कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रहे, जो कि श्रीयमुनाजीके उभय तटोंके भीतर इधर-उधर दौड़ता फिरता है।' 'जिसके दोनों हाथ बाँसुरी बजाते हुए शोभा पा रहे हैं, श्रीअङ्गोंकी कान्ति नूतन जलधरके समान श्याम है, शरीरपर पीताम्बर सुशोभित है, ओष्ठ पके हुए विम्बाफलके समान लाल- लाल हैं, परम सुन्दर मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्ददायक है और नेत्र विकसित कमलकी सी शोभा धारण करते हैं, उस श्रीकृष्णसे बढ़कर या उससे परे किसी श्रेष्ठ तत्त्वको मैं नहीं जानता।' यही नहीं, श्रीकृष्णके प्रेम साम्राज्यमे अन्तमे क्या दशा हो जाती है, एक अनुभवीकी वाणी सुनिये— अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षाः । शठेन केनापि वयं हठेन दासीकृता गोपवधूविटेन ॥ 'अद्वैतकी वीथियोंमें विचरनेवाले पथिक (साधक) जिन- को अपना उपास्य गुरुदेव मानते हैं तथा आत्मराज्यके सिंहासनपर जिनका अभिषेक हो चुका है; ऐसे होते हुए भी हमें गोपाङ्गनाओंसे प्रेम रखनेवाले किसी छलियेने हठपूर्वक अपना दास बना लिया है'— यह तो बड़ोंकी बातें हैं। हमारे-जैसे लोगोंकी तो एक- मात्र यही आकाङ्क्षा होनी चाहिये कि हमारी चित्त चकईं भवसागरके तटसे उड़कर अनन्त पारावाररहित श्रीकृष्ण-रस- सिन्धुके तटपर अपना नित्य निवास बना ले; बस— चकई री चल चरन-सरोवर जहाँ नहि प्रेम-वियोग । जहँ भ्रम-निसा होत नहि कबहूँ सो सायर सुख-जोग ॥ सनक-से हस, मीन सन-मुनिजन, नख रविप्रभा प्रकास । प्रफुल्लित कमल निमिष नहि ससि उर गुंजन निगम सुबास ॥ जेहि सर सुभग मुक्ति मुक्ताफल विमल सुकृत-जल पीजै । सो सर छोड़ि कुबुद्धि विहगम इहाँ रहे कहा कीजै ॥ जहँ श्री सहस सहित हरि क्रीड़त सोभित सूरदास । अब न सुहाय विषय-रस छीर वह समुद्रकी आस ॥
उपनिषत् उप-समीप, निषत्-निषीदति-बैठनेवाला । जो उस परमतत्त्वके समीप पहुँचाकर चुपचाप बैठ जाता है, वह उपनिषद् है। परमतत्त्व अवर्णनीय है, नाना प्रकारके वर्णनोंका अभिप्राय 'नेति-नेति' में है। वर्णन और बोध-ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेयकी त्रिपुटीसे परे अनुभूति-स्वरूप परमतत्त्व है। उपनिषद्-ज्ञानकी परिसमाप्ति अनुभूतिके क्षेत्रमे होती है। भगवान् आद्य शङ्कराचार्यके दो वाक्य स्मरण आ रहे हैं— 'ईश्वरानुग्रहादेव पुमानद्वैतवासना' और— 'कथं त्वत्कटाक्ष विना तत्त्वबोधः' अनुभूति—आवरणका विनाश—त्रिपुटीकी परिसमाप्ति तो भगवदनुग्रहसे ही सम्भव है । जहाँ उपनिषद्की समाप्ति होती है, वहींसे अनुग्रहकी प्रतीक्षा—उपासनाका प्रारम्भ होता है । अनुग्रहकी प्रतीक्षारूप उपासना भगवान्को अत्यन्त समीप ला देती है। वेदत्रयी कर्मकाण्ड है। कर्मके द्वारा मलकी निवृत्ति होनेपर एकाग्रताकी प्राप्तिके लिये ज्ञानकाण्ड—उपनिषद्का विधान है। यह विक्षेप-चाञ्चल्यकी निवृत्ति करेगा। जहाँ विविधता, अनेकता है ही नहीं, वहाँ चञ्चलता क्यों ? किसलिये ? कहाँ ? स्थैर्यकी प्रतिष्ठा होनेपर भावका उद्रेक होता है। उपासना आरम्भ होती है। उसका रूप है—भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा। कृपाके बिना आवरण निवृत्त जो नहीं होता। यों तो प्रत्येक साधन अपनेमें पूर्ण है निष्ठाका आधार मिलनेपर; किंतु क्रम भी होता ही है। उपनिषद्का लक्ष्य ?—परनिर्वाणकी प्राप्ति, अभेद ! सायुज्य कहे तो भी बाधा नही । अन्तर इतना ही है कि उपनिषद् परनिर्वाणकी प्राप्ति श्रवण-मनन-निदिध्यासनसे कराता है और असुर द्वेषसे सायुज्य प्राप्त करते है—अभेद; दूरी है उसमे । उपासना—नित्य सान्निध्य—भागवतीय ज्ञान, वह तो उपनिषद्की समाप्तिसे प्रारम्भ होता है। वहाँ तो— 'सालोक्यसाष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' 'सुकृति निरादरि भगति लुभाने' है । —सुदर्शन