कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * औपनिषद-दृष्टिसे इसमे कोई भी विरोध या असामञ्जस्य नही है। भगवान्का नित्य एक रहना, नित्य बहुत से रूपोंमे अपने आस्वादनकी कामना करना और नित्य बहुत-से रूपोमे अपने- को आप ही प्रकट करना एव सम्भोग करना—यह सब उनके एक नित्यस्वरूपके ही अन्तर्गत है। कामना, ईक्षण और आस्वादन—ये सभी उनकी निरवच्छिन्न पूर्ण चेतनाके क्षेत्रमे समान अर्थ ही रखते है। भगवान् वस्तुतः न तो एक अवस्थासे किसी दूसरी अवस्थाविशेषमें जानेकी कामना ही करते हैं और न उनकी सहज नित्य स्वरूप-स्थितिमें कभी कोई परिवर्तन ही होता है। उनके बहुत रूपोंमें प्रकट होनेका यह अर्थ नहीं है कि वे एकत्वकी अवस्थासे बहुत्वकी अवस्था- में, अथवा अद्वैत-स्थितिसे द्वैतस्थितिमे चलकर जाते हैं। उनकी सत्ता तथा स्वरूपपर कालका कोई भी प्रभाव नहीं है और इसीलिये विश्वके प्रकट होनेसे पूर्वकी या पीछेकी अवस्था में जो भेद दिखायी देता है, वह उनकी सत्ता और स्वरूपका स्पर्श भी नहीं कर पाता। अवस्था भेदकी कल्पना तो जड जगत्में है। स्थिति और गति, अव्यक्त और व्यक्त, निवृत्ति और प्रवृत्ति, विरति और भोग, साधन और सिद्धि, कामना और परिणाम, भूत और भविष्य, दूर और समीप एव एक और बहुत—ये सभी भेद वस्तुतः जड-जगत्के सकीर्ण धरातलमें ही हैं। विशुद्ध पूर्ण सच्चिदानन्द-सत्ता तो सर्वथा भेदशून्य है। वह विशुद्ध अभेद भूमि है। वहाँ स्थिति और गति, अव्यक्त और व्यक्त, निष्क्रियता और सक्रियतामें अभेद है। इसी प्रकार एक और बहुत, साधना और सिद्धि, कामना और भोग, भूत भविष्य वर्तमान तथा दूर और निकट भी अभेदरूप ही हैं। इस अभेदभूमिमें चैतन्यघन पूर्ण परमात्मा परस्परविरोधी धर्मोंको आलिङ्गन किये नित्य विराजित हैं। वे चलते हैं और नहीं चलते, वे दूर भी है, समीप भी हैं, वे सबके भीतर भी हैं और सबके बाहर भी है— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत ॥ (ईशावास्योपनिषद् ५) वे अपने विश्वातीत रूपमे स्थित रहते हुए ही अपनी वैचित्र्यप्रसविनी कर्मशीला अचिन्त्य शक्तिके द्वारा विश्वका सृजन करके अनादि अनन्तकाल उसीके द्वारा अपने विश्वातीत स्वरूपकी उपलब्धि और उसका सम्भोग करते रहते हैं। उपनिषद्में जो यह आया है कि वह ब्रह्म पहले अकेला था, वह रमण नहीं करता था। इसी कारण आज भी एकाकी पुरुष रमण नहीं करता। उसने दूसरेकी इच्छा की उसने अपनेको ही एकसे दो कर दिया वे पति पत्नी हो गये । 'स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छद् ••••• स इममेवात्मान द्वेधापातयत्त. पतिश्च पत्नी चाभवताम् । • ' (बृहदारण्यक० १।४।३) इसका यह अभिप्राय नहीं है कि इससे पूर्व वे अकेले थे और अकेलेपनमे रमणका अभाव प्रतीत होनेके कारण वे मिथुन (युगल) हो गये। क्योकि कालपरम्पराके क्रमसे अवस्थाभेदको प्राप्त हो जाना ब्रह्मके लिये सम्भव नहीं है। वे नित्य मिथुन (युगल) हे और इस नित्य युगलत्वमे ही उनका पूर्ण एकत्व है। उनका अपने स्वरूपमे ही नित्य अपने ही साथ नित्य रमण—अपनी अनन्त सत्ता, अनन्त ज्ञान, अनन्त ऐश्वर्य और अनन्त माधुर्यका अनवरत आस्वादन चल रहा है। उनके इस स्वरूपगत आत्ममैथुन, आत्मरमण और आत्मस्वादनसे ही अनादि-अनन्तकाल अनादि-अनन्त देशोंमें अनन्त विचित्रतामण्डित, अनन्त रससमन्वित विश्वके सृजन, पालन और महारका लीला प्रवाह चल रहा है। इस युगल रूपमें ही ब्रह्मके अद्वैतस्वरूपका परमोत्कृष्ट परिचय प्राप्त होता है। अतएव श्रीउमा-महेश्वर, श्रीलक्ष्मी नारायण, श्रीसीता-राम, श्रीराधा-कृष्ण, श्रीकाली-रुद्र आदि सभी युगल स्वरूप नित्य सत्य और प्रकारान्तरसे उपनिषत्-प्रतिपादित है। उपनिषदने एक ही साथ सर्वातीत और सर्वकारणरूपमे, स्थितिशील और गतिशीलरूपमें, निष्क्रिय और सक्रियकूपमे, अव्यक्त और व्यक्तरूपमें एव सच्चिदानन्दघन पुरुष और विश्वजननी नारी- रूपमें इसी युगल स्वरूपका विवरण किया है। परतु यह विषय है बहुत ही गहन। यह वस्तुत. अनुभवगम्य रहस्य है। प्रगाढ अनुभूति जब तार्किक्री बुद्धिकी द्वन्द्वमयी सीमाका सर्वथा अतिक्रमण कर जाती है—तभी सक्रियत्व और निष्क्रियत्व, साकारत्व और निराकारत्व, परिणामत्व और अपरिणामत्व एवं बहुरूपत्व और एकरूपत्वके एक ही समय एक ही साथ सर्वाङ्गीण मिलनका रहस्य खुलता है—तभी इसका यथार्थ अनुभव प्राप्त होता है। यद्यपि विशुद्ध तत्त्वमय चैतन्य राज्यमें प्राकृत पुरुष और नारीके सदृश देहेन्द्रियादिगत भेद एव तदनुकूल किसी लौकिक या जडीय सम्बन्धकी सम्भावना नही है, तथापि— जब अप्राकृत तत्त्वकी प्राकृत मन बुद्धि एव इन्द्रियों के द्वारा
- जाऊँ कैसे ? * १३१ उपासना करनी पडती है, तब प्राकृत उपमा और प्राकृत संज्ञा देनी ही पडती है। प्राकृत पुरुष और प्राकृत नारी एव उनके प्रगाढ सम्बन्धका सहारा लेकर ही परम चित्तत्त्वके स्वरूपगत युगल-भावको समझनेका प्रयत्न करना पड़ता है। वस्तुतः पुरुषरूपमें ब्रह्मका सर्वातीत निर्विकार निष्क्रिय भाव है, और नारीरूपमें उन्हींकी सर्वकारणात्मिका अनन्त लीला वैचित्र्यमयी स्वरूपा शक्तिका सक्रिय भाव है। पुरुषमूर्तिमें भगवान् विश्वातीत'हैं, एक हैं और सर्वथा निष्क्रिय हैं, एव नारीमूर्तिमें वे ही विश्वजननी, बहुप्रसविनी, लीलाविलासिनी रूपमे प्रकाशित हैं। पुरुष विग्रहमें वे सच्चिदानन्दस्वरूप हैं और नारी-विग्रहमें उन्हींकी सत्ताका विचित्र प्रकाश, उन्हींकि चैतन्यकी विचित्र उपलब्धि तथा उन्हींकि आनन्दका विचित्र आस्वादन है। अपने इस नारी-भावके संयोगसे ही वे परम पुरुष ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता हैं, - सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्त्ता हैं। नारीभावके सहयोगसे ही उनके स्वरूपगत, स्वभावगत अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त वीर्य, अनन्त सौन्दर्य और अनन्त माधुर्यका प्रकाश है, इसीमे उनकी भगवत्ताका परिचय है। पुरुषरूपसे वे नित्य-निरन्तर अपने अभिन्न नारीरूपका आस्वादन करते हैं और नारी (शक्ति) रूपसे अपनेको ही आप अनन्त आकार-प्रकारोंमे लीलारूपमे प्रकट करके नित्य चिद्रूपमें उसकी उपलब्धि और सम्भोग करते हैं - इसीलिये ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वलोकमहेश्वर, षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। सच्चिदानन्दमयी अनन्त-वैचित्र्यप्रसविनी लीला- विलासिनी महाशक्ति ब्रह्मकी स्वरूपभूता है, ब्रह्मके विश्वातीतः, देशकालातीत अपरिणामी सच्चिदानन्दस्वरूपके साथ नित्य मिथुनीभूता है। ब्रह्मकी सर्वपरिच्छेदरहित सत्ता, चेतनता और आनन्दको अगणित स्तरोके सत्-पदार्थरूपमे, असख्य प्रकारकी चेतना तथा ज्ञानके रूपमे एव असख्य प्रकारके रस- आनन्दके रूपमे विकसित करके उनको आस्वादनके योग्य बना देना इस महाशक्तिका कार्य है। स्वरूपगत महाशक्ति इस प्रकार अनादि-अनन्तकाल ब्रह्मके स्वरूपगत चित्की सेवा करती रहती हैं। उनका यह शक्तिरूप तथा शक्तिके समस्त परिणाम (लीला) और कार्य स्वरूपतः उस चित्तत्त्वसे अभिन्न हे। यह नारीभाव उस पुरुषभावसे अभिन्न है, यह परिणामशील दिखायी देनेवाला अनन्त विचित्र लीलाविलास उनके कूटस्थ नित्यभावसे अभिन्न है। इस प्रकार उभयभाव अभिन्न होकर ही भिन्नरूपमें परस्पर आलिङ्गन किये हुए एक दूसरेका प्रकाश, सेवा और आस्वादन करते हुए एक दूसरेको आनन्द-रसमे आप्लावित करते हुए नित्य-निरन्तर ब्रह्मके पूर्ण स्वरूपका परिचय दे रहे है। परम पुरुष और उनकी महाशक्ति-भगवान् और उनकी प्रियतमा भगवती भिन्नाभिन्नरूपसे एक ही ब्रह्मस्वरूपमे स्वरूपतः प्रतिष्ठित हैं। इसीलिये ब्रह्म पूर्ण सच्चिदानन्द हैं और साथ ही नित्य आस्वादनमय हैं। यही विचित्र महारास है जो अनादि, अनन्तकाल बिना विराम चल रहा है। उपनिषदोने ब्रह्मके इसी स्वरूपका और उनकी इसी नित्य लीलाका विविध दार्शनिक शब्दोंमे परिचय दिया है और इसी स्वरूपको जानने, समझने, उपलब्ध करने और सम्भोग करनेकी विविध प्रक्रियाएँ, विद्याएँ और साधनाएँ अनुभवी ऋषियोकी दिव्य वाणीके द्वारा उनमें प्रकट हुई हैं ।* जाऊँ कैसे ? (रचयिता-श्रीप्रबोध, बी० ए० (आनर्स), साहित्यरत्न, साहित्यालङ्कार) इंगित पानी दूर क्षितिज से, जाऊँ कैसे ?-हूँ निःसम्बल ! पथ में झंझावात, शत-शत विद्युत् के कटु घात क्षुद्र क्रोड़ में जिनके खिलते उल्का के उत्पात और अति भीषण कोलाहल ! अगणित हैं इस कठिन मार्गमें विघ्न-सरित, गिरि, वन, दल-दल, इन सरिताओं में कूल कहाँ ?-केवल हैं आवर्त्त और ये निष्ठुर प्रखरतर धार, जो बहती हैं खल-खल ॥ किसी भाँति चल गिरूँ उपल-सी छू लूँ प्रिय पद पिघल-पिघल ! और छू, जन्म-मरण से परे उसी क्षण हो जाऊँ निश्चल ॥
- आचार्य श्रीमक्षयकुमार वन्द्योपाध्यायके एक निबन्धके आधारपर ।
उपनिषदोंसे मैंने क्या सीखा ? (लेखक---प० श्रीहरिभाऊजी उपाध्याय) उपनिषदोंसे मैंने यह सीखा कि सबमे एक ही आत्मा समाया हुआ है। अतः मुझे सबके साथ समान भावसे बर्तना चाहिये, परतु यह भूमिका सहजसाध्य नहीं। यह आत्म-विकासकी अपेक्षा रखती है और सतत साधनासे ही प्राप्त हो सकती है। इसकी पहली सीडीके रूपमें मुझे अपने प्रति कठोर और दूसरोंके प्रति उदार और सहनशील रहना आवश्यक मालूम होता है। अपने प्रति कठोर रहना तप है और दूसरेके प्रति उदार रहना अहिंसा है। इस तरह आत्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये तप और अहिंसा अनिवार्य हो जाते हैं। आत्मसिद्धि या आत्मस्थितिके बाद क्या हो ? आत्मस्थ कैसा व्यवहार करे ? इसका सही उत्तर आत्मस्थ ही दे सकता है। साधक इस चर्चासे उदासीन रहे तो अच्छा ही है। उस स्थितिमे पहुँचनेपर उसे अपने-आप सूझता जायगा कि उसे क्या करना चाहिये और कैसे रहना चाहिये। इतना अवश्य है कि वह मनुष्य-समाजके बनाये नियमोंसे परे हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह उन नियमोंका पालन नहीं करेगा। बल्कि यह कि वह उन्हे अपने लिये बन्धनकारक नहीं समझेगा। वह उसके लिये नियम नहीं रहेगा, स्वभाव हो जायगा। वह शासन और नियमसे ऊपर उठकर सहज जीवनमें ओतप्रोत रहेगा। उपनिषदोने जो हमें दिया है वह संसारके किसी ग्रन्थने शायद उससे पहले नहीं दिया था। उसी आत्मतत्त्वका हम सदैव स्मरण करें, मनन करें, ध्यान करें और उसीकी साधनामें जीवनके प्रत्येक कर्मकी आहुति दें। उपनिषद्की व्युत्पत्ति और अर्थ (लेखक-प० श्रीगोविन्दनारायणजी आसोपा, बी० ए०) 'षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु' धातुके पहले 'उप' और 'नि' ये दो उपसर्ग और अन्तमें 'क्विप्' प्रत्यय लगानेसे उपनिषद् शब्द बनता है। 'उपनिषद्यते---प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्।' इसका अर्थ है--जिससे ब्रह्मका साक्षात्कार किया जा सके, वह उपनिषद् कहाती है। उपनिषदोंमें ब्रह्मज्ञान अथवा ब्रह्मविद्याका ही प्रधानतासे विवेचन तथा वर्णन किया हुआ है जिससे उपनिषद्को अध्यात्मविद्या भी कहते हैं। ब्रह्मके प्रतिपादक वेदके शिरोभाग अथवा अन्तमें होनेसे ये वेदान्त या उत्तरमीमांसा भी कही जाती है। ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्त्वज्ञान और ब्रह्मविद्या--ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। वेदके अङ्गभूत सहिता, ब्राह्मण, आरण्यकमेसे ही ब्रह्मज्ञानप्रति- पादक भागोंको पृथक् कर उनको 'उपनिषद्' नाम दिया गया है। अकेले अथर्ववेदमें ५२ उपनिषद् हैं। मुक्तिकोपनिषद्में १०८ उपनिषदोंकी गणना हुई है। अमरकोशकार उपनिषद् शब्दका अर्थ-'धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात्' लिखते हैं, इसके अनुसार 'उपनिषत्' शब्द गूढ धर्म एव रहस्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है।
