भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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उपनिषदोंसे मैंने क्या सीखा ? (लेखक---प० श्रीहरिभाऊजी उपाध्याय) उपनिषदोंसे मैंने यह सीखा कि सबमे एक ही आत्मा समाया हुआ है। अतः मुझे सबके साथ समान भावसे बर्तना चाहिये, परतु यह भूमिका सहजसाध्य नहीं। यह आत्म-विकासकी अपेक्षा रखती है और सतत साधनासे ही प्राप्त हो सकती है। इसकी पहली सीडीके रूपमें मुझे अपने प्रति कठोर और दूसरोंके प्रति उदार और सहनशील रहना आवश्यक मालूम होता है। अपने प्रति कठोर रहना तप है और दूसरेके प्रति उदार रहना अहिंसा है। इस तरह आत्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये तप और अहिंसा अनिवार्य हो जाते हैं। आत्मसिद्धि या आत्मस्थितिके बाद क्या हो ? आत्मस्थ कैसा व्यवहार करे ? इसका सही उत्तर आत्मस्थ ही दे सकता है। साधक इस चर्चासे उदासीन रहे तो अच्छा ही है। उस स्थितिमे पहुँचनेपर उसे अपने-आप सूझता जायगा कि उसे क्या करना चाहिये और कैसे रहना चाहिये। इतना अवश्य है कि वह मनुष्य-समाजके बनाये नियमोंसे परे हो जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह उन नियमोंका पालन नहीं करेगा। बल्कि यह कि वह उन्हे अपने लिये बन्धनकारक नहीं समझेगा। वह उसके लिये नियम नहीं रहेगा, स्वभाव हो जायगा। वह शासन और नियमसे ऊपर उठकर सहज जीवनमें ओतप्रोत रहेगा। उपनिषदोने जो हमें दिया है वह संसारके किसी ग्रन्थने शायद उससे पहले नहीं दिया था। उसी आत्मतत्त्वका हम सदैव स्मरण करें, मनन करें, ध्यान करें और उसीकी साधनामें जीवनके प्रत्येक कर्मकी आहुति दें। उपनिषद्‌की व्युत्पत्ति और अर्थ (लेखक-प० श्रीगोविन्दनारायणजी आसोपा, बी० ए०) 'षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु' धातुके पहले 'उप' और 'नि' ये दो उपसर्ग और अन्तमें 'क्विप्' प्रत्यय लगानेसे उपनिषद् शब्द बनता है। 'उपनिषद्यते---प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्।' इसका अर्थ है--जिससे ब्रह्मका साक्षात्कार किया जा सके, वह उपनिषद् कहाती है। उपनिषदोंमें ब्रह्मज्ञान अथवा ब्रह्मविद्याका ही प्रधानतासे विवेचन तथा वर्णन किया हुआ है जिससे उपनिषद्‌को अध्यात्मविद्या भी कहते हैं। ब्रह्मके प्रतिपादक वेदके शिरोभाग अथवा अन्तमें होनेसे ये वेदान्त या उत्तरमीमांसा भी कही जाती है। ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्त्वज्ञान और ब्रह्मविद्या--ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। वेदके अङ्गभूत सहिता, ब्राह्मण, आरण्यकमेसे ही ब्रह्मज्ञानप्रति- पादक भागोंको पृथक् कर उनको 'उपनिषद्' नाम दिया गया है। अकेले अथर्ववेदमें ५२ उपनिषद् हैं। मुक्तिकोपनिषद्में १०८ उपनिषदोंकी गणना हुई है। अमरकोशकार उपनिषद् शब्दका अर्थ-'धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात्' लिखते हैं, इसके अनुसार 'उपनिषत्' शब्द गूढ धर्म एव रहस्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है।