धर्म कहा जाता है। किसी संस्कृत ही होती थीं, परन्तु वे आत्मज्ञानकी प्राप्तिमे भी स्वतन्त्र विशेष धर्मका आचरण करनेके लिये मनुष्यको पहले चारों थीं। यह कहना भूल है कि वे अशिक्षित, अज्ञ और पराधीन वर्णोंमेसे किसी एकसे सम्बन्ध स्थिर करना चाहिये, क्योंकि थीं। यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि क्या याज्ञवल्क्य- प्रत्येक वर्णका अपना विशेष धर्म है। स्मृतिकी रचना करनेवाले ही वे ऋषि हैं, जिनका उल्लेख उपनिषद्मे हुआ है। याज्ञवल्क्य स्मृतिको ध्यानसे देखनेपर यह कहा जा चुका है कि धर्मसे बढकर कुछ नहीं है यह पता चलता है कि इसका आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त और धर्म ही राजाओंका भी राजा है। इसका यह अर्थ हुआ नामक तीन खण्डोंमें विभाजन एक ऐसी प्रणाली है जो पीछेकी कि राजाओंका कर्तव्य नयी धाराओंको बनाना नहीं है, अपेक्षा प्राचीन धर्म शास्त्रोंमे ही अधिक पायी जाती है। वर पूर्वनिश्चित नियमोंको ही शासनव्यवहारमें लाना है। मेरी सम्मतिमे यह स्मृति जिस रूपमे प्राप्त हैं, वह पर्याप्त अतः राजाका कर्तव्य धर्मकी व्याख्या करके निर्णय देना है। इससे पहलेकी रचना है, सम्भवतः कौटिल्यके अर्थशास्त्रसे भी यह प्रकट होता है कि हिंदू कालके भारतवर्षमें कोई धारासभा पूर्वकी। यद्यपि अपने वर्तमान स्वरूपमें यह ग्रन्थ आदिसे अन्त- नहीं थी । वास्तवमें उल्लेखके योग्य कोई धारा-निर्माण- तक ऋषि याज्ञवल्क्यकी ही रचना न भी हो, पर यह बिल्कुल विभाग नहीं था । राजाको अनीति मार्गपर जानेसे रोकनेके सम्भव है कि यह याज्ञवल्क्यके सम्प्रदायकी वस्तु हो और कई उपायोंमेंसे एक यह भी था कि उसे देशके विधानोंके सम्भवतः उनके किमी उत्साही शिष्यद्वारा लिपिबद्ध हुई हो। अनुसार ही शासन करनेको बाध्य किया जाता था। इन विधानोंके निर्माणका कार्य अधिक बुद्धिवाले व्यक्तियोंके बृहदारण्यकके स्वरूप, इसके विषय तथा शतपथ ब्राह्मणका (ब्राह्मणोंके) हाथमे था । अन्तिम भाग होनेके कारण आधुनिक विद्वानोंकी सम्मतिमें इसके रचना कालको आठवीं और सातवीं शताब्दी ईसापूर्व उपनिषद्में आये हुए कुछ नाम माना जाता है । परन्तु इसका रचनाकाल चाहे जो भी हो, यह ग्रन्थ है अत्यन्त प्राचीन । विश्वमें व्याप्त मायापर विजय बृहदारण्यकोपनिषद्में आये हुए कई नामोंमेंसे याज्ञवल्क्य पानेका सर्वोत्तम साधन क्या है--यही इसका प्रतिपाद्य विषय है एव जनक वैदेहका नाम मुख्यरूपसे उल्लेखनीय है। गर्ग और अन्तमे यह इस निष्कर्षपर पहुँचता है कि परमात्माका कुलके भी एक वग़जका उल्लेख है, जिसने काशीके किन्हीं ज्ञान हुए बिना मायापर विजय सम्भव नहीं । राजा अजातशत्रुसे मिलकर उन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वास्तविक सत्यका उपदेश किया था (अध्याय २-१) । कुछ अन्य व्यक्तियोंके

००/०३०० (१) उसी ग्रन्थमें १ ४. १४—१५