कल्याण-मार्ग (लेखक—श्रीयोगेन्द्रनाथजी बी० एस्-सी०) [बायाँ स्तम्भ] कठोपनिषद्में कहा है— अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय- स्ते उभे नानार्थे पुरुषँसिनीतः। तयो श्रेय आददानस्य साधु- र्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥ ( १।२।१) 'प्रेय और श्रेय दो पृथक्-पृथक् मार्ग हैं, ये दोनों विभिन्न फल देनेवाले साधन मनुष्यको बन्धनमें डालते हैं। प्रेय लोकोन्नतिका मार्ग है और श्रेय परलोकोन्नतिका मार्ग है। इनमेंसे श्रेयके ग्रहण करनेवालेका कल्याण होता है, प्रेयको ग्रहण करनेवाला पतित हो जाता है। दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बह्वोऽलोलुपन्त॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमाना स्वयं धीरा पण्डितं मन्यमाना। दन्द्रम्यमाणा परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥ न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥ (कठ० १।२।४-६) 'ये दोनों मार्ग एक-दूसरेसे विपरीत, विरुद्धार्थसूचक और दूर हैं। ये अविद्या और विद्या इस नामसे जाने गये हैं। तुम नचिकेताको मैं विद्याका चाहनेवाला मानता हूँ। तुमको बहुत-सी कामनाएँ प्रलोभित नहीं करती हैं। अविद्यामे पड़े हुए अपनेको धीर और विद्वान् माननेवाले लोग उल्टे रास्तों- पर चलते हैं और वे मूढ अन्धेके द्वारा ले जाये जानेवाले अन्धेकी भाँति भटकते रहते हैं। धनके मोहसे मूढ, प्रमादपूर्ण, विवेकरहित पुरुषको परलोककी बात पसन्द नहीं आती। यही लोक है, परलोक कुछ नहीं। ऐसा माननेवाला बार-बार मृत्युके वशमें आता है।' ईशोपनिषद्के ११ वें मन्त्रमें कहा है— [दायाँ स्तम्भ] विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ 'जो विद्या और अविद्या इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह अविद्यासे मृत्युको तरकर ज्ञानसे अमरताको प्राप्त कर लेता है।' प्रत्येक कल्याणपथके पथिकका उद्देश्य श्रेय होना चाहिये, और प्रेयका इस प्रकार उपयोग करना चाहिये कि वह श्रेय- का साधन बन जाय। जिस मनुष्यको हरिद्वार जाना है, उसे अपने उद्देश्यकी पूर्तिके लिये इतना-सा धन चाहिये, जिससे उसका मार्ग-व्यय आदि सध जाय और यदि वह अपने समस्त धनको साथ लेकर हरद्वार जाना चाहेगा, तो वह उसके उद्देश्यकी पूर्तिको बाधक ही होगा। उसे अपने सारे आराम- के प्रलोभनोंको त्यागकर उद्देश्यकी ओर अग्रसर होना पड़ेगा। इसी प्रकार जीवको श्रेयमार्गके अनुसरणमें धन-संग्रह इत्यादि लोकोन्नतिके मार्गको केवल साधन समझना चाहिये। ये प्रेय वस्तुएँ जहाँ साध्य हुईं कि मनुष्य अपने मार्गसे च्युत हुआ। अतः धन आदिको केवल अपने आत्म-कल्याणका ही साधन बनाना चाहिये। जो लोग विषयभोगकी दृष्टिसे केवल लोकोन्नतिको अपना लक्ष्य बना लेते हैं और श्रेयकी कुछ भी चिन्ता नहीं करते, वे दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्तिरूप मानव-जीवनके यथार्थ ध्येयसे च्युत हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें एक बड़ी शिक्षाप्रद आख्यायिका प्रसिद्ध है। एक युवक भावावेशमें आत्मज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे गुरुके पास आया। गुरुने उसको अनधिकारी समझकर उपदेश नहीं दिया, परन्तु वह आग्रह करता ही रहा। एक दिन उसे साथ लेकर गुरु घूमने गये। रास्तेसे कुछ ही दूरीपर एक गाँव दिखायी दिया। गुरुजीको प्यास लगी। युवक गाँवमे पानी लाने गया। कुएँपर एक सुन्दरी युवती पानी भर रही थी। युवकको उसने पानी दे दिया, परन्तु युवक उसके रूपपर मोहित होकर गुरुके प्यासकी बात भूल गया और उस युवती- के पीछे-पीछे उसके घर पहुँचा। वह अविवाहिता थी, अतः उसके पिताने युवकको योग्य समझकर उसका विवाह युवकके साथ कर दिया। विवाहके वाद वह गृहस्थ बनकर वहीं रहने लगा। क्रमशः उसके तीन पुत्र हुए। युवतीका पिता मर चुका था। कुछ समय बाद नदीमें बाढ आनेसे ग्राममें
१३४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरा न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ]
पानी आ गया। चारों ओर तो जल ही जल था। उसने अपनी स्त्री और तीनों बच्चोको लेकर प्राण बचानेके लिये गाँव-से बाहर निकलनेका प्रयत्न किया। पानीका वेग बढ़ता ही जाता था। बड़ी भारी सावधानी करनेपर भी एक एक करके उसके तीनों पुत्र और स्त्री पानीमें बह गये। वह बड़ा दुखी हुआ और कठिनतासे प्राण बचाकर उस स्थानपर पहुँचा, जहाँसे गुरुजीके लिये जल लेने चला था। वहाँ पहुँचनेपर उसको यह स्मरण आया 'मै अपने उद्देश्यसे पतित होकर किस प्रकार 'प्रेयके मार्गपर' चल दिया था।'
प्रेयको साध्य समझकर महमूद गजनवी रोता हुआ ससार-से गया। जीवनभर लूट-खसोटसे एकत्रित धनके कोषको मृत्युके समय अपने सामने जमा कराकर लालसापूर्ण दृष्टि डालता हुआ वह निराश होकर ससारसे चला गया। मृत्युने बलपूर्वक प्रिय वस्तुओसे उसको अलग कर दिया। इधर कणाद ऋषि कटे हुए खेतसे कण कण अन्न बीनकर जीवन निर्वाह करते थे। जब राजा धनकी भेंट लेकर जाते तो कहते थे कि इसे दरिद्रोंको बाँट दो। प्रेयको त्यागकर श्रेयका इससे अनुपम उदाहरण क्या होगा। यही कणाद ऋषि वैशेषिक-दर्शनके रचयिता थे।
यमाचार्यने उपर्युक्त मन्त्रोंमें नचिकेताको तपका स्वरूप बतलाया। तपका जीवन प्रलोभनोंसे बचकर चलनेका है, प्रेय-से लगातार युद्ध करनेका है। प्रेयसे युद्ध करके ही मनुष्यकी गति ऊपरको हो सकती है। नचिकेताके तीसरे वरके उत्तर-में यमराजने प्रलोभन देते हुए उसे पुत्र, पौत्र, घोड़े, हाथी, सुवर्ण, चक्रवर्ती राज्य माँगनेको कहा, ससारमें दुर्लभ-से दुर्लभ कामनाओंकी पूर्ति करनेका वचन दिया, परंतु नचिकेताने 'भोगोसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता और भोग विनाशी है'—यह समझकर तुरत सबको ठुकरा दिया। उस समय यमने मरनेके पश्चात् जीवकी क्या गति होती है, इसका उपदेश दिया। परंतु इस उपदेशसे पूर्व यमने नचिकेताके तपस्वी—अधिकारी होनेकी पूरी परीक्षा कर ली।
अनन्त नित्य और पूर्ण सुखकी प्राप्ति ही श्रेय है। प्रत्येक मनुष्यकी स्वाभाविक इच्छा सुखप्राप्तिकी होती है, परतु सुख क्या है? नारदजीने सनत्कुमारसे यही प्रश्न (छान्दोग्य उपनिषद्में) किया—
'सुखं भगवो विजिज्ञासे' इति । (७।२२।१)
'भगवन् ! मै सुखका स्वरूप जानना चाहता हूँ।' बहुत ही
[दायाँ स्तम्भ]
टेढ़ा प्रश्न है। बच्चा खिलौना देखकर रोता है। जब खिलौना मिल जाता है तो समझता है कि मै सुखी हो गया। परंतु कुछ देर खेलनेके पश्चात् उसका जी ऊब जाता है, और वह खिलौनेको फेंककर रोने लगता है। अब उसे उस खिलौनेमे सुख नहीं मिलता। वस्तुतः खिलौनेमें सुख समझना उसका बालपन ही था। खिलौनेमे असली सुख नहीं था। इसी प्रकार धन आदि ससारके पदार्थोंका हाल है। फिर प्रश्न होता है कि तो फिर 'सुख क्या है?' सनत्कुमारने उत्तर दिया—
'यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति । भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । (छान्दोग्य० ७।२३।१)
'भूमा ही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। भूमाको ही समझना चाहिये।' नारदने फिर पूछा, 'महाराज ! भूमा क्या है।' सनत्कुमारने उत्तर दिया—
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पम्। यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् । (छान्दोग्य० ७।२४।१)
'भूमा वह है, जिसमे अन्यको नहीं देखता, अन्यको नहीं सुनता, अन्यको नहीं जानता। वह अल्प है जहाँ अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है, अन्यको जानता है। भूमा ही अमृत है। अल्प ही दुःख है।' ससारमें दो प्रकारकी मनोवृत्तियोंके मनुष्य है—एक तो वे जो अस्थिर वस्तुओमे सुख देखते हैं। दूसरे वे जो विवेकके द्वारा अनित्य पदार्थोंकी निःसारता और दुःख परिणामताको देखकर नित्य अखण्ड सुखरूप भूमाको चाहते हैं। जो लोग अनित्य पदार्थोंमे सुख मानते हैं, उनको कभी स्थायी सुख नहीं मिलता। क्षणिक सुखके बाद दुःख आ जाता है। ससारमे प्राकृतिक पदार्थोंसे सुख-प्राप्तिकी आशा इसी प्रकार है। इसमे एकके बाद दूसरी, दूसरीके बाद तीसरी—इस तरह सुख प्राप्त करनेवाली वस्तुओंकी खोज होती रहती है। अभी एक पुरुष हजार रुपयोंकी प्राप्तिमे सुख समझता है। उसकी प्राप्तिपर दस हजारमें सुख समझता है। होते होते उसको लाखों करोड़ोंकी प्राप्तिके पश्चात् भी सुख नहीं होता। एक मनुष्य सुस्वादु भोजनका आनन्द ले रहा है इतनेमे ही उसे अपने युवक पुत्रकी मृत्युका समाचार मिलता है। अब उसे भोजनमे कोई आनन्द
