भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 832 में से

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पृष्ठ 148

१३४             * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरा न शोचति *


[बायाँ स्तम्भ]

पानी आ गया। चारों ओर तो जल ही जल था। उसने अपनी स्त्री और तीनों बच्चोको लेकर प्राण बचानेके लिये गाँव-से बाहर निकलनेका प्रयत्न किया। पानीका वेग बढ़ता ही जाता था। बड़ी भारी सावधानी करनेपर भी एक एक करके उसके तीनों पुत्र और स्त्री पानीमें बह गये। वह बड़ा दुखी हुआ और कठिनतासे प्राण बचाकर उस स्थानपर पहुँचा, जहाँसे गुरुजीके लिये जल लेने चला था। वहाँ पहुँचनेपर उसको यह स्मरण आया 'मै अपने उद्देश्यसे पतित होकर किस प्रकार 'प्रेयके मार्गपर' चल दिया था।'

प्रेयको साध्य समझकर महमूद गजनवी रोता हुआ ससार-से गया। जीवनभर लूट-खसोटसे एकत्रित धनके कोषको मृत्युके समय अपने सामने जमा कराकर लालसापूर्ण दृष्टि डालता हुआ वह निराश होकर ससारसे चला गया। मृत्युने बलपूर्वक प्रिय वस्तुओसे उसको अलग कर दिया। इधर कणाद ऋषि कटे हुए खेतसे कण कण अन्न बीनकर जीवन निर्वाह करते थे। जब राजा धनकी भेंट लेकर जाते तो कहते थे कि इसे दरिद्रोंको बाँट दो। प्रेयको त्यागकर श्रेयका इससे अनुपम उदाहरण क्या होगा। यही कणाद ऋषि वैशेषिक-दर्शनके रचयिता थे।

यमाचार्यने उपर्युक्त मन्त्रोंमें नचिकेताको तपका स्वरूप बतलाया। तपका जीवन प्रलोभनोंसे बचकर चलनेका है, प्रेय-से लगातार युद्ध करनेका है। प्रेयसे युद्ध करके ही मनुष्यकी गति ऊपरको हो सकती है। नचिकेताके तीसरे वरके उत्तर-में यमराजने प्रलोभन देते हुए उसे पुत्र, पौत्र, घोड़े, हाथी, सुवर्ण, चक्रवर्ती राज्य माँगनेको कहा, ससारमें दुर्लभ-से दुर्लभ कामनाओंकी पूर्ति करनेका वचन दिया, परंतु नचिकेताने 'भोगोसे मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता और भोग विनाशी है'—यह समझकर तुरत सबको ठुकरा दिया। उस समय यमने मरनेके पश्चात् जीवकी क्या गति होती है, इसका उपदेश दिया। परंतु इस उपदेशसे पूर्व यमने नचिकेताके तपस्वी—अधिकारी होनेकी पूरी परीक्षा कर ली।

अनन्त नित्य और पूर्ण सुखकी प्राप्ति ही श्रेय है। प्रत्येक मनुष्यकी स्वाभाविक इच्छा सुखप्राप्तिकी होती है, परतु सुख क्या है? नारदजीने सनत्कुमारसे यही प्रश्न (छान्दोग्य उपनिषद्‌में) किया—

'सुखं भगवो विजिज्ञासे' इति । (७।२२।१)

'भगवन् ! मै सुखका स्वरूप जानना चाहता हूँ।' बहुत ही


[दायाँ स्तम्भ]

टेढ़ा प्रश्न है। बच्चा खिलौना देखकर रोता है। जब खिलौना मिल जाता है तो समझता है कि मै सुखी हो गया। परंतु कुछ देर खेलनेके पश्चात् उसका जी ऊब जाता है, और वह खिलौनेको फेंककर रोने लगता है। अब उसे उस खिलौनेमे सुख नहीं मिलता। वस्तुतः खिलौनेमें सुख समझना उसका बालपन ही था। खिलौनेमे असली सुख नहीं था। इसी प्रकार धन आदि ससारके पदार्थोंका हाल है। फिर प्रश्न होता है कि तो फिर 'सुख क्या है?' सनत्कुमारने उत्तर दिया—

'यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति । भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । (छान्दोग्य० ७।२३।१)

'भूमा ही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। भूमाको ही समझना चाहिये।' नारदने फिर पूछा, 'महाराज ! भूमा क्या है।' सनत्कुमारने उत्तर दिया—

यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पम्। यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् । (छान्दोग्य० ७।२४।१)

'भूमा वह है, जिसमे अन्यको नहीं देखता, अन्यको नहीं सुनता, अन्यको नहीं जानता। वह अल्प है जहाँ अन्यको देखता है, अन्यको सुनता है, अन्यको जानता है। भूमा ही अमृत है। अल्प ही दुःख है।' ससारमें दो प्रकारकी मनोवृत्तियोंके मनुष्य है—एक तो वे जो अस्थिर वस्तुओमे सुख देखते हैं। दूसरे वे जो विवेकके द्वारा अनित्य पदार्थोंकी निःसारता और दुःख परिणामताको देखकर नित्य अखण्ड सुखरूप भूमाको चाहते हैं। जो लोग अनित्य पदार्थोंमे सुख मानते हैं, उनको कभी स्थायी सुख नहीं मिलता। क्षणिक सुखके बाद दुःख आ जाता है। ससारमे प्राकृतिक पदार्थोंसे सुख-प्राप्तिकी आशा इसी प्रकार है। इसमे एकके बाद दूसरी, दूसरीके बाद तीसरी—इस तरह सुख प्राप्त करनेवाली वस्तुओंकी खोज होती रहती है। अभी एक पुरुष हजार रुपयोंकी प्राप्तिमे सुख समझता है। उसकी प्राप्तिपर दस हजारमें सुख समझता है। होते होते उसको लाखों करोड़ोंकी प्राप्तिके पश्चात् भी सुख नहीं होता। एक मनुष्य सुस्वादु भोजनका आनन्द ले रहा है इतनेमे ही उसे अपने युवक पुत्रकी मृत्युका समाचार मिलता है। अब उसे भोजनमे कोई आनन्द