कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें4 उपलब्ध उपनिषद्-ग्रन्थोंकी सूची उपनिषदोंकी बडी महिमा है। ज्ञानकी चरम सीमा ही उपनिषद्के नामसे प्रसिद्ध हुई है। वैदिक वाङ्मयका शीर्ष-स्थान उपनिषद् है—इस कथनमात्रसे ही उपनिषदोंकी लोकोत्तर महत्ता स्पष्ट हो जाती है। प्राचीन कालमे औपनिषद ज्ञानका बडा महत्त्व था। ऊँचे-से-ऊँचे अधिकारी ही इस विद्यामें पारङ्गत होते थे। वैदिक कालसे ही उपनिषदोंके स्वाध्याय-की परम्परा प्रचलित हुई है। अतः कुछ उपनिषद् तो वेदके ही अंशविशेष हैं। कुछ ब्राह्मणभाग और आरण्यकोंके अन्तर्गत हैं। कुछ इनकी अपेक्षा अर्वाचीन होनेपर भी आजसे बहुत प्राचीन कालके हैं तथा कुछ उपनिषद्-ग्रन्थ ऐसे भी है, जिनपर विशेष देश, काल, परिस्थिति तथा मतका प्रभाव पड़ा जान पड़ता है। उपनिषद्-ग्रन्थ प्राचीन हों या अर्वाचीन—सभी ज्ञानप्रधान हैं। सबका आविर्भाव किसी-न-किसी गूढ तत्त्व या रहस्यका प्रकाशन करनेके लिये ही हुआ है। अतः इनके स्वाध्यायसे ज्ञानकी वृद्धि ही होती है—यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है। मुक्तिकोपनिषद्मे एक सौ आठ उपनिषदोंके नाम आते हैं। वे सभी ‘निर्णयसागर प्रेस’ बम्बईसे मूल गुटका-के रूपमें प्रकाशित हैं। इसके सिवा, ‘अडियार लाइब्रेरी’ मद्राससे भी उपनिषदोंका एक संग्रह प्रकाशित हुआ है, जो अनेक भागोंमें विभक्त है। उस संग्रहमें लगभग १७९ उपनिषदोंका प्रकाशन हो गयाहै। इसके अतिरिक्त ‘गुजराती प्रिंटिंग प्रेस’ बम्बईसे मुद्रित उपनिषद्-वाक्य-महाकोषमें २२३ उपनिषदों-की नामावली दी गयी है। इनमें दो उपनिषद्—१ उपनिप-त्स्तुति तथा २ देव्युपनिषद् नं० २ की चर्चा शिवरहस्यनामक ग्रन्थमे की गयी है। ये दोनों अभीतक उपलब्ध न हो सकी हैं। शेष २२१ उपनिषदोंके वाक्यग्रंथ इस महाकोषमे संकलित हुए हैं। इनमें भी माण्डूक्यकारिकाके चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं, इन सबकी एक सख्या मानें तो २१८ ही सख्या होती है। कई उपनिषदें एक ही नामकी दो-तीन जगह आयी हैं, पर वे स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। इस प्रकार सबपर दृष्टिपात करनेसे यह निश्चित होता है कि अबतक लगभग २२० उपनिषदें प्रकाशमें आ चुकी हैं। और भी प्रकाशित हुई होंगी तथा कितनी ही अत्र भी अप्रकाशित रूपमे उपलब्ध हो सकती हैं। प्राचीन कालसे ही अद्वितीय ज्ञान-विज्ञानशाली भारतवर्षमें जान विज्ञानकी अपरिमित ग्रन्थ-राशिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है। भारतपर एक-एक करके अनेक बार विदेशी दस्युओंके आक्रमण हुए और उनके द्वारा हमारी प्राचीन हस्तलिखित कितनी ही पुस्तकों तथा पुस्तकालयोंको भस्मावशेष कर दिया गया। इतनेपर भी जो कुछ शेष है, उसका भी यदि भारतीय जन आदरपूर्वक अनुशीलन करें तो पूर्वजोकी ज्ञान-ज्योति अब भी इस देशमे प्रकाशित हो सकती है। यहाँ उपर्युक्त २२० उपनिषदोकी नामावली अकारादि क्रमसे दी जा रही है—
१ अक्षमालोपनिषद् २. अक्षि-उपनिषद् ३. अथर्वाङ्गिरसोपनिषद् ४. अथर्वशिर उपनिषद् ५ अद्वयतारकोपनिषद् ६ अद्वैतोपनिषद् ७. अद्वैतभावनोपनिषद् ८ अध्यात्मोपनिषद् ९. अनुभवसारोपनिषद् १० अन्नपूर्णोपनिषद् ११ अमनस्कोपनिषद् १२ अमृतनादोपनिषद् १३. अमृतबिन्दूपनिषद् (ब्रह्मबिन्दूपनिषद्) १४ अरुणोपनिषद् १५. अल्लोपनिषद् १६. अवधूतोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) १७. अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक) १८. अव्यक्तोपनिषद् १९. आचमनोपनिषद् २०. आत्मपूजोपनिषद् २१ आत्मप्रबोधोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) २२ आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) २३. आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक) २४. आथर्वणद्वितीयोपनिषद् (वाक्यात्मक एव मन्त्रात्मक) २५ आयुर्वेदोपनिषद् २६. आरुणिकोपनिषद् (आरुणेय्युपनिषद्) २७. आर्षेयोपनिषद् २८ आश्रमोपनिषद् २९ इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) ३० ईशावास्योपनिषद् उपनिषत्स्तुति (शिवरहस्यान्तर्गत, अभीतक अनुपलब्ध) ३१. ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एव पद्यात्मक) ३२. एकाक्षरोपनिषद्