✻ कल्याण-मार्ग ✻ १३५ नहीं रहता। यही अल्प है। भूमामें पहुँचकर सुख क्षणिक नहीं होता। वहाँ किसी भी अन्य वस्तुकी प्राप्तिका मनोरथ सुखका हेतु नहीं रह जाता। वह सुख किसी अन्य वस्तुसे बाधित नहीं होता। भूमामें ही सतत शान्ति है। भूमा ही श्रेय है। अल्प ही प्रेय है। नारदजीने प्रश्न किया, 'भूमा किनके सहारे है ?' सनत्कुमारने उत्तर दिया, 'भूमा अपनी महिमामें ठहरा हुआ है।' यों भी कह सकते हैं, वह किसीके आश्रय नहीं है। संसारमे गौ, घोड़े, हाथी, सोना, नौकर आदिके अर्थहीमें महिमाको लेते हैं, परन्तु ये एक दूसरेके ऊपर प्रतिष्ठित हैं। यह महिमा कैसी ? भूमा अपनेमें ही प्रतिष्ठित है। भूमा ही अमृत है। सनत्कुमारजी कहते हैं—भूमा स्वय अपना आधार है। वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है। वही दायें-बायें है। वही सब कुछ है। अब यदि इस भूमाको 'मैं' कहकर पुकारो तो ऐसा कहेंगे कि 'मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मैं ही पीछे, मैं ही आगे, मैं ही दायें, मे ही बायें हूँ। मैं ही सब कुछ हूँ।' (छान्दोग्य० ७। २५। १) अर्थात्— अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं५ सर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एव विजानन्नात्म- रतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्द स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति। अथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषा५ सर्वेषु लोकेष्व- कामचारो भवति। (छान्दोग्य० ७।२५।२) "अब यदि उसको 'आत्मा' कहकर पुकारें तो कहेंगे कि आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है। आत्मा ही दायें है, आत्मा ही बायें है। आत्मा ही सब कुछ है। जो इस प्रकार जानता है, वह अपने- हीमें रमण करता है, अपनेहीमे खेलता है, अपने ही साथ आप रहता है। अपनेमें ही आनन्द लेता है। वही स्वराट् है। सब लोकोंमें उसकी कामना पूरी होती है, परंतु जो लोग उसके विपरीत भावना रखते हैं, उनका किया-कराया नाश को प्राप्त होता है। उनकी भावनाएँ कहीं पूरी नहीं होतीं। उनको कहीं सुख प्राप्त नहीं होता।" यहाँ भूमा, श्रेय, आत्मा शब्दोंसे एक ही तात्पर्य है। प्राकृतिक जगत्को अपने कार्यका ध्येय बनाना 'अल्पता' है, प्रेय है और आत्माको ध्येय बनाना भूमापन है। इन दोनोंका समन्वय करते हुए आत्मोन्नति करनेका उदाहरण विदेहराज महाराज जनकका जीवन है। वृहदारण्यक उपनिषद्मे याज्ञवल्क्य ऋषि मैत्रेयीको उपदेश देते हुए कहते हैं— न वा अरे पत्यु कामाय पति प्रियॊ भवति। आत्मनस्तु कामाय पति प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति। आत्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। × × × × × न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रिय भवति। आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रिय भवति। आत्मा वा अरे द्रष्टव्य, श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि आत्मनि खलु अरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं५ सर्वं विदितम्। 'अरी मैत्रेयी ! पतिके लिये पति प्यारा नहीं होता, आत्माके लिये पति प्यारा होता है। स्त्रीके लिये स्त्री प्यारी नहीं होती, आत्माके लिये स्त्री प्यारी होती है। × × × × × सबके लिये सब प्यारा नहीं होता, आत्माके लिये सब प्यारा होता है। इसलिये हे मैत्रेयी ! आत्माको ही देखने, सुनने, सोचने और जाननेसे सब कुछ समझमें आ जाता है।' मनुष्यको अपने जीवनके सब विभागोंमे कार्य करते हुए आत्माको ही ध्येय बनाये रखना चाहिये। परंतु यह ध्येय बने कैसे ? मनकी प्रवृत्ति श्रेय-मार्गकी ओर हो कैसे ? (२) प्रश्न यह होता है कि क्या कारण है कि इतने उपदेशोंके होते हुए भी मनुष्यकी आत्मोन्नतिकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती। जिनका इधर ध्यान जाता भी है, वे भी सफल नहीं होते हैं। साधकको परमपदकी प्राप्तिके लिये सबसे प्रथम आरम्भ कहाँसे करना चाहिये। सनत्कुमार बतलाते है— आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति स्मृति- लम्भे सर्वग्रन्थीना विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारस्त स्कन्द इत्याचक्षते त५स्कन्द इत्याचक्षते। (छान्दोग्य० ७। २६।२) 'आहारके शुद्ध होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती है। अन्त:करणके शुद्ध होनेपर स्मृति दृढ हो जाती है और स्मृति- प्राप्तिपर हृदयकी समस्त गाँठें खुल जाती हैं। भगवान् सनत्कुमार- ने (राग द्वेषरूप) दोष मल दिये (विनष्ट कर दिये)। नारद-
१३६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * को अन्धकारका परला किनारा दिखा दिया। उस सनत्कुमार- को लोग स्कन्द कहते हैं।' सनत्कुमारने उपर्युक्त प्रश्नका मूल कारण आहार बताया है। शरीरकी सबसे पहली आवश्यकता 'आहार' अर्थात् भोजन है। जैसा भोजन मिलेगा, वैसा ही शरीर बनेगा, वैसा ही मन बनेगा, वैसी ही बुद्धि होगी। यदि भोजन शुद्ध होगा तो बुद्धि शुद्ध होगी। बुद्धिके शुद्ध होनेपर शङ्कारूपी गाँठें खुल जाती हैं। सत्यपर विश्वास और श्रद्धा दृढ होती है और मोक्ष- की प्राप्ति हो जाती है। भोजनसे ही मन बनता है। जैसा भोजन होगा वैसा ही मन होगा, वैसा ही स्वभाव होगा। डारविनका कथन है कि 'मुझे किसी भी प्राणीका भोजन बताओ, और में उसका स्वभाव बता दूंगा।' इसी सिद्धान्तको उन्होंने खद्योत (जुगनू) आदि कीड़ोंका उनके भोज्य पदार्थोंद्वारा स्वभाव बताकर पुष्ट किया है। यदि हमारा भोजन मनको चञ्चल करनेवाला होगा तो हमारी गति आत्मदर्शनकी ओर नहीं हो सकेगी। मास मद्य तथा अन्य मादक द्रव्योंके सेवनसे तमोगुण बढ़ता है, और विचार भी मलिन होते हैं। मन भी अशान्त रहता है। अनेक प्रकार- के शारीरिक और मानसिक रोग पीछे लग जाते हैं। अण्डे, प्याज इत्यादि सेवन करनेवाला मनुष्य ब्रह्मचर्यका साधन कभी नहीं कर सकता। मास इत्यादि हिंसासे प्राप्त पदार्थोंका सेवन करनेवाला घोर स्वार्थी कामी और क्रोधी (Passionate) हो जाता है। वास्तवमें जिस भोजनसे ब्रह्मचर्यकी सिद्धि हो, वही भोजन हितकर है। वेद कहते हैं— 'ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत।' 'ब्रह्मचर्यके तपसे देवता मृत्युको जीत लेते हैं।' ब्रह्मचारी- को मरनेके समय कष्ट नहीं होता। जिस प्रकार एक मनुष्य पुराने कपड़ेको छोड़ देता है, इसी प्रकार ब्रह्मचारी अपने शरीरको छोड़ देता है। परन्तु साधारण लोगोंकी अवस्था एक बोझसे लदी गाड़ीके समान है जो चूँ-चूँ करती हुई बड़े कष्टसे धीरे-धीरे बढ़ती है। उनका आत्मा बड़े कष्टसे शरीरसे निकलता है। भोजन शुद्धिमें ईमानदारीसे कमाये हुए अर्थसे प्राप्त भोजन भी सम्मिलित है। वह भोजन जिसमें एक मनुष्यने केवल अपना ही भाग ग्रहण किया है अर्थात् आजीविका भी शुद्ध हो और अपनी आजीविकामेंसे यथायोग्य भाग अपने परिवारके व्यक्तियों अथवा आश्रितोंको देकर तत्पश्चात् शेष भागको स्वयं ग्रहण करे। यही यज्ञशिष्ट अमृतभोजन है। गीता- मे कहा है कि 'जो केवल अपने लिये ही कमाते-खाते हैं, वे तो पाप खाते हैं।' ईशोपनिषद्मे कहा है— 'मा गृध कस्यस्विद्धनम् ।' 'किसीके धन और भोगको लोभवश मत लो।' किसीके भागको छलसे स्वयं ग्रहण कर लेना ही चोरी है। योगदर्शनमें बताया है कि चोरी न करनेवाली प्रवृत्ति—अस्तेय- की प्रवृत्तिको सिद्ध कर लेनेसे सब रत्नोंकी प्राप्ति होती है। अतः कहा है कि उत्तम वस्तु खाओ और धर्मपूर्वक उपार्जित की हुई वस्तु ही खाओ। शुद्ध आहारके सेवनसे अन्तःकरण शुद्ध होता है। जब अन्तःकरण शुद्ध होगा तो भगवत् कथा कहने-सुनने और उसके अनुकूल आचरण करनेमे भी मन लगेगा। चालाक मनुष्य, जो धर्मपर नहीं चलता है और जिसका मन विषयोंमें लगा रहता है, अपने अन्तःकरणको बिगाड़ लेता है। ऐसे मनुष्यको भगवत् चर्चांमे कोई आनन्द नहीं आता। परमपदकी प्राप्ति एक ऊँचे पर्वतके उच्च शिखरपर चढ़नेके समान है, जो शनैः शनैः सदाचरण करनेसे हो सकती है। ( ३ ) बृहदारण्यक उपनिषद्के पञ्चम अध्यायमे एक सुन्दर कथा आयी है। प्रजापतिकी तीन सन्तान 'देव', 'मनुष्य' और 'असुर' उनके पास उपदेश ग्रहण करने गये। प्रजापतिनेतीनो- को एक अक्षर 'द'का उपदेश दिया और उनसे पूछा कि 'इसका अभिप्राय समझ लिया'? देवताओंने उत्तर दिया 'हमने यह समझा है कि— दाम्यत इति न आत्थ इति । (बृहदारण्यक० ५ । १ । १) दम—इन्द्रियोंको दमन करो।' प्रजापतिने उत्तर दिया कि 'ठीक समझ गये।' मनुष्योंने उत्तर दिया—'हमने समझा है— दत्त इति न आत्थ इति । (बृहदारण्यक० ५ । १ । २) —दान करो।' प्रजापतिने कहा 'हाँ, तुम भी. समझगये।' फिर असुरोंसे पूछनेपर उन्होने उत्तर दिया— 'हमने यह समझा है कि—'दयध्वम् इति' दया करो।' प्रजापतिने उनको भी सही बतलाया। इस प्रकार तीन शिक्षाएँ मिलीं। 'दम, दान और दया' अर्थात् इन्द्रियोंका दमन करो, दान करो और दया करो। संसारमें तीन प्रकारके मनुष्य हे। देव, मनुष्य और
- कल्याण-मार्ग * १३७
असुर । तीनों प्रजापतिकी संतान हैं। परंतु अपने संस्कारोंसे (कर्मोंके द्वारा स्वभाव बन जानेसे) देव श्रेष्ठ हैं, मनुष्य साधारण हैं, और असुर निकृष्ट हैं। जैसे संस्कार पूर्वजन्ममें होते हैं, वैसा ही स्वभाव इस जन्ममें होता है। परंतु जो ईश्वर- के उपदेशको सुनते हैं, उसपर ध्यान देते हैं, उनकी उन्नति हो जाया करती है। असुर इसी उपदेशके प्रभावसे मनुष्य बनता है और मनुष्य देवता बन जाता है। असुर वे हैं जो अपने लाभके सामने किसी दूसरेके लाभ- की परवा ही नहीं करते। स्वार्थसिद्धि ही उनका परम ध्येय है। अपने लाभके लिये वे दूसरोंको मारने-कूटने अथवा अन्य प्रकारसे हानि पहुँचानेमे जरा भी सङ्कोच नहीं करते। वे प्रकृतिमेंसे अपने लाभके लिये हिंस्रक पशुओंके उदाहरण इकट्ठे कर रखते हैं, जो दूसरोंकी हानि करके अपना पेट भरते हैं। एक कसाई चार पैसेके लिये बकरे या गायको मार डालता है और उसके मासको प्रसन्न होकर बाजारमे बेचता है। यह है कसाईका असुरपन। एक मनुष्य जीभके स्वादके लिये एक पक्षीकी गर्दन मरोड़ देता है। यह है उस मनुष्यका असुरपन। रावणने सीताहरणके समय कब सीताजीके कष्टोंकी परवा की थी। भरी सभामें द्रौपदीको अपमानित करके दुर्योधनने असुरपनका ही परिचय दिया था। इन क्रूर हृदय प्राणियोंके लिये 'दया'से बढ़कर उत्तम और कौन उपदेश हो सकता है ? इनका मानसिक रोग ही निर्दयता है। ये दूसरे प्राणीको अपने-जैसा नहीं समझते। इसका उपचार दया है। जब 'दया' का भाव उदय होगा तो कसाईकी छुरी कुण्ठित हो जायगी। डाकूका पैर दया भाव उदय होनेपर आगे ही न बढ़ सकेगा। इसके उदाहरण महात्मा बुद्धके जीवनमें मिलते हैं। महान् घातकों और डाकुओंका भगवान् बुद्धसे सम्पर्क हुआ और महात्मा बुद्धने प्रजापतिके इस 'द' का उच्चारण किया और उनका जीवन शुद्ध हो गया। साधारण मनुष्य निर्दयी नहीं होते, परंतु वे दूसरेके कष्टोंको दूर करनेके लिये त्याग नहीं करते । उनका मत है 'प्रत्येक मनुष्य अपने लिये है और परमात्मा सबके लिये।' उनकी मनोवृत्ति बहुत सकुचित रहती है। यदि उनमे थोड़ा-सा कष्ट उठाकर दूसरोंके कष्ट दूर करनेका स्वभाव आ जाय, तो दया- का भाव सार्थक हो जाय। दूसरोंके कष्ट दूर करनेके भावसे हमारा आत्मा उच्च हो जाता है और हममें विशालताके भाव आ जाते हैं। यही यज्ञ है। इसीके प्रभावसे मनुष्य देवता बन जाते हैं।
