कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंकल्याण-मार्ग (लेखक—श्रीयोगेन्द्रनाथजी बी० एस्-सी०) [बायाँ स्तम्भ] कठोपनिषद्में कहा है— अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय- स्ते उभे नानार्थे पुरुषँसिनीतः। तयो श्रेय आददानस्य साधु- र्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥ ( १।२।१) 'प्रेय और श्रेय दो पृथक्-पृथक् मार्ग हैं, ये दोनों विभिन्न फल देनेवाले साधन मनुष्यको बन्धनमें डालते हैं। प्रेय लोकोन्नतिका मार्ग है और श्रेय परलोकोन्नतिका मार्ग है। इनमेंसे श्रेयके ग्रहण करनेवालेका कल्याण होता है, प्रेयको ग्रहण करनेवाला पतित हो जाता है। दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बह्वोऽलोलुपन्त॥ अविद्यायामन्तरे वर्तमाना स्वयं धीरा पण्डितं मन्यमाना। दन्द्रम्यमाणा परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥ न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥ (कठ० १।२।४-६) 'ये दोनों मार्ग एक-दूसरेसे विपरीत, विरुद्धार्थसूचक और दूर हैं। ये अविद्या और विद्या इस नामसे जाने गये हैं। तुम नचिकेताको मैं विद्याका चाहनेवाला मानता हूँ। तुमको बहुत-सी कामनाएँ प्रलोभित नहीं करती हैं। अविद्यामे पड़े हुए अपनेको धीर और विद्वान् माननेवाले लोग उल्टे रास्तों- पर चलते हैं और वे मूढ अन्धेके द्वारा ले जाये जानेवाले अन्धेकी भाँति भटकते रहते हैं। धनके मोहसे मूढ, प्रमादपूर्ण, विवेकरहित पुरुषको परलोककी बात पसन्द नहीं आती। यही लोक है, परलोक कुछ नहीं। ऐसा माननेवाला बार-बार मृत्युके वशमें आता है।' ईशोपनिषद्के ११ वें मन्त्रमें कहा है— [दायाँ स्तम्भ] विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ 'जो विद्या और अविद्या इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह अविद्यासे मृत्युको तरकर ज्ञानसे अमरताको प्राप्त कर लेता है।' प्रत्येक कल्याणपथके पथिकका उद्देश्य श्रेय होना चाहिये, और प्रेयका इस प्रकार उपयोग करना चाहिये कि वह श्रेय- का साधन बन जाय। जिस मनुष्यको हरिद्वार जाना है, उसे अपने उद्देश्यकी पूर्तिके लिये इतना-सा धन चाहिये, जिससे उसका मार्ग-व्यय आदि सध जाय और यदि वह अपने समस्त धनको साथ लेकर हरद्वार जाना चाहेगा, तो वह उसके उद्देश्यकी पूर्तिको बाधक ही होगा। उसे अपने सारे आराम- के प्रलोभनोंको त्यागकर उद्देश्यकी ओर अग्रसर होना पड़ेगा। इसी प्रकार जीवको श्रेयमार्गके अनुसरणमें धन-संग्रह इत्यादि लोकोन्नतिके मार्गको केवल साधन समझना चाहिये। ये प्रेय वस्तुएँ जहाँ साध्य हुईं कि मनुष्य अपने मार्गसे च्युत हुआ। अतः धन आदिको केवल अपने आत्म-कल्याणका ही साधन बनाना चाहिये। जो लोग विषयभोगकी दृष्टिसे केवल लोकोन्नतिको अपना लक्ष्य बना लेते हैं और श्रेयकी कुछ भी चिन्ता नहीं करते, वे दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्तिरूप मानव-जीवनके यथार्थ ध्येयसे च्युत हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें एक बड़ी शिक्षाप्रद आख्यायिका प्रसिद्ध है। एक युवक भावावेशमें आत्मज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे गुरुके पास आया। गुरुने उसको अनधिकारी समझकर उपदेश नहीं दिया, परन्तु वह आग्रह करता ही रहा। एक दिन उसे साथ लेकर गुरु घूमने गये। रास्तेसे कुछ ही दूरीपर एक गाँव दिखायी दिया। गुरुजीको प्यास लगी। युवक गाँवमे पानी लाने गया। कुएँपर एक सुन्दरी युवती पानी भर रही थी। युवकको उसने पानी दे दिया, परन्तु युवक उसके रूपपर मोहित होकर गुरुके प्यासकी बात भूल गया और उस युवती- के पीछे-पीछे उसके घर पहुँचा। वह अविवाहिता थी, अतः उसके पिताने युवकको योग्य समझकर उसका विवाह युवकके साथ कर दिया। विवाहके वाद वह गृहस्थ बनकर वहीं रहने लगा। क्रमशः उसके तीन पुत्र हुए। युवतीका पिता मर चुका था। कुछ समय बाद नदीमें बाढ आनेसे ग्राममें