भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 832 में से

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१३६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * को अन्धकारका परला किनारा दिखा दिया। उस सनत्कुमार- को लोग स्कन्द कहते हैं।' सनत्कुमारने उपर्युक्त प्रश्नका मूल कारण आहार बताया है। शरीरकी सबसे पहली आवश्यकता 'आहार' अर्थात् भोजन है। जैसा भोजन मिलेगा, वैसा ही शरीर बनेगा, वैसा ही मन बनेगा, वैसी ही बुद्धि होगी। यदि भोजन शुद्ध होगा तो बुद्धि शुद्ध होगी। बुद्धिके शुद्ध होनेपर शङ्कारूपी गाँठें खुल जाती हैं। सत्यपर विश्वास और श्रद्धा दृढ होती है और मोक्ष- की प्राप्ति हो जाती है। भोजनसे ही मन बनता है। जैसा भोजन होगा वैसा ही मन होगा, वैसा ही स्वभाव होगा। डारविनका कथन है कि 'मुझे किसी भी प्राणीका भोजन बताओ, और में उसका स्वभाव बता दूंगा।' इसी सिद्धान्तको उन्होंने खद्योत (जुगनू) आदि कीड़ोंका उनके भोज्य पदार्थोंद्वारा स्वभाव बताकर पुष्ट किया है। यदि हमारा भोजन मनको चञ्चल करनेवाला होगा तो हमारी गति आत्मदर्शनकी ओर नहीं हो सकेगी। मास मद्य तथा अन्य मादक द्रव्योंके सेवनसे तमोगुण बढ़ता है, और विचार भी मलिन होते हैं। मन भी अशान्त रहता है। अनेक प्रकार- के शारीरिक और मानसिक रोग पीछे लग जाते हैं। अण्डे, प्याज इत्यादि सेवन करनेवाला मनुष्य ब्रह्मचर्यका साधन कभी नहीं कर सकता। मास इत्यादि हिंसासे प्राप्त पदार्थोंका सेवन करनेवाला घोर स्वार्थी कामी और क्रोधी (Passionate) हो जाता है। वास्तवमें जिस भोजनसे ब्रह्मचर्यकी सिद्धि हो, वही भोजन हितकर है। वेद कहते हैं— 'ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत।' 'ब्रह्मचर्यके तपसे देवता मृत्युको जीत लेते हैं।' ब्रह्मचारी- को मरनेके समय कष्ट नहीं होता। जिस प्रकार एक मनुष्य पुराने कपड़ेको छोड़ देता है, इसी प्रकार ब्रह्मचारी अपने शरीरको छोड़ देता है। परन्तु साधारण लोगोंकी अवस्था एक बोझसे लदी गाड़ीके समान है जो चूँ-चूँ करती हुई बड़े कष्टसे धीरे-धीरे बढ़ती है। उनका आत्मा बड़े कष्टसे शरीरसे निकलता है। भोजन शुद्धिमें ईमानदारीसे कमाये हुए अर्थसे प्राप्त भोजन भी सम्मिलित है। वह भोजन जिसमें एक मनुष्यने केवल अपना ही भाग ग्रहण किया है अर्थात् आजीविका भी शुद्ध हो और अपनी आजीविकामेंसे यथायोग्य भाग अपने परिवारके व्यक्तियों अथवा आश्रितोंको देकर तत्पश्चात् शेष भागको स्वयं ग्रहण करे। यही यज्ञशिष्ट अमृतभोजन है। गीता- मे कहा है कि 'जो केवल अपने लिये ही कमाते-खाते हैं, वे तो पाप खाते हैं।' ईशोपनिषद्मे कहा है— 'मा गृध कस्यस्विद्धनम् ।' 'किसीके धन और भोगको लोभवश मत लो।' किसीके भागको छलसे स्वयं ग्रहण कर लेना ही चोरी है। योगदर्शनमें बताया है कि चोरी न करनेवाली प्रवृत्ति—अस्तेय- की प्रवृत्तिको सिद्ध कर लेनेसे सब रत्नोंकी प्राप्ति होती है। अतः कहा है कि उत्तम वस्तु खाओ और धर्मपूर्वक उपार्जित की हुई वस्तु ही खाओ। शुद्ध आहारके सेवनसे अन्तःकरण शुद्ध होता है। जब अन्तःकरण शुद्ध होगा तो भगवत् कथा कहने-सुनने और उसके अनुकूल आचरण करनेमे भी मन लगेगा। चालाक मनुष्य, जो धर्मपर नहीं चलता है और जिसका मन विषयोंमें लगा रहता है, अपने अन्तःकरणको बिगाड़ लेता है। ऐसे मनुष्यको भगवत् चर्चांमे कोई आनन्द नहीं आता। परमपदकी प्राप्ति एक ऊँचे पर्वतके उच्च शिखरपर चढ़नेके समान है, जो शनैः शनैः सदाचरण करनेसे हो सकती है। ( ३ ) बृहदारण्यक उपनिषद्के पञ्चम अध्यायमे एक सुन्दर कथा आयी है। प्रजापतिकी तीन सन्तान 'देव', 'मनुष्य' और 'असुर' उनके पास उपदेश ग्रहण करने गये। प्रजापतिनेतीनो- को एक अक्षर 'द'का उपदेश दिया और उनसे पूछा कि 'इसका अभिप्राय समझ लिया'? देवताओंने उत्तर दिया 'हमने यह समझा है कि— दाम्यत इति न आत्थ इति । (बृहदारण्यक० ५ । १ । १) दम—इन्द्रियोंको दमन करो।' प्रजापतिने उत्तर दिया कि 'ठीक समझ गये।' मनुष्योंने उत्तर दिया—'हमने समझा है— दत्त इति न आत्थ इति । (बृहदारण्यक० ५ । १ । २) —दान करो।' प्रजापतिने कहा 'हाँ, तुम भी. समझगये।' फिर असुरोंसे पूछनेपर उन्होने उत्तर दिया— 'हमने यह समझा है कि—'दयध्वम् इति' दया करो।' प्रजापतिने उनको भी सही बतलाया। इस प्रकार तीन शिक्षाएँ मिलीं। 'दम, दान और दया' अर्थात् इन्द्रियोंका दमन करो, दान करो और दया करो। संसारमें तीन प्रकारके मनुष्य हे। देव, मनुष्य और

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