शतपथ ब्राह्मणमे कहा है— देवाश्च वा असुराश्च । उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततोऽसुरा अतिमानेन एव 'कस्मिन् नु वय जुहुयाम' इति स्वेषु एव आस्येषु जुह्वत चेरु । ते अतिमानेन एव परावभूवुः तस्मात् न अतिमन्येत । पराभवस्य ह एतत् मुखं यत् अति- मान । अथ देवा अन्योन्यस्मिन् एव जुह्वत चेरुः । देवेभ्य प्रजापति आत्मानं प्रददौ । यज्ञो ह एषाम् आस, यज्ञो ह देवानामनन्नम् ॥ ( शतपथकाण्ड ५ ब्राह्मण १। १-२ ) प्रजापतिके दोनों पुत्र देव और असुर आपसमे लड पड़े। उनमे असुर अति अभिमानी थे। वे कहने लगे हमें औरोंकी क्या परवा है। इसलिये वे अपने ही मुँहमे आहुतियाँ डालने लगे। इस अभिमानके कारण वे परास्त हो गये। अभिमान नहीं करना चाहिये। यह पराजयका मूल है। देवता अपने मुँहमें न डालकर प्रत्येक दूसरेके मुँहमे आहुतियाँ डालने लगे। प्रजापति उनसे प्रसन्न हो गये और अपने-आपको उनके भेंट कर दिया। उनका यज्ञ हो गया। यज्ञ ही देवोका अन्न है। अर्थात् जो यज्ञ करता है वह देव हो जाता है। अपने स्वार्थ- को छोड़कर दूसरेका उपकार करना ही यज्ञ है। दया जब एक कक्षा और आगे बढ जाती है तो वह दान- के रूपमें परिवर्तित हो जाती है। दान वही है जिससे हम अन्य प्राणियोंके कष्टोंको दूर कर सकें। कहीं धनका देना दान है, कहीं विद्याका देना दान है। कही अन्य शारीरिक सहायता देना दान है। रोगीको ओषधि देना दान है। भूखेको अन्न देना दान है। परंतु दान वह है जिसमे अन्य लोगोंके कल्याण- की भावना हो। दान इस प्रकारसे दे कि लेनेवाला भी ऊपर उठे, पतित न हो जाय। यही भावना उस दानकी है, जो देवोंने किया। इस दानसे देवोंमें पारस्परिक त्रुटियाँ दूर हुईं, लोगोंके व्यक्तिगत कष्ट और विपत्तियाँ कम हुईं। क्रमशः उनका सघटन दृढ हुआ और समाज बलवान् हो गया। असुर इस कामको न कर सके। उनमेंसे प्रत्येकने यही चाहा कि 'सारे भोग मैं ही भोगूँ, सबका स्वामी मै ही बनूँ।' वे ऐसा ही करने लगे। प्रत्येक असुर सब भोगोंको स्वय ही भोगकर दूसरोंको वञ्चित करने लगे। असुर परास्त हो गये। असुरोंका यह काण्ड इस समय यूरोपके अदर घटित हो रहा है। प्रत्येक राष्ट्र सारी वस्तुएँ स्वय ही हड़प लेना चाहता है। प्रजापति उनसे विमुख हो जायगा और वे पराभवको प्राप्त होंगे।
१६वें अध्यायमे वर्णित असुर मानवके लक्षणोंका मिलान
१३८ ५. महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सारा मानव-समाज बड़े वेगसे इसी असुरभावकी ओर दौड़ रहा है। व्यक्तिगत सकुचित स्वार्थने उसको महान् लक्ष्यसे च्युत कर दिया है। पता नहीं इसका क्या परिणाम होगा । गीताके १६वें अध्यायमे वर्णित असुर मानवके लक्षणोंका मिलान करनेसे आजका मानव समाज उसमें प्रायः पूरा उतरता है ।] दया और दानके पश्चात् एक त्रुटि शेष रह जाती है । वह है इन्द्रियनिग्रह । देवता अपने देवत्वके पदसे इसीके अभावसे गिर जाता है । एक कामी पुरुषका कहीं मान नहीं होता। जब इन्द्रियाँ अपने विषयसे पृथक् होने लगती है तो उनकी अन्तर्वृत्ति हो जाती है। गीताके १६ वें अध्यायमें कहा है— त्रिविध नरकस्येद द्वारं नाशनमात्मन । काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रय त्यजेत् ॥ (२१) 'काम, क्रोध और लोभ तीनों आत्माके नाशक और नरकके द्वार हैं। इसलिये इनको त्यागना ही चाहिये ।' य शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुख न परा गतिम् ॥ (गीता १६ । २३) 'जोवेद शास्त्रविहित विधिको छोड़कर (कामनासे प्रेरित होकर) मनमाना काम करते हैं, उनको न तो फलकी सिद्धि होती है, न सुख मिलता है, न मोक्षकी ही प्राप्ति होती है।' (४) त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीय। अत्यन्तमात्मान- माचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति, ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति । (छान्दोग्य० २ । २३ । १) धर्मके तीन भाग हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान मिलकर प्रथम स्कन्ध या भाग होता है । तपस्या ही दूसरा भाग है। आचार्यकुलमें रहता हुआ अपनेको जो तपस्वी बनाता, है यह तीसरा भाग है। वे सभी पुण्यलोकवाले होते हैं, परतु इनमेसे ब्रह्मनिष्ठ मुक्तिको पाता है। यज्ञ यज्ञके सम्बन्धमें मुण्डकोपनिषद्में उपदेश है— यदा लेलायते ह्यर्चि समिद्धे हव्यवाहने । तदाज्यभागावन्तरेणाहुती प्रतिपादयेत् ॥ 'जब अग्नि भलीभाँति जलायी जा चुके और उसमे लौ उठने लगे तब उसमें घी, सामग्री आदिकी आहुतियाँ श्रद्धा- पूर्वक देनी चाहिये । क्योंकि हवनको जलानेवाली अग्नि 'हव्यवाहन' है। अर्थात् हविको सूक्ष्म करके वायुमण्डलमें फैला देती है। इससे वायु शुद्ध होकर रोगके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, और स्वास्थ्यको लाभ पहुँचता है। यज्ञके रसायनशास्त्र (Chemistry के अनुसार Aldehydes नामरू वायु (Gas) पैदा होती है, जो रोगोंको दूर करनेवाली तथा स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। आश्वलायन गृह्यसूत्रमे यज्ञके ये लाभ बतलाये ह— ॐ अयंत इध्म आत्मा जातवेदस्तेन इध्यम्ब वर्धस्व च इद्धय वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन अन्नाद्येन समेधय स्वाहा। (८।२०।२२) 'हे अग्नि ! तू प्रज्वलित होकर हमको प्रज्वलित कर । तू बढ ओर हमको भी बढा प्रजया अर्थात् मतानसे, पशुओसे, आत्मज्ञानसे तथा अन्नमे । यज्ञमे इन चारों पदाथार्की प्राप्ति हो जाती है।' यज्ञमे हव्य पदार्थ सूक्ष्म होकर रोगोंको नाश करते हुए, पुष्टिदायक पदार्थोसे गरीरको पुष्ट करते हैं । पहले हलवाई कभी भी दुबले नहीं देखे जाते थे। क्योंकि वे कढाईके पास बैठकर असली घीकी वाष्पको बराबर ग्रहण करते रहनेसे पुष्ट हो जाते थे। यह है घीके वाष्पका प्रभाव । जब यह बाष्प अन्य ओषधियों तथा सौम्य पदाथंके वाष्पसे युक्त होकर शरीरमें प्रवेश करेगी तो उसके लाभसे गरीर तथा मस्तिष्क पुष्ट होगा और मन शान्त होगा। इनके गान्त होनेपर उपर्युक्त लाभ अर्थात् सन्तान, पशु आदि ऐश्वर्यशाली पदार्थोंकी प्राप्ति होती ही है। मुण्डकोपनिषद्मे कहते हैं— यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुत- मासप्तमास्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वा ॥ एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकाल चाहुतयो ह्याददायन् । त नयन्त्येता. सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥
- कल्याण-मार्ग * १३९ एह्येहीति तमाहुतय सुवर्चस सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति। प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्य सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ( १।२।३–६) 'यज्ञ कई प्रकारके हैं। अग्निहोत्र जिसका नित्य साय और प्रातः करनेका विधान है। दूसरी दर्श-इष्टि, जो अमावस्याको की जानी है, और पौर्णमास-इष्टि जो पूर्णिमाको की जाती है। तीसरी चातुर्मास्य-इष्टि जो वर्षाऋतुमे की जाती है। चौथी आग्रयण-इष्टि, पाँचवीं अतिथि-यज्ञ, छठा वैश्वदेवयज्ञ है। जो गृहस्थ इन यज्ञोंको नहीं करता, उसके सात लोक नष्ट हो जाते हैं। काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी, विश्वरुची-ये अग्निकी सात जिह्वाएँ हैं। जो लोग इस प्रकार प्रदीप्त अग्निमें आहुतियाँ देते हैं, उनकी आहुतियोंको सूर्यकी किरणें उस स्थानपर पहुँचा देती हैं, जहाँ देवोंके पति अर्थात् ब्रह्मका निवास है। ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके साथ चलती हुई मानो यजमानको बड़ी मीठी बोलीमें पुण्यलोककी ओर बुलाती हैं। तात्पर्य यह है कि नित्य श्रद्धाके साथ यज्ञ करनेसे जीवन पवित्र होता है और परलोक बनता है।' अध्ययन तैत्तिरीय उपनिषद्में शिक्षाका विषय मुख्यतया प्रतिपादित किया है। उसमें स्वाध्यायके विषयमे लिखा है— ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतर । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टि । स्वाध्याय-प्रवचने एवेति नाको मौद्गल्य । तद्धि तपस्तद्धि तप ॥ (१।९।१) 'ऋत अर्थात् सृष्टिके नियमोंको यानी विज्ञान (Science) को पढ़ो-पढ़ाओ। स्वाध्याय कहते हैं स्वय पढनेको एवं प्रवचन कहते हैं दूसरोंके पढ़ानेको। तपके साथ पढ़ो-पढ़ाओ। तप कहते हैं सात्विक श्रमको। इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पढ़ो-पढाओ। शान्तिपूर्वक पढो-पढाओ। अग्नि (शक्ति 'Power' अर्थात् भौतिक विज्ञान एवं इंजिनियरिंग) को पढो-पढाओ। अग्निहोत्रको करते हुए पढो पढाओ। अतिथिकी सेवा करते हुए पढ़ो-पढाओ। मनुष्यमात्रके कल्याणपर विचार करते हुए पढ़ो-पढाओ। प्रजा अर्थात् सर्वसाधारणके हितका ध्यान करते हुए पढो-पढ़ाओ। प्रजन अर्थात् सन्तानवृद्धिकी समस्याओंपर विचार करते हुए पढो पढाओ। इसके अन्तर्गत केवल मनुष्यकी नहीं वर पशु-पक्षी तथा वृक्षादिकी उत्पत्ति तथा वृद्धिके नियम भी आ जाते हैं। अपनी जातिके हितकी कामनासे पढ़े। राथीतर आचार्यका मत है कि सत्यभाषण सबसे बड़ी चीज है। सत्यभाषण कभी न छोड़ना चाहिये। पौरुशिष्टि आचार्यका कथन है कि तप मुख्य हैं, तपपर बल देना चाहिये। मुद्गल आचार्यके शिष्य नाक स्वाध्याय और प्रवचन-पर बहुत बल देते हैं।' स्वाध्यायसे मस्तिष्कवृद्धिके साथ-साथ आत्मिक उन्नति भी होती है। जैसा मन सोचता है, वैसा बोलता है। जैसा बोलता है, वैसा करता है। दूसरे, पुराना अनुभव बराबर प्राप्त होता रहता है और हमें क्षेत्र मिलता है कि उन अनुभवोंमें हम वृद्धि कर सकें। जहाँ पठन-पाठनकी क्रिया नहीं है, वहाँ पैतृक अनुभव न प्राप्त होनेसे क्रमशः ज्ञान-वृद्धि रुक जाती है। यही ऋषि-ऋण है, जो तीन ऋणोंमेसे एक है, जिसके पालनार्थ हम यज्ञोपवीत धारण करते हैं। गृहस्थियोंको प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा स्वाध्याय करते रहना चाहिये। कभी छोड़ना नहीं चाहिये। दान धर्मकी तीसरी शाखा दान है। उपनिषदोंमें कहा है— श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया देयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । 'श्रद्धासे देना चाहिये, अश्रद्धासे देना चाहिये। सौन्दर्यसे देना चाहिये। लोक लज्जासे देना चाहिये। भय अर्थात् पाप-पुण्यके विचारसे देना चाहिये। संविदा अर्थात् ज्ञानपूर्वक दो।' अर्थात् जैसा ऊपर कहा जा चुका है कि मनुष्यमात्रके कल्याणको समझकर देना चाहिये। दान पापोंकी वृद्धि करनेवाला न हो। धर्मका दूसरा स्कन्ध तप है। अर्थात् इन्द्रियदमनके साथ-साथ आत्मोन्नतिके लिये घोर परिश्रम करना तप है। तीसरा स्कन्ध है कि नियमके साथ आचार्यकुलमें नियमित समयके लिये निवास करना। गृहस्थ अपनी सन्तान तथा अन्य बालकोंको शिक्षा-दान कराकर इस नियमका पालन कर सकते हैं।
