भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

✻ कल्याण-मार्ग ✻ १३५ नहीं रहता। यही अल्प है। भूमामें पहुँचकर सुख क्षणिक नहीं होता। वहाँ किसी भी अन्य वस्तुकी प्राप्तिका मनोरथ सुखका हेतु नहीं रह जाता। वह सुख किसी अन्य वस्तुसे बाधित नहीं होता। भूमामें ही सतत शान्ति है। भूमा ही श्रेय है। अल्प ही प्रेय है। नारदजीने प्रश्न किया, 'भूमा किनके सहारे है ?' सनत्कुमारने उत्तर दिया, 'भूमा अपनी महिमामें ठहरा हुआ है।' यों भी कह सकते हैं, वह किसीके आश्रय नहीं है। संसारमे गौ, घोड़े, हाथी, सोना, नौकर आदिके अर्थहीमें महिमाको लेते हैं, परन्तु ये एक दूसरेके ऊपर प्रतिष्ठित हैं। यह महिमा कैसी ? भूमा अपनेमें ही प्रतिष्ठित है। भूमा ही अमृत है। सनत्कुमारजी कहते हैं—भूमा स्वय अपना आधार है। वही नीचे है, वही ऊपर है, वही पीछे है, वही आगे है। वही दायें-बायें है। वही सब कुछ है। अब यदि इस भूमाको 'मैं' कहकर पुकारो तो ऐसा कहेंगे कि 'मैं ही नीचे हूँ, मैं ही ऊपर हूँ, मैं ही पीछे, मैं ही आगे, मैं ही दायें, मे ही बायें हूँ। मैं ही सब कुछ हूँ।' (छान्दोग्य० ७। २५। १) अर्थात्— अथात आत्मादेश एवात्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं५ सर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एव विजानन्नात्म- रतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्द स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति। अथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषा५ सर्वेषु लोकेष्व- कामचारो भवति। (छान्दोग्य० ७।२५।२) "अब यदि उसको 'आत्मा' कहकर पुकारें तो कहेंगे कि आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर है, आत्मा ही पीछे है, आत्मा ही आगे है। आत्मा ही दायें है, आत्मा ही बायें है। आत्मा ही सब कुछ है। जो इस प्रकार जानता है, वह अपने- हीमें रमण करता है, अपनेहीमे खेलता है, अपने ही साथ आप रहता है। अपनेमें ही आनन्द लेता है। वही स्वराट् है। सब लोकोंमें उसकी कामना पूरी होती है, परंतु जो लोग उसके विपरीत भावना रखते हैं, उनका किया-कराया नाश को प्राप्त होता है। उनकी भावनाएँ कहीं पूरी नहीं होतीं। उनको कहीं सुख प्राप्त नहीं होता।" यहाँ भूमा, श्रेय, आत्मा शब्दोंसे एक ही तात्पर्य है। प्राकृतिक जगत्‌को अपने कार्यका ध्येय बनाना 'अल्पता' है, प्रेय है और आत्माको ध्येय बनाना भूमापन है। इन दोनोंका समन्वय करते हुए आत्मोन्नति करनेका उदाहरण विदेहराज महाराज जनकका जीवन है। वृहदारण्यक उपनिषद्‌मे याज्ञवल्क्य ऋषि मैत्रेयीको उपदेश देते हुए कहते हैं— न वा अरे पत्यु कामाय पति प्रियॊ भवति। आत्मनस्तु कामाय पति प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति। आत्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। × × × × × न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रिय भवति। आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रिय भवति। आत्मा वा अरे द्रष्टव्य, श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि आत्मनि खलु अरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं५ सर्वं विदितम्। 'अरी मैत्रेयी ! पतिके लिये पति प्यारा नहीं होता, आत्माके लिये पति प्यारा होता है। स्त्रीके लिये स्त्री प्यारी नहीं होती, आत्माके लिये स्त्री प्यारी होती है। × × × × × सबके लिये सब प्यारा नहीं होता, आत्माके लिये सब प्यारा होता है। इसलिये हे मैत्रेयी ! आत्माको ही देखने, सुनने, सोचने और जाननेसे सब कुछ समझमें आ जाता है।' मनुष्यको अपने जीवनके सब विभागोंमे कार्य करते हुए आत्माको ही ध्येय बनाये रखना चाहिये। परंतु यह ध्येय बने कैसे ? मनकी प्रवृत्ति श्रेय-मार्गकी ओर हो कैसे ? (२) प्रश्न यह होता है कि क्या कारण है कि इतने उपदेशोंके होते हुए भी मनुष्यकी आत्मोन्नतिकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती। जिनका इधर ध्यान जाता भी है, वे भी सफल नहीं होते हैं। साधकको परमपदकी प्राप्तिके लिये सबसे प्रथम आरम्भ कहाँसे करना चाहिये। सनत्कुमार बतलाते है— आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति स्मृति- लम्भे सर्वग्रन्थीना विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारस्त स्कन्द इत्याचक्षते त५स्कन्द इत्याचक्षते। (छान्दोग्य० ७। २६।२) 'आहारके शुद्ध होनेपर अन्तःकरणकी शुद्धि होती है। अन्त:करणके शुद्ध होनेपर स्मृति दृढ हो जाती है और स्मृति- प्राप्तिपर हृदयकी समस्त गाँठें खुल जाती हैं। भगवान् सनत्कुमार- ने (राग द्वेषरूप) दोष मल दिये (विनष्ट कर दिये)। नारद-