कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 145, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 145
- जाऊँ कैसे ? * १३१ उपासना करनी पडती है, तब प्राकृत उपमा और प्राकृत संज्ञा देनी ही पडती है। प्राकृत पुरुष और प्राकृत नारी एव उनके प्रगाढ सम्बन्धका सहारा लेकर ही परम चित्तत्त्वके स्वरूपगत युगल-भावको समझनेका प्रयत्न करना पड़ता है। वस्तुतः पुरुषरूपमें ब्रह्मका सर्वातीत निर्विकार निष्क्रिय भाव है, और नारीरूपमें उन्हींकी सर्वकारणात्मिका अनन्त लीला वैचित्र्यमयी स्वरूपा शक्तिका सक्रिय भाव है। पुरुषमूर्तिमें भगवान् विश्वातीत'हैं, एक हैं और सर्वथा निष्क्रिय हैं, एव नारीमूर्तिमें वे ही विश्वजननी, बहुप्रसविनी, लीलाविलासिनी रूपमे प्रकाशित हैं। पुरुष विग्रहमें वे सच्चिदानन्दस्वरूप हैं और नारी-विग्रहमें उन्हींकी सत्ताका विचित्र प्रकाश, उन्हींकि चैतन्यकी विचित्र उपलब्धि तथा उन्हींकि आनन्दका विचित्र आस्वादन है। अपने इस नारी-भावके संयोगसे ही वे परम पुरुष ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता हैं, - सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्त्ता हैं। नारीभावके सहयोगसे ही उनके स्वरूपगत, स्वभावगत अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त वीर्य, अनन्त सौन्दर्य और अनन्त माधुर्यका प्रकाश है, इसीमे उनकी भगवत्ताका परिचय है। पुरुषरूपसे वे नित्य-निरन्तर अपने अभिन्न नारीरूपका आस्वादन करते हैं और नारी (शक्ति) रूपसे अपनेको ही आप अनन्त आकार-प्रकारोंमे लीलारूपमे प्रकट करके नित्य चिद्रूपमें उसकी उपलब्धि और सम्भोग करते हैं - इसीलिये ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वलोकमहेश्वर, षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। सच्चिदानन्दमयी अनन्त-वैचित्र्यप्रसविनी लीला- विलासिनी महाशक्ति ब्रह्मकी स्वरूपभूता है, ब्रह्मके विश्वातीतः, देशकालातीत अपरिणामी सच्चिदानन्दस्वरूपके साथ नित्य मिथुनीभूता है। ब्रह्मकी सर्वपरिच्छेदरहित सत्ता, चेतनता और आनन्दको अगणित स्तरोके सत्-पदार्थरूपमे, असख्य प्रकारकी चेतना तथा ज्ञानके रूपमे एव असख्य प्रकारके रस- आनन्दके रूपमे विकसित करके उनको आस्वादनके योग्य बना देना इस महाशक्तिका कार्य है। स्वरूपगत महाशक्ति इस प्रकार अनादि-अनन्तकाल ब्रह्मके स्वरूपगत चित्की सेवा करती रहती हैं। उनका यह शक्तिरूप तथा शक्तिके समस्त परिणाम (लीला) और कार्य स्वरूपतः उस चित्तत्त्वसे अभिन्न हे। यह नारीभाव उस पुरुषभावसे अभिन्न है, यह परिणामशील दिखायी देनेवाला अनन्त विचित्र लीलाविलास उनके कूटस्थ नित्यभावसे अभिन्न है। इस प्रकार उभयभाव अभिन्न होकर ही भिन्नरूपमें परस्पर आलिङ्गन किये हुए एक दूसरेका प्रकाश, सेवा और आस्वादन करते हुए एक दूसरेको आनन्द-रसमे आप्लावित करते हुए नित्य-निरन्तर ब्रह्मके पूर्ण स्वरूपका परिचय दे रहे है। परम पुरुष और उनकी महाशक्ति-भगवान् और उनकी प्रियतमा भगवती भिन्नाभिन्नरूपसे एक ही ब्रह्मस्वरूपमे स्वरूपतः प्रतिष्ठित हैं। इसीलिये ब्रह्म पूर्ण सच्चिदानन्द हैं और साथ ही नित्य आस्वादनमय हैं। यही विचित्र महारास है जो अनादि, अनन्तकाल बिना विराम चल रहा है। उपनिषदोने ब्रह्मके इसी स्वरूपका और उनकी इसी नित्य लीलाका विविध दार्शनिक शब्दोंमे परिचय दिया है और इसी स्वरूपको जानने, समझने, उपलब्ध करने और सम्भोग करनेकी विविध प्रक्रियाएँ, विद्याएँ और साधनाएँ अनुभवी ऋषियोकी दिव्य वाणीके द्वारा उनमें प्रकट हुई हैं ।* जाऊँ कैसे ? (रचयिता-श्रीप्रबोध, बी० ए० (आनर्स), साहित्यरत्न, साहित्यालङ्कार) इंगित पानी दूर क्षितिज से, जाऊँ कैसे ?-हूँ निःसम्बल ! पथ में झंझावात, शत-शत विद्युत् के कटु घात क्षुद्र क्रोड़ में जिनके खिलते उल्का के उत्पात और अति भीषण कोलाहल ! अगणित हैं इस कठिन मार्गमें विघ्न-सरित, गिरि, वन, दल-दल, इन सरिताओं में कूल कहाँ ?-केवल हैं आवर्त्त और ये निष्ठुर प्रखरतर धार, जो बहती हैं खल-खल ॥ किसी भाँति चल गिरूँ उपल-सी छू लूँ प्रिय पद पिघल-पिघल ! और छू, जन्म-मरण से परे उसी क्षण हो जाऊँ निश्चल ॥
- आचार्य श्रीमक्षयकुमार वन्द्योपाध्यायके एक निबन्धके आधारपर ।