१४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आध्यात्मिक मार्गमे अग्रसर होनेके लिये आहारशुद्धिमे ओंकारका (भगवन्नामका ) जाप कर रहा होता हूँ । काम चलना चाहिये । और अपने अंदर दया, दान और आता होगा तो मेरे मनकी ड्योढीको बंद पाकर लौट जाता इन्द्रियदमनकी भावनाको बढाना चाहिये । निरन्तर होगा ।' अतः मनको खाली न रखना सबमे उत्तम यज्ञ करते हुए अध्ययनको भी वरावर करते रहना ब्रह्मचर्यका साधन है । चाहिये । आहारशुद्धि, यज्ञ और दान कर्म हैं, जिनको इन साधनों को अपनानेसे मनुष्यका कल्याण होता है, प्रयत्नसे कर सकते हैं । दया स्वयं आहारशुद्धिमे पैदा और राष्ट्रका भी कल्याण होता है । एक विद्वान् धर्मात्मा होने लगती है । आहारका प्रभाव इन्द्रियदमनपर पड़ता है । योगी राष्ट्रकी गतिविधियोको बदल देना है । ऐसे पुरुष देवता दूसरे, अध्ययन मनोविचारोंको भी शुद्ध करता है । हो जाते हैं । जिनमे दिव्य गुण हो, वह देवता है । धन्य है स्वामी दयानन्दमे जब बगालके प्रसिद्ध नेता अश्विनीकुमार- वह राष्ट्र जहाँ ऐसा देव-समाज प्रमुख हो । जहाँ असुर अर्थात् ने ब्रह्मचर्यके साधनोपर प्रश्न करते हुए पूछा कि 'महाराज ! स्वार्थी, क्रूरकर्मा तथा दुराचारी व्यक्तियोंका प्राधान्य है, आपने यह ऊँची स्थिति किस साधना और किस उपायमे वहीं कष्ट है, दुःख है और निश्चित पराभव है। हमारे राष्ट्रके प्राप्त की है ?' तो उन्होंने बड़ा ही सुन्दर उत्तर दिया कि नेता, हमारे राज्यके सूत्रधार इसी उपनिषद् धर्मको पालन 'इसका उपाय बड़ा सरल है। मे कभी अपने मनको खाली करते हुए राष्ट्रको परमोन्नत दशामें पहुँचा सकते हैं । नहीं रहने देता । मै हर समय किसी-न किसी काममें लगा 'ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति' । वेद कहता है कि रहता हूँ । कभी वेदभाष्य, कभी वेदाङ्गप्रकाश लिखना, 'ब्रह्मचर्य और तपसे राजा राष्ट्रकी रक्षा करता है ।' धर्मके कभी दर्शकोंके प्रश्नोंका समाधान, कभी शास्त्रार्थ और कभी इन नियमोंपर चलना ही ब्रह्मचर्य है, तप है । ये ही नियम पत्रोत्तर लिखवाता हूँ। जब कोई और काम नहीं होता तो महाराज जनककी तरह व्यक्तिको विदेह बना सकते हैं । उपनिषत्सार ( रचयिता—श्रीभवदेवजी झा ) यही सब उपनिषदोंका सार । सार-रूप केवल ईश्वर है, यह संसार असार ॥ १ ॥ क्षणभङ्गुर दुर्लभ मानव-तन, विषय सभी निस्सार । बरबस इस मनको वशमें कर, करो आत्म उद्धार ॥ २ ॥ भू-मण्डलके कण-कणमें है, विभुका ही विस्तार । सबमें जीव समान जानकर, करो तुल्य-व्यवहार ॥ ३ ॥ अनासक्त होकर करना है, निज आहार-विहार । अहंकार-परिहार न जबतक, नहीं कर्म-निस्तार ॥ ४ ॥ सत्य-शोध ही भव-रोगोंका, एक मात्र उपचार । आत्म-बोध ही पहुँचाता है, जगन्मुक्तिके द्वार ॥ ५ ॥ देही अजर-अमर-अक्षर है, देह विकारागार । यही देह-देही-विवेक ही, देता पार उतार ॥ ६ ॥ है स्वरूप-विस्मृति ही माया, और ब्रह्म ओंकार । निर्गुण-सगुण एक ईश्वर है, निराकार-साकार ॥ ७ ॥ 'मैं' हूँ निर्व्यापार न मेरा, नाम-रूप-आकार । 'मैं' भी वही ब्रह्म हूँ, सत्-चित्-सुखका पारावार ॥ ८ ॥
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भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म
( लेखक—प० श्रीरामकिङ्करजी उपाध्याय )
[बायाँ स्तम्भ]
गिरिराज हिमालयके सर्वोच्च शिखरका नाम है—कैलास (आनन्दका निवास स्थान) । सचमुच आनन्द यहाँ मूर्तिमान् होकर निवास करता है। यह है भगवान् भूतभावन शिवकी, क्रीडास्थली । इस शिखरके ही एकान्त शान्त प्रदेशमें एक है विशाल वट-वृक्ष, जिसे भगवान् शिवका विश्रामस्थल कहा जाता है। पर यह विश्राम शब्द भी है सांकेतिक ही—
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा ॥
—मानकर शम्भु विश्रामके मिस यहाँ आकर प्रभु-प्रेममे तन्मय हो उनके नाम-रूपका स्मरण करते रहते हैं ।
एक दिन शशाङ्कशेखर अपने गणोंसे बिना कुछ कहे ही वटकी सुशीतल छायामें व्याघ्रचर्म बिछा सहज ही जा विराजे । गिरिराज-नन्दिनी भवानी सुअवसर देख अनिमन्त्रित होनेपर भी भगवान् शिवके चरणोंमे जाकर प्रणत हुईं । परम कृपालु महेशने उनके मानरहित प्रेमको देखकर उनका सत्कार करते हुए बैठनेको आसन दिया । शैलजाके हृदयमें पूर्वजन्मसे ही एक सन्देह गूँज रहा था। उसको पूर्ण रीतिसे निवृत्त कर लेना ही उन्हें उचित जान पड़ा। प्रमथेशकी आज्ञा पाकर उन्होंने प्रश्न किया—'प्रभु ! मैने वेदवक्ता मुनियोंके मुखसे ब्रह्मका जो वर्णन सुना है, उसमें उन्हें व्यापक, विरज, अज, अकल, अनीह और अभेद आदि नामोंसे सम्बोधित किया गया है। क्या ऐसे ब्रह्मका अवतार सम्भव है ?'
ब्रह्म जो व्यापक विरज अज अकल अनीह अभेद । सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानन वेद ॥
हाँ, त्रैलोक्य पालक भगवान् विष्णुका अवतार राम-रूपमे होता है। यह मैने ऋषियोंके मुखसे सुना है। परंतु ब्रह्मका अवतार तो बुद्धिमे न आनेवाली बात है। उपनिषदोंमे भी विशेषरूपसे निर्गुण निर्विशेषका वर्णन आता है, यह भी मैंने सुना है। क्या उपनिषत्-कथित निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्म और रघुवंशशिरोमणि राममें कोई भेद नहीं ? आस्तिकोंके लिये तो श्रुति ही परम प्रमाण है। और जब वह निर्गुण ब्रह्मके वर्णनको ही विशेषरूपसे अपना लक्ष्य बनाती है, तब सगुण-साकार रामके प्रति आपका यह प्रेममय भाव कुछ समझमें नहीं आता। राम ही ब्रह्म है, क्या यह आपका स्वतन्त्र मत है ? आपसे बढ़कर वेदार्थका ज्ञाता और कौन है ?
[दायाँ स्तम्भ]
तुम्ह त्रिभुवन गुर वेद बखाना । आन जीव पांवर का जाना ॥ अस्तु । प्रभु जे मुनि परमारथवादी । कहहि राम कहँ ब्रह्म अनादी ॥ रामु सो अवध नृपनि सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई ॥ जौं अनीह व्यापक विभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥
अपर्णाकी छलविहीन वाणी सुनकर कामारि परम प्रसन्न हुए, क्योंकि इसी मिससे उन्हे प्रभुके गुणानुवाद गानेका एक सुअवसर प्राप्त हो गया । प्रभुके रूप-गुणका स्मरण होते ही गङ्गाधरके नेत्रोंमे प्रेमाश्रु छलक पड़े। हृदयसे भक्तिकी एक नव-मन्दाकिनी निकलकर भगवती भवानीको आप्लावित और शीतल करने लगी—
मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह । रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह ॥
उत्तर देते हुए भगवान् शिवने कहा—उमा ! प्रभु-विषयक प्रश्न तो सदा ही परम कल्याणकारी है। पर तुम्हारा यह कहना मुझे रुचिकर नहीं लगा कि क्या 'वेद-प्रतिपादित ब्रह्म ही राम है ?' ऐसा सन्देह तो वेदार्थका ठीक ज्ञान न रखनेवाले ही करते हैं।
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच । पाषंडी हरि-पद विमुख जानहि झूठ न साँच ॥
शिवे ! वास्तवमें 'ब्रह्म-तत्त्व' अचिन्त्य ही है। इसीलिये वेदोंने भी उसका वर्णन 'नेति, नेति' रूपसे ही किया है ।
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥
तुमने कहा कि 'राम ही ब्रह्म हैं। क्या यह आपका स्वतन्त्र मत है ?' पर तुम्हारा यह कथन समीचीन नहीं। श्रुति-विरुद्ध तो भगवत्-कथन भी आस्तिकोंको मान्य नहीं। इसीसे तो बुद्ध भगवान्के प्रति श्रद्धाका भाव रखते हुए भी उनकी वेद विरुद्ध कथित बातोको कोई भी आस्तिक स्वीकार नहीं करता—
अतुलित महिमा वेद की तुलसी कीन्ह विचार । ज निन्दत निन्दित भयो विदित बुद्ध अवतार ॥
इसलिये मै जो कुछ कहूँगा, वह श्रुति-सम्मत ही कहूँगा। जैसा मैने पूर्वमें ही कहा कि वेद भी उस ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ निर्देश करनेमें मौन ही रहते हैं। तुम्हारा यह कथन किसी अंशमें यद्यपि ठीक ही है कि उपनिषदोंमें निर्गुण अचिन्त्यरूपका
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१४२ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ही विशेषरूपसे निर्देश किया गया है। पर यह तो असमर्थताके कारण ही, क्योंकि निर्गुण व्यापक रूपसे तो उसका समझाना कुछ सरल भी है। पर उसके दिव्य चिदानन्दमय सौन्दर्य- माधुर्य-सुधा समुद्र सगुण-साकार मगल विग्रहके असमोर्ध्व अचिन्त्यानन्त कल्याण-गुणगण और उसकी मुनि मन हारिणी कमनीय रूप माधुरीका न तो यथार्थतः वर्णन ही किया जा सकता है, न उसे समझाया ही जा सकता है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन न जानइ कोइ । सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ निर्गुण रूप तो विचारगम्य है और विचारका उत्पादन साधनोंसे सभव है। पर सगुण स्वरूप तो बिना प्रेमके समझा ही नहीं जा सकता। और प्रेम साधनसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता। वह तो प्रभु-कृपासे ही सम्भव है। इसलिये जहाँ- तक साधन-बल है, वहाँतकके स्वरूपका निर्देश कर सगुण- स्वरूपका केवल सकेत करते हुए ही उपनिषद् मौन हो जाते हैं। वेद तो स्वय श्रीभगवान्के दर्शन एव उनके प्रेमकी सदा आकाङ्क्षा करते रहते हैं। इसीलिये तो नृपालचूडामणि मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराघवेन्द्रके राज्याभिषेकके अवसर- पर चारों वेद 'बदी वेष' मे प्रभुके स्वरूपका विशद विवेचन करते हुए अन्तमें कहते है— ज ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन-पर ध्यावहीं । ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥ करुनायतन प्रभु सदुनाकर देव यह वर माँगहीं । मन वचन कर्म विकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥ वास्तवमे प्राकृतगुणरहित सगुण ब्रह्म वर्ण्य है ही नहीं। वे तो प्रेम ही करनेयोग्य है। वर्णन तो निर्गुणका ही सम्भव है। इसीसे अगस्त्यजीने प्रभुके चिन्मय स्वरूपका विवेचन करते हुए अन्तमें कहा— जद्यपि ब्रह्म अखड अनता । अनुभवगम्य मजहि जेहि सता ॥ अस तव रूप बखानउँ जानउँ । फिरिफिरि सगुन ब्रह्मरति मानउँ ॥ जबतक प्रभु कृपा किंवा सत-कृपासे हृदयमे प्रेमका प्राकट्य न हो जाय, तबतक प्रभुकी मङ्गलमयी लीलाका वर्णन सार्थक नहीं। गिर्रिजे ! मैं स्वय भी अनधिकारीके प्रति इसका उपदेश नहीं करता। तुम्हे मै अपनी एक चोरी बता रहा हूँ। बात उस समयकी है, जब तुम दक्ष तनया सतीके रूपमे मेरे निकट थी, उस समय तुम्हारा चित्त बड़ा ही सशय-ग्रस्त था। इसीसे जब मैने सुना कि प्रभु अपनी दिव्य लीलाका प्राकट्य करनेके लिये अयोध्यामें अवतरित हो गये है, तब मैंने इस सुखवादका सुनाना तुमसे उचित न समझा। क्योंकि रसका प्रसङ्ग सच्चा रसिक ही समझ सकता है। हाँ, मैने परमप्रभु- प्रेमी काकभुशुण्डिको अवश्य ही साथ ले लिया। औरउ एकु कहउँ निज चोरी। सुनि गिरिजा अति दृढ मति तोरी ॥ कागभुसुडि सग हम दोऊ । मनुज रूप जानइ नहि कोऊ ॥ परमानन्द प्रेम सुख फूले । वीथिन्ह फिरहि मगन मन भूले ॥ पर अयोध्याकी वीथियोंमे विहरण करनेपर भी बिना प्रभु दर्शनके हमारी तृप्ति न हुई। तब हम दोनोंने गुरु-शिष्य- रूपसे ज्योतिषीका बाना बनाया और अपने गुणका ख्यापन करनेके लिये अयोध्याके राजप्रासादकी दासियोंके पुत्रोंके हाथ देखने प्रारम्भ किये। अन्तम दासियोंने जाकर कौसल्या अम्बासे इसकी सूचना दी— अग्रह आजु आगनि एक आयो । बूढो बडो प्रमाणिक ब्राह्मन सकर नाम सुहायो ॥ अन्तमें हम दोनोंकी मनोकामना पूर्ण हुई और कौसल्या अम्बाने अपने लालका भविष्य जाननेकी इच्छासे हमें भीतर बुलवा लिया। गिर्रिजे ! शिशु-ब्रह्मके इस नव-नील- नीरद दिव्य वपुपुको निहारकर नेत्रोंको जो आनन्द हुआ, वह वर्णनातीत है। वह उपनिषत् कथित व्यापक ब्रह्म कौसल्या अम्बाकी नन्ही सी गोदीमें पड़ा मन्द-मन्द मुसकरा रहा था। सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रकी यह प्रेमपराधीनता देख मेरे मुखसे बरबस ही निकल पड़ा कि— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन विगत विनोद । सो अज प्रेम-भगति-वस कौसल्या कें गोद ॥ प्रिये ! शिशु ब्रह्मकी यह अद्भुत झाँकी, वाणीका नहीं, नेत्रका विषय है। रूप सरूहि नहि कहि श्रुति सेषा । सो जानइ सपनेहुँ जहि देखा ॥ प्रभु सोभा सुख जानहि नयना। कहि किमि सकहि तिन्हहि नहिं बयना॥ मङ्गलमय प्रभुके श्रीकरारविन्दोंको अपने हाथमें ले मैने कालातीत प्रभुका भविष्य-कथन भी कर डाला। इस सौभाग्य- सुखसे मे कुछ कालमें वञ्चित कर दिया गया। क्यों, उन अनीह प्रभु लीला प्रेम-विहारीको बुभुक्षा सता रही थी और वह पूर्णकाम वात्सल्य सुधारिपूर्ण पवित्र मातृ-स्तनोंका पान करनेके लिये अत्यन्त लालायित हो रहा था। प्रभुकी इस परम कौतूहलमयी लीलाका वार बार स्मरण करता हुआ मे कैलास- शिखरपर लौट आया। पर लौटनेपर भी यह रहस्य मैंने उस समय तुम (सती) से छिपा ही रक्खा और आज उसे तब व्यक्त कर रहा हूँ, जब तुम्हारे हृदयमे प्रभुको पहचाननेकी सच्ची जिज्ञासा जाग्रत् हो गयी है।
- भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १४३ निर्गुण निराकार ब्रह्मकी उपनिषत्-कथित पद्धतिसे उपासनाके पश्चात् ही प्रभुके पुनीत पाद-पद्मोंमे प्रेम उत्पन्न होता है। उपनिषद्-ज्ञानकी परिसमाप्तिपर ही प्रभु-प्रेमका पावन प्रारम्भ होता है— जहँ लगि साधन वेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी ॥ सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। गमकूपा काहू इक पाई ॥ ज्ञान-वैराग्यके द्वारा जिन्होंने अपने सच्चे नेत्रोको प्राप्त कर लिया है, उपनिषद् केवल उन्हीको रघुवगमणिके इस स्वरूपका सकेत करते हैं। अब मै तुम्हारे प्रश्नोंकी ओर आता हूँ। तुम्हारा यह कथन 'अगुण सगुण कैसे हो सकता है?' इसके लिये केवल जलका उदाहरण देना पर्याप्त है। जैसे जल वर्फ रूपमें परिणत होकर भी जल ही रहता है—उसमे कोई विकृति नहीं आती, उसी तरह निर्गुणका सगुण रूपमे परिणत होना है— जो गुनरहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहि जैसें ॥ तुम्हारा यह कथन भी सर्वथा भ्रान्त ही है—'व्यापक एकदेशीय हुए बिना अवतरित कैसे होसकता है?' वास्तवमें अवतरित होनेपर भी सर्व देश उनमें ही निवास करते हैं। एक देशमें उनका दर्शन तो हमारे नेत्रकी सीमित शक्तिके कारण ही प्रतीत होता है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो सर्वव्यापकताकी सच्ची सिद्धि तो प्रभुके प्राकट्यकालमें ही सम्भव है, क्योंकि निर्गुण-निराकार रूपसे वह सर्वत्र है ही, इसका क्या प्रमाण ? उसका होना तो केवल माना हुआ ही है, क्योंकि वह रूपवान् तो है नहीं। अवतारकालमे एक देशमें प्रतीत होते हुए भी 'सर्वदेश उसमें है और वह सर्व-देशमें है' यह स्पष्ट रूपसे सिद्ध हो जाता है। एक बार परम भक्त कागजीको ऐसा ही सदेह हो गया था। श्रीदशरथजीके मणिमय प्राङ्गणमें शिशु-ब्रह्म बाल-क्रीड़ामें निमग्न था। महाभाग काग भी कौसल्यानन्दनकी इस मङ्गलमयीलीलाका आनन्द लेनेके लिये 'लघु वायस वपु' धारण कर उनके निकट ही विचरण कर रहा था। अचानक प्रभुको एक विनोद सूझा। कागको और भी निकट बुलानेके लिये अपने हाथका मालपुआ उसकी ओर बढ़ा दिया। पर ज्यों ही प्रसादके लोभसे भुशुण्डि निकट आया, त्यों ही प्रभुने अपने श्रीकरारविन्दोंको खींच लिया। इस प्रकारका विनोद कुछ क्षणोंतक चलता रहा। कागके हृदयमें एक नवीन प्रश्न उठ खड़ा हुआ, प्रभुको न पकड़ सकनेकी इस असमर्थता-को देखकर— प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह । कवन चरित्र करत प्रभु चिदानन्द-सदोह ॥ फिर क्या था। प्रभुने अपनी भुजाएँ फैला दीं पकड़नेके लिये और काग भी अपनी सम्पूर्ण शक्तिके साथ उड़ चला। अपनी इस अवस्थाका वर्णन उसने इन शब्दोंमें किया है— सप्तावरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि । गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयउँ बहोरि ॥ लौटकर आना पड़ा प्रभुके उन्हीं अभयप्रद चरणोंमें। पर प्रभुने सोचा सर्वव्यापकताके दर्शनको अधूरा ही क्यों छोड़ा जाय। मुस्कराकर राघवेन्द्रने मुँह खोला और तुरंत कागको उदरस्थ कर लिया। तब दिखायी पड़ा कागको वह आश्चर्यमय कौतुक, जिसका वर्णन उसने इन शब्दोंमे किया है— उदर माझ सुनु अडजराया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ अति विचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका ॥ कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रवि रजनीसा ॥ अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥ सागर सरि सर विपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि विस्तारा ॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किन्नर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥ जो नहि देखा नहि सुना जो मनहूँ न समाइ । सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि विधि जाइ ॥ एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक । एहि बिधि देखत फिरतँ मैं अंड कटाह अनेक ॥ इस प्रकार रामने भक्त कागको अपनी सर्वकारणता और सर्वाश्रयता दिखला दी। × × × × वास्तवमे अवतार-कालमे भी ब्रह्म एक देशमें सीमित नहीं हो जाता। जैसे सूर्यमण्डल उतना लघु नहीं, जितना हमारे लघु नेत्रोंसे दीखता है, वह तो अकेला ही समग्र ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता रहता है। उसी तरह ब्रह्मका एक देशमें प्रतीत होनेमे भी अपना भ्रम ही मानना चाहिये। वहाँ भी वह सर्व-देशीय ही है, एकदेशीय नहीं। रविमंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु त्रिभुवन तम भागा ॥ तुम्हारा यह कथन कि वह देह कैसे धारण कर सकता है? यह भी ब्रह्म रामके देहका ठीक स्वरूप न जाननेके कारण ही है। क्या उसका शरीर साधारण प्राणियोंका-सा पञ्चतत्त्वोंसे निर्मित है? वास्तवमें प्रभुमें तो देह-देहीका कोई भेद है ही नहीं, इसीलिये उनके देहको भी सच्चिदानन्दघन-विग्रह कहा जाता है।
१४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * चिदानंदमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी ॥ सच्चिदानन्दमय होनेसे उनको इन मायिक नेत्रोंसे देखा भी नहीं जा सकता। प्रभुका स्वरूप इन्द्रियोंका विषय है ही नहीं, इसीसे वाल्मीकिजीने प्रभुकी वन्दना करते हुए कहा— गम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर । अविगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥ गिरिजे ! सृष्टिकी एक भी वस्तुका समग्र रूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर सर्वमय और सर्वकारण एव साथ ही सर्वपर तथा सर्व कारणकारणातीत ब्रह्म रामका विवेचन बुद्धि या वाणीसे कैसे सम्भव है। प्रकाश्य प्रकाशकको प्रकाशित करे, क्या यह कभी देखा-सुना गया है ? राम तो इन्द्रिय, मन, देवता—सभीके प्रकाशक, जीवके भी परम प्रकाशक हैं। फिर अपनी उस बुद्धिसे हम उनके ठीक स्वरूप समझने या समझानेकी चेष्टा करें, यह कितनी हास्यास्पद बात है ? विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥ सव कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ इसीलिये कहना पड़ता है— राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥ वे अवतार ही क्यों लेते हैं ? इसका भी ठीक उत्तर नहीं दिया जा सकता ? यह है भी उनके स्वरूपके अनुरूप ही । यदि ठीक बताया जा सकता तो वे भी ज्ञात विषयोंकी श्रेणीमें आ जाते । उनके अवतरित होनेके विषयमे प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाके अनुरूप ही अर्थ लेता है। देवता समझते हैं— हमारी रक्षाके लिये, धार्मिक मुनि समझते हैं धर्मरक्षाके लिये और राक्षसोंको भी यह सोचनेका अधिकार है कि वे उन्हें गति देनेके लिये आते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो प्रभुके अवतार लेनेसे सभी जीवोंको कुछ-न कुछ प्राप्त होता है। वे तो कारणातीत होनेसे सहज ही अवतरित होते हैं, पर उनके इस सहज कारुण्यसे असंख्य जीवोंको सन्मार्ग और कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि जिन अमलात्मा परमहंसोंने निर्गुणोपासनासे अपने कर्म-बन्धनोंका सर्वथा उच्छेद कर डाला है और ज्ञाननिष्ठामें सर्वथा परिनिष्ठित हैं, उनके ऊपर प्रसन्न होकर उनको अपने इस सच्चिदानन्द- विग्रहका प्रत्यक्ष दर्शन और भक्तियोगमें प्रवृत्त करानेके लिये ही प्रभु अवतरित होते हैं। शुभे ! सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमारोंको तो तुम जानती ही हो, उनका दिव्य-देह भौतिक नहीं, जिनकी सदा एकही-सी बाल्यावस्था बनी रहती है और नित्य निरन्तर ब्रह्मानन्दमे सर्वथा परिनिष्ठ हैं, जिन्हें मूर्तिमान् वेद कहना भी अत्युक्ति न होगी— ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुरूपारीना ॥ रूप धरे जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि विगत बिभेदा ॥ उन्होने भी जिस समय आनन्दकन्द प्रभुका श्रीअवध धाममे दर्शन किया, सारी ज्ञाननिष्ठाको बहा दिया । करते भी क्या, प्रभुके कोटि-कन्दर्प कमनीय श्रीअङ्गके दर्शनका प्रभाव ही ऐसा है। उन्होंने मनको निष्ठायुक्त बनाये रखनेकी बड़ी चेष्टा की, पर— मुनि रघुवर छवि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥ नेत्र स्थिर हो गये, पलके भी नहीं गिरतीं, प्रेमसे प्रभुके श्रीचरणोंमें बार-बार प्रणाम करते हैं और फिर तो उन्हें इस स्वरूपमें इतना अधिक आनन्द आया कि उन्होने सदा-सर्वदाके लिये प्रभुसे प्रेमभक्तिकी ही कामना की। परमानद कृपायतन मन परिपूरन काम । प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ क्या ब्रह्मविद्वरिष्ठ सनकादि-जैसे परम तत्त्वज्ञ और वेदार्थके यथार्थ ज्ञाता किसी साधारण राजकुमारको किंवा किसी लौकिक रूपको देखकर इस प्रकार विह्वल हो सकते हैं ? इससे तुम समझ सकती हो कि मै ही नहीं, अपितु अन्य सभी वेदान्तपरिनिष्ठ महापुरुष रघुवंशशिरोमणि सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराघवेन्द्रको ब्रह्मसे अभिन्न ही नहीं—उनसे बढ़कर मानते हैं और ब्रह्मानन्दको भुलाकर उनकी भक्तिमे सलग्न हो जाते हैं। भेद तो उनको ही जान पड़ता है जो वासनामलिन और ज्ञाननेत्रविहीन हैं। यदि ऐसे लोग वेदका नाम लेकर भी भेदका प्रतिपादन करें तो उन्हें नास्तिक और वेदज्ञानशून्य ही समझना चाहिये । उनकी बातपर ध्यान न देना ही उचित है। अज्ञ अकोविद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ सत सभा नहि देखी ॥ कहहि ते वेद असमत बानी । जिन्ह कें सूझ न लाभु नहि हानी ॥ और तब भगवान् पञ्चमुख शङ्करने अपना दृढ मत व्यक्त करते हुए पाँचों मुखोंसे कहा कि 'जिन्हें वेद ऐसा
- भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १४५ कहते हैं, वे ही रघुवंश-शिरोमणि राम मेरे स्वामी हैं— ( १ ) पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ । रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ ॥ ( २ ) विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥ सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ ( ३ ) जौं सपने सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥ जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपालु रघुराई ॥ ( ४ ) बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ विधि नाना ॥ आननरहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बक्ता बड जोगी ॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥ जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान । सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान ॥ ( ५ ) कासीं मरत जतु अवलोकी । जासु नाम बल करउँ बिलोकी ॥ सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुबर सब उर अन्तरजामी ॥ और अन्तमे उपसहार करते हुए भगवान् शङ्करने कहा— अस निज हृदयँ बिचारि तज संसय भजु राम पद । सुनु गिरिराजकुमारि भ्रम-तम रविकर बचन मम ॥ कल्याणमय शिवकी भ्रमभञ्जक वचनावलीको सुनकर गिरिराजकन्दिनीका सारा संदेह जाता रहा और राघवेन्द्र श्रीरामके श्रीचरणोंमें उन्हें अनुपम अनुराग हो गया । भगवान् शङ्करके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे बोलीं— ससिकर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥ तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ । राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ ॥ नाथ कृपाँ अब गयउ विषादा । सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥ श्रीपार्वतीजी ही नहीं, भूतभावन भगवान् शिवके इस पवित्र भाषणसे वहाँका कण-कण अपनेको कृतकृत्य अनुभव करने लगा । उपर्युक्त विवेचनसे अवधेशशिरोमणि भगवान् श्रीरामका औपनिषद ब्रह्मसे अभेद ही नहीं सिद्ध होता, बल्कि उनके विशेषज्ञत्वका भी प्रतिपादन होता है । श्रीरामचरितमानसमें ऐसे प्रसङ्ग और भी हैं, उनमेंसे एक प्रसङ्गको संक्षेपमे लिखकर लेख समाप्त किया जाता है । भगवान् श्रीराघवेन्द्र तथा उनके अनुज श्रीलक्ष्मणजी महामुनि गुरु विश्वामित्रजीके साथ मिथिला पधारते हैं । विश्वामित्रजीकी आज्ञासे नगरसे बाहर सभी एक सुन्दर आम्र- वाटिका में ठहरते हैं । यह समाचार जब श्रीमिथिलेशको मिलता है तो वे परम प्रसन्न होकर पवित्र मन्त्री, सैनिक, ब्राह्मण, श्रेष्ठ गुरु और जातिके सरदारोंको साथ लेकर मुनिराजके दर्शनार्थ पधारते हैं । उस समय श्रीराघवेन्द्र अनुज श्रीलक्ष्मण- जी के साथ पुष्पवाटिका देखने गये हुए थे । उनके पीछेसे सौभाग्यशाली महाराज जनक मुनिराजको साष्टाङ्ग प्रणाम करके और उनका आशीर्वाद प्राप्त करके एवं अन्यान्य ब्राह्मणोंको सादर नमस्कार करके मुनिकी आज्ञासे वहाँ- बैठ जाते हैं । इतनेमें ही मृदु-वयस किशोर, नेत्रानन्द-दाता, विश्वचित्त-चौर श्याम-गौर दोनों भ्राता वहाँ आ पहुँचते हैं । उनके वहाँ पहुँचते ही इतना सहज प्रभाव पड़ता है कि सभी तेज- ज्ञान-वयोवृद्ध, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, वीरेन्द्र, विप्रेन्द्र आदिके सहित जीवन्मुक्त शिरोमणि तथा सच्चे जिज्ञासुओंको ब्रह्म-तत्त्वका उपदेश देनेवाले विदेहराज जनक सहसा उठ खड़े होते हैं और अपने-आप बैठना भूल जाते हैं । मुनि विश्वामित्रके बैठानेपर बैठते हैं । उस समय सबकी क्या दशा होती है और प्रेम-सुधा-सागर-निमग्न विदेहराज मुनिराजसे क्या पूछते हैं, इसको रामचरितमानसकी भाषामे ही सुनिये— भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । वारि विलोचन पुलकित गाता ॥ मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ विदेहु विदेहु विसेषी ॥ प्रेममगन मनु जानि नृपु करि विवेकु धरि धीर । बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर ॥ कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय वेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज विरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद-चकोरा ॥ इन्हहि विलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ जिनके दिव्य मधुर सौन्दर्यके दर्शनमात्रसे सहज वैराग्य- मय चित्तवाले जनक चकोर बनकर श्रीराघवेन्द्रके मुखचन्द्रको निर्निमेष देखते रह जाते हैं, इतना आत्यन्तिक प्रेमानन्द उत्पन्न होता है कि उनका ब्रह्मानन्दमें नित्य-निमग्न मन उसे छोड़ देनेको बाध्य होता है और आँखोंसे आँसू बहाते हुए गद्गद होकर वे बड़ी गम्भीरताके साथ जिन सौन्दर्य-सुधा- निधिका सच्चा परिचय जानना चाहते हैं, वे रामचरितमानसके श्रीराघवेन्द्र साक्षात् औपनिषद ब्रह्म हैं या ब्रह्मसे भी बढ़कर कोई परम तत्त्वविशेष हैं, इसका विचार विज्ञ और रसिक पाठक ही करें । उ० अं० १९–२०—
जैन उपनिषदोंका सार ( रचयिता—श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी' ) आनन्द शान्तिमय हम, मंगल-स्वरूप पायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ध्रु०॥ कल्याणमय शरण है परमात्म-भाव अपना। जगका ममत्व सारा, समझा अनित्य सपना ॥ हम हैं सदा अकेले, क्यों मुग्ध मन बनायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ १ ॥ अपवित्र देहमें अब आसक्ति छोड़ देंगे। मिथ्यात्व अव्रतोंसे निज वृत्ति मोड़ देंगे ॥ सम्यक्त्व धर्म संयम तपमें हृदय रमायें। अविचल विमल सुपदमै अविलम्ब जा समायैं ॥ २ ॥ परदेश लोक सारा, निज देश सिद्धि-थल है। लोकाग्र स्थित हमारा प्यारा अनन्त थल है ॥ निर्ग्रन्थ गुरु मिले जब सत्पन्थ क्यों भुलायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ३ ॥ अर्हन्त देवका जब रूपस्थ ध्यान ध्याया। पद और पिंडको भी उस रूपमें मिलाया ॥ सब नाम रूप तज कर फिर लोकमें न आये। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ४ ॥ निश्चय अवाच्य ही है, व्यवहार सब कथन है। पर्याय दृष्टिसे ही, यह आगमन गमन है ॥ द्रव्यार्थ नय अपेक्षा हम मुक्त ही कहायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ५ ॥ जब तक स्वदेहमें हम, तब तक न ध्येय पूरा। आलस्य भावसे क्यों, कर्तव्य हो अधूरा ॥ पर तुच्छ वासनाका बन्धन नहीं लगायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ६ ॥ क्या सूर्य-चन्द्रने भी कुछ अंधकार जाना। अज्ञान तम हटाया, यह लोक शब्द माना ॥ निजमें अकर्म बनकर, भव कर्म भय मिटाये। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ७ ॥ आनन्द शान्तिमय हम, मंगल-स्वरूप पायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समाये ॥
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म पद्मयोनि, प्रपञ्चनिर्माता पितामहके नेत्रोंसे अश्रुके निर्झर झर रहे थे। व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके नवजलधर श्याम अङ्ग, अङ्गोंमें विद्युत्प्रभ पीताम्बर, कर्णयुगलमे गुञ्जानिर्मित अवतंस, चूडापर राजित मयूरपिच्छ, वक्षःस्थलपर वनमाला, हस्तपुटमें दधिमिश्रित ग्रास, काँखमे दबे हुए वेत्र एव शृङ्ग, कटिफेंटमें खोंसी हुई मुरली, सुकोमल चरण-सरोज—इनकी शोभा, इनके आलोकमें वेद-उपनिषद् ज्ञानके प्रथम अनुभवी उन आदि ऋषि ब्रह्माका समस्त सञ्चित ज्ञान हतप्रभ हो चुका था। जिनके स्वरूपका साक्षात् वर्णन करनेमें श्रुतियाँ सर्वथा असमर्थ हैं, केवलमात्र स्वरूपसे अतिरिक्त वस्तुओका निषेध- मात्र करती हैं— अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमो- ऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरासमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनो- ऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यम् । (बृहदारण्यक० ३ । ८ । ८) 'वह न स्थूल है, न अणु है, न क्षुद्र है, न विशाल है, न अरुण है, न द्रव है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कर्ण है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है।' —इस प्रकार निरसन करते-करते जहाँ जाकर वे परिसमाप्त हो जाती हैं, जिनमे अपने आपको खो बैठती हैं, जिनमें अपना अस्तित्व विलीन कर सफल हो जाती हैं— यच्छ्रुतयस्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधना । (श्रीमद्भागवत वेदस्तुति १०। ८७ । ४१) —वे आज स्वयं ब्रह्माके सामने दृष्टिके विषय होकर खड़े थे। इतना ही नहीं, क्षणभर-पूर्व उनके अपने निर्निमेष नयनोंने देखा था—व्रजेन्द्रतनयके पार्श्ववर्ती वे समस्त गोवत्स, गोपशिशु, नव-नील-नीरद-वर्ण, पीतपट्टाम्बर- परिशोभित शङ्ख-चक्र गदा पद्म करधारी, मणिमुकुटधारी, मणिकुण्डल मुक्ताहारशोभित, वनमाली चतुर्भुजके रूपमें परिणत हो गये थे। उनमेसे प्रत्येक मूर्तिके वक्षःस्थलमे श्रीवत्स, भुआओंमें अङ्गद, हाथोंमे रत्नमय वलय एव कङ्कण, चरणोंमे नूपुर एव कड़े, कटिदेशमें करधनी, अङ्गुलियोंमे अङ्गुरीयक (अँगूठी) विराजित थी। अतिशय भाग्यशाली भक्तोंके द्वारा समर्पित नव-तुलसीकी मालाएँ नख से सिखपर्यन्त समस्त अङ्गोंमें आभरण बनी थीं, चन्द्रज्योत्स्ना सी मन्द मुसकान अधरोंपर नृत्य कर रही थी। अरुणिम नेत्रोंकी चितवनसे मधु झर रहा था। अरुण नेत्र मानो रजके प्रतीक थे, भक्तोंके अन्तस्तलमें, क्षण क्षणमें नव-नव मनोरथ (सेवा-वासना) का सृजन कर रहे थे और वह उज्ज्वल हास मानो सत्त्वका प्रतीक था, जो अधरोंपर नाच-नाचकर भक्तोंके मनोरथका पालन कर रहा था। फिर अगणित असख्य ब्रह्मा वहाँ उपस्थित थे, ब्रह्मा ही नहीं, उनसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जीव