भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 165
  • भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १५१ भक्त सूरदासकी ज्योतिहीन आँखोंमें भी परब्रह्मकी ज्योति जाग उठी और उन्होंने भी— यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वाञ्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ (मुण्डक० ३ । २ । ८) 'जिस प्रकार निरन्तर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूप- को त्यागकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है।' —ऐसा ही वर्णन अपने एक गीतमें सुनाया। वेगाने लगे— जैसे सरिता मिली सिंधुसों उलटि प्रवाह न आवे हो । तैसे सूर कमल-मुख निरखत चित इत उत न डुलावे हो ॥ $\times\quad\quad\times\quad\quad\times\quad\quad\times$ सरिता निकट तडागके हो दोनों कूर बिदारि । नाम मिट्यो सरिता भई अब कौन निवरे वारि ॥ $\times\quad\quad\times\quad\quad\times\quad\quad\times$ विधि भाजन ओछो रच्यो हो लीलाससिंधु अपार । उलटि मगन तामें भयौ अब कौन निकासनहार ॥ परब्रह्मका वास्तविक पूर्ण अनुभव तो वहाँ ही है, जहाँ हमारा मन, हमारी इन्द्रियाँ मरें नहीं, अपितु उम चिदा- नन्द-रसका स्पर्श पाकर अमर हो जायें। परब्रह्म रसरूप है, उस रसको पाकर ही पुरुष आनन्दका अनुभव करता है— रसो वै स । रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । (तैत्तिरीय० २ । ७) फिर वह किसीको मारे, यह सम्भव नहीं। यह सत्य है— 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।'* इन्द्रियोंके सहित मन परब्रह्मको न पाकर लौट आता है, किंतु यदि वह स्वयं मन-इन्द्रियोंमें उतर आवे तो उसे कौन रोक सकता है ? क्या उसपर भी कोई बन्धन है ? और वास्तव- में तो वह मिलता ही है उसे, जिसे वह स्वय वरण करता है, वरण करके अपने स्वरूपको उसके प्रति अभिव्यक्त कर देता है— यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ (कठ० १। २ । २३) अतः यह तो वरण करनेवालेकी इच्छा है कि वह अपने किस स्वरूपमे किसका वरण करे। वह तो सर्वतन्त्रस्वतन्त्र है, श्रुतियोंकी सीमामें नहीं है। इसीलिये कभी-कभी वह मन- इन्द्रियोंमें भी अपना चिदानन्दमय रस भरकर वहाँ क्रीड़ा करने लग जाता है। नरकृति परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रने तो यही किया। चाहनेवालेके मन-इन्द्रियोंमें भी वे अपना स्वरूपभूत रस देकर स्वयं उसका रस लेने लगे— परम रस पायो ब्रजकी नारि । जो रस ब्रह्मादिकनों दुर्लभ सो रस दियो मुरारि ॥ दरसन सुख नयननको दीनों रसनाको गुन गान । बचन सुनन श्रवननको दीनों बदन अधर-रस पान ॥ आलिंगन दीनो सब अंगन भुजन दियो भुजबंध । दीनी चरन बिचित्र गति रसकी नासाको सुख गंध ॥ दियो काम सुख भोग परमफल त्वचा रोम आनंद । ढिग बैठिबो दियो नितबन लै ऊछंग नंदनंद ॥ मनको दियो सदा रस-भावन सुख-समूहकी खान । रसिक-चरन-रज ब्रजबुवतिनकी अति दुर्लभ जिय जान ॥ ऐसे रसमय परब्रह्म नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रसे चित्तवृत्ति- का जुड़ जाना ही उपनिषद्के स्वाध्यायका फल है। यही उपनिषद्-ज्ञानका मधुर परिणाम है। सच्ची बात तो यह है कि उपनिषद्की ज्ञानसरिताएँ जब प्रेम-समुद्रमें जाकर— उसमें घुल-मिलकर अपने पृथक् अस्तित्वको सर्वथा छिपा लेती हैं, तभी नित्य नवीन, सौन्दर्य-माधुर्य-सुधा-रस-सिन्धु योगीन्द्र-मुनीन्द्र-परिसेवित-पादारविन्द परब्रह्म मदनमोहन ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य नित्य चिदानन्दरसमय स्वरूप-साम्राज्यमें प्रवेशका पथ मिलता है। इस रस-साम्राज्यमें किञ्चित् प्रवेश पाकर किन्हीं एक परम विद्वान् महात्माने मुक्तकण्ठसे कहा था— ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते । अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीतटकुञ्जकुहर-पुलीनोदरे किमपि यन्नीलं महो धावति ॥ वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥* 'यदि योगीजन ध्यानके अभ्याससे वशमे किये हुए मनके द्वारा उस निर्गुण, निष्क्रिय एव अनिर्वचनीय परम ज्योतिका दर्शन करते हैं तो वे करते रहें, हमारे नेत्रोंमें तो वह एकमात्र श्याममय प्रकाश ही चिरन्तन कालतक चमत्कार उत्पन्न करता
  • तैत्तिरीय० २ । ४
  • देखिये गोता मधुसूदनी टीका अध्याय १३ और १५ की टीका