मूर्तिमान् होकर उपस्थित थे और नृत्य-गीत- सहित यथायोग्य विविध उपहार समर्पित करते हुए उन अनन्त चतुर्भुज मूर्तियोंकी उपासना कर रहे थे। अणिमादि सिद्धियाँ, माया विद्या आदि विविध शक्तियाँ, महत्तत्त्व आदि चौबीस तत्त्वोंके अधिष्ठातृदेवता—सभी सेवाकी प्रतीक्षा में उन्हें घेरे खड़े थे। प्रकृति क्षोभमें हेतु काल, प्रकृति-परिणाममें हेतु स्वभाव, वासनाका उद्बोधक सस्कार, काम, कर्म, गुण आदि—इन सबके अधिष्ठातृदेवता उन प्रत्येक भगवद्रूपकी अर्चना कर रहे थे। भगवत्-प्रभावके समक्ष उन देवोंकी सत्ता- महत्ता नगण्य बन चुकी थी। ब्रह्माने देखा—वे अगणित भगवद्रूप—ओह ! सब के सब त्रिकालाबाधित सत्य हैं। ज्ञान- स्वरूप—स्वप्रकाश है। अनन्त हैं। आनन्दस्वरूप हैं। एक- रस हैं। इनके अचिन्त्य, अनन्त, माहात्म्यकी उपलब्धि तो उपनिषद्—आत्मज्ञानकी दृष्टि रखनेवाले पुरुषोंके लिये भी सम्भव नही— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ५४) आज ब्रह्मा 'सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' * परब्रह्म सत्य है, ज्ञानस्वरूप है, अनन्तस्वरूप है, 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म'+ परब्रह्म विज्ञानस्वरूप है, आनन्दस्वरूप है, इन श्रुतियोंसे प्रतिपाद्य तत्त्वको प्रत्यक्ष देख चुके थे। जिन परब्रह्मात्मक गोपेन्द्रतनय श्रीकृष्णचन्द्रकी स्वप्रकाश-शक्तिसे यह परिदृश्यमान सचराचर विश्व प्रकाशित होता है, उनके नित्य पार्षद—गोपशिशुओं- को, गोवत्सोंको ब्रह्माने आज उपर्युक्त रूपमे एक साथ एक समय देखा था—
* तैत्तिरीय० २ । १ । १ + बृहदारण्यक० ३ । ९ । २८
१४८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एवं सकृद्ददृशांज परब्रह्मात्मनोऽखिलान् । यस्य भासा सर्वमिद विभाति सचराचरम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ५५) यह देखकर उनकी क्या दशा हुई थी, यह वे ही जानते थे। फिर तो उनकी दशासे करुणार्द्र हुए श्रीकृष्णचन्द्रने अपनी योग- मायाकी यवनिका हटा दी थी और तब उन्होंने देखा था— वही वृन्दावन है, वही ठीक पहलेकी भाँति अद्वय, अनन्त, ज्ञानस्वरूप परब्रह्म अपने प्रिय गोप शिशुओंको, गोवत्सोंको ढूँढता फिर रहा है, लीलारस पानमे प्रमत्त है, दधिमिश्रित ग्रास भी कर-कमलोंमें ठीक वैसे ही सुशोभित है— तत्रोद्वहत्पशुपवंशशिशुत्वनाट्य ब्रह्माद्वय परमनन्तमगाधबोधम्। वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व- देक सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट ॥ (श्रीमद्भा० १० । १३ । ६१) पितामह देखकर विह्वल हो गये । श्रीकृष्णचन्द्रको असंख्य प्रणाम कर चुकनेपर उन्हें कहीं धैर्य आया था। फिर भी आँखोंसे अनर्गल अश्रु प्रवाह बह रहा था तथा अश्रुपूरित कण्ठसे वे व्रजेन्द्रनन्दन—नरकृति परब्रह्मका स्तवन कर रहे थे। अन्तस्तलमें पश्चात्तापकी ज्वाला जल रही थी—'आह ! कहाँ इतना क्षुद्र मैं, और कहाँ इतने महान् नन्दनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ! मैं अपनी क्षुद्र मायासे इतने महान्को मोहित करने चला था। इस गुरु अपराधके लिये क्षमा कैसे मिलेगी ?' पर नहीं !—आशाकी एक किरण परमेष्ठीके अन्तस्तलमें सञ्चित एक श्रुतिने जगा दी । 'यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितम् ।'* इस परब्रह्मका जो कुछ भी यहाँ है और जो कुछ भी नहीं है, वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमे स्थित है । वेदगर्भ आनन्दप्लुत होकर स्तुतिमें पुकार उठे—"अधोक्षज ! शिशु अपनी जननीके गर्भमें रहता है, अज्ञानवश न जाने कितनी बार चरणोंसे प्रहार करता है, किंतु माता क्या इससे रुष्ट होती है ? फिर तुम्हीं बताओ श्रीकृष्णचन्द्र ! 'है' और 'नहीं है' इन शब्दोंसे लक्षित कोई भी वस्तु तुम्हारी कुक्षि—उदरसे बाहर है क्या ? अनन्त ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्डगत समस्त जीव- समुदाय, समस्त वस्तुएँ—सब कुछ तो तुम्हारे भीतर अवस्थित है। तुम्हारे किसी एक क्षुद्रतम देशमें अवस्थित प्राणीको तुम्हारी
- छान्दोग्योपनिषद् ८ । १ । ३ अनन्त महिमा, अनन्त स्वरूपका ज्ञान हो, यह भी कभी सम्भव है ? तुम्हें न जानकर तुम्हारे प्रति जो कोई भी कुछ सोच लेगा, कर लेगा—वह अनुचित, अयथार्थ होनेपर तुम क्या रुष्ट हो जाओगे ? नहीं, कदापि नहीं । अबोध शिशुकी भाँति ही, तुम्हारी महिमासे अनभिज्ञ रहकर मैने यह अपराध किया है, तुम मुझे निश्चय क्षमा करोगे"— उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयो किं कल्पते मातुरधोक्षजागमे। किमस्तिनास्तीत्यपदेशभूषित तवास्ति कुक्षे कियदप्यनन्त ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । १०) विधाताने सारा वेदज्ञान लगा दिया था इस प्रयासमे कि कदाचित् किसी अशमे व्रजेन्द्रनन्दनकी महिमाके क्षुद्रतम अशको भी वे स्पर्श कर सकें । कहते कहते वे श्रान्त नहीं होते थें, किंतु सहसा अब उनके चित्तमे ब्रजवासियोंका स्फुरण हो आया । वे ब्रजवासियोकी महिमाका कीर्तन करने लगे— अहो भाग्यमहो भाग्य नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । ३२ ) 'अहो ! ब्रजराज, व्रजवासी गोपोंका ही भाग्य धन्य है । वस्तुतः उनका ही अहोभाग्य है । परमानन्दस्वरूप सनातन परिपूर्ण ब्रह्म जिनका सुहृद्, मित्र, पुत्र, कलत्र प्रियजन होकर रहे, उनके अनन्त असीम सौभाग्यका क्या कहना ?' फिर तो पितामहमे एक ही चाह बची थी और उसे पूर्ण करनेके लिये वे प्रार्थना कर रहे थे— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्या यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् । यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥ (श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४) 'गोपेन्द्रतनय ! अनादिकालसे अबतक श्रुतियाँ तुम्हारी चरणधूलिकी खोज कर रही हैं, किंतु पा नहीं रही हैं । फिर साक्षात् तुम्हें कैसे पा सकेंगी ? पर इन व्रजवासियोने तुम्हें पा लिया । पाकर एकमात्र तुम्हे ही अपना जीवनसर्वस्व बनाया । अतः प्रभो ! मेरे लिये परम सौभाग्यकी बात एक ही है । वह यह कि मनुष्यलोकमें और फिर वृन्दावनमें, और वहाँ भी नन्दगोकुलमें कीट, पतङ्ग, तृण, गुल्म आदिमें-
[Page Header] ⁕ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र और औपनिषद् ब्रह्म ⁕ १४९
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से कुछ भी होकर—किसी योनिका कुछ भी बनकर मेरा जन्म हो जाय तथा इन ब्रजवासियोंमेंसे किसी एककी भी चरणधूलि-कणका स्पर्श पाकर मैं कृतार्थ हो जाऊँ, ब्रह्मपद मुझे नहीं चाहिये नाथ।'— कहू मोहि ब्रज-रेनु देहु बृंदावन बासा। माँगौं यहै प्रमाद और मेरै नहिं आसा॥ जोँ भावै सोइ करहु तुम, लता सिखा द्रुम, गेहू। ग्वाल गाय को भूत करौँ मानि सत्य व्रत एहु॥ जौ दरसन नर नाग अमर सुरपतिहूँ न पायौँ। भोजन जुग गए बीति अब मोहूँ न लखायौँ॥ दहि ब्रज यह रस नित्य हेँ, में अब समुझ्यौँ आह। बृंदावन-रज हूँ रहौँ ब्रह्म लोक न सुहाइ॥ जगद्विधाताने उन परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रकी तीन परिक्रमा की और वे अपने घामकी ओर चल पड़े। यह है उपनिषत्- प्रतिपादित परब्रह्मकी एक झाँकी, जो एक बार वेदज्ञानके आदि-आचार्य, आदि-ऋषि ब्रह्माको हुई थी। एक बार देवर्षि नारदको भी परब्रह्मकी विचित्र ही झाँकी हुई थी। नन्दप्राङ्गणकी धूलिमें परब्रह्म लोट रहा था, एव समीपे खड़ी यशोदारानी हँस रहीं थीं। वीणाकी झंकार करते, हरिगुण गाते देवर्षि सौभाग्यसे वहीं जा पहुँचे। वहाँ जो कुछ देखा, उमपर न्यौछावर हो गये। वोल उठे— किं ब्रूमस्त्व्वा यशोदे कति कति सुकृतक्षेत्रवृन्द्वानि पूर्वं गत्वा कीदृग्विधानै कति कति सुकृतान्यर्जितानि त्वयैव। नो शक्रो न स्वयम्भूर्न च मदनरिपुर्यस्य लेभे प्रसादं तत पूर्ण ब्रह्म भूमौ विलुठति चिलपत् क्रोडमारोढुकामम्॥ 'यशोदे! ब्रजेश्वरि! तुम्हें क्या कहूँ, न जाने तुमने किन- किन पुण्यक्षेत्रोंमे जाकर किन-किन विधि-विधानोंसे कितने- कितने पुण्य सञ्चय किये हैं, जिसके फलस्वरूप तुम्हे यह अनुपम सौभाग्य प्राप्त हुआ। सुरेन्द्रने जिसके कृपाकटाक्षके दर्शन नहीं पाये, कमलयोनिन जिसक कृपा नहीं पायी, मदनारि महादेवने जिसकी अनुभूति नहीं की, वह कृपा, वह प्रसाद तुम्हें मिला। ओह! वह पूर्णब्रह्म तुम्हारी गोदमे चढ़नेके लिये रो-रोकर पृथिवीपर लोट रहा है और तुम उसे उठा नहीं रही हो। तुम्हारे सौभाग्यकी यही तो चरम सीमा है व्रजरानी।' अस्तु, ब्रह्मको क्रन्दन करते देखकर देवर्षिका रोम- रोम खिल उठा, हरिगुणके स्थानपर वे यशोदारानीका सुयश गाते चल पड़े।
[Right Column]
लीलाशुक्रको भी एक झाँकी मिली। उन्होंने देखा— आगे-आगे परब्रह्म भागा जा रहा है, पीछे पीछे गोपमहिषी श्रीयशोदा उसे पकड़नेके लिये, हाथमे छड़ी लेकर दौड़ी जा रही है। शुकने एक दृष्टि परब्रह्मकी ओर डाली और फिर परब्रह्मकी जननीकी ओर। परब्रह्म एव जननीकी चालमें अन्तर अवश्य था, वह उस दौड़मे आगे बढ रहा था, जननी श्रीअङ्गोंकी स्थूलताके कारण अस्त व्यस्त होकर पीछे होती जा रही थी- जसु पै तैसैं जाइ न जाइ, श्रोनी-भर अरु कोमरु पाइ। खसत जु सिर तैं सुमन सुदेस, जनु चरनन पर रीझे केस। आगे फूल की वरषा करें, निन पर ब्रजरानी पग धरें। पर इससे क्या हुआ। जननीने परब्रह्मके हाथ पकड़ ही लिये— जोगीजन-मन जहाँ न जाहीं, इत सब वेद पर चिल्लाहीं॥ ताहि जसोमति पकरति भई, रहपट एक बदन पर दई॥ तथा फिर? उसे पकड़कर ऊखलसे बाँध दिया— जद्यपि अस ईश्वर जगदीस, जाके वस विधि, विप्नु, गिरीस। ताहि जसोमति बाँधति मई, रसना प्रेममई दृढ नई॥ × × × × जिन बाँध्यो सुर असुर नाग मुनि प्रनऊ कर्मकी डोरी। सोइ अविच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सरुन न छोरी॥ × × × × निगम सार देखौ गोकुल हरि। जाकौ दूरि ठरस देवनिर्सों, सो बाँध्यौ जसुमति ऊखल धरि॥ लीलांशुक इस झाँकीपर न्यौछावर हो गये। पुकार उठे- परमिसमुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखित्ना। विचिन्ुत भवनेषु वल्लवीना- मुपनिषदर्थमुलूखले निवद्धम्॥ 'अरे, ओ ब्रह्मको ढूँढनेवालो ! इधर सुनो, वेदान्त-वन- में परब्रह्मको ढूँढते-ढूँढते तुम उसे न पाकर दुःखसे अतिशय खिन्न हो रहे हो। इधर आ जाओ, मे तुम्हें परम उपदेश दे रहा हूँ, उसका आदर करो। सुनो। गोपसुन्दरियोंके भवनोंमें उसे ढूँढो। यह देखो—यहाँ उपनिषद्का अर्थ उलूखलमें बँधा पड़ा है। इसे ढूँढ लो, पा लो।' शुकका यह उपदेश अनन्त आकाशमें विलीन हो गया। पर नष्ट नहीं हो गया। उसके अक्षर-अक्षर वर्तमान हैं। इसलिये