भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 832 में से

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पृष्ठ 151
  • कल्याण-मार्ग * १३७

असुर । तीनों प्रजापतिकी संतान हैं। परंतु अपने संस्कारोंसे (कर्मोंके द्वारा स्वभाव बन जानेसे) देव श्रेष्ठ हैं, मनुष्य साधारण हैं, और असुर निकृष्ट हैं। जैसे संस्कार पूर्वजन्ममें होते हैं, वैसा ही स्वभाव इस जन्ममें होता है। परंतु जो ईश्वर- के उपदेशको सुनते हैं, उसपर ध्यान देते हैं, उनकी उन्नति हो जाया करती है। असुर इसी उपदेशके प्रभावसे मनुष्य बनता है और मनुष्य देवता बन जाता है। असुर वे हैं जो अपने लाभके सामने किसी दूसरेके लाभ- की परवा ही नहीं करते। स्वार्थसिद्धि ही उनका परम ध्येय है। अपने लाभके लिये वे दूसरोंको मारने-कूटने अथवा अन्य प्रकारसे हानि पहुँचानेमे जरा भी सङ्कोच नहीं करते। वे प्रकृतिमेंसे अपने लाभके लिये हिंस्रक पशुओंके उदाहरण इकट्ठे कर रखते हैं, जो दूसरोंकी हानि करके अपना पेट भरते हैं। एक कसाई चार पैसेके लिये बकरे या गायको मार डालता है और उसके मासको प्रसन्न होकर बाजारमे बेचता है। यह है कसाईका असुरपन। एक मनुष्य जीभके स्वादके लिये एक पक्षीकी गर्दन मरोड़ देता है। यह है उस मनुष्यका असुरपन। रावणने सीताहरणके समय कब सीताजीके कष्टोंकी परवा की थी। भरी सभामें द्रौपदीको अपमानित करके दुर्योधनने असुरपनका ही परिचय दिया था। इन क्रूर हृदय प्राणियोंके लिये 'दया'से बढ़कर उत्तम और कौन उपदेश हो सकता है ? इनका मानसिक रोग ही निर्दयता है। ये दूसरे प्राणीको अपने-जैसा नहीं समझते। इसका उपचार दया है। जब 'दया' का भाव उदय होगा तो कसाईकी छुरी कुण्ठित हो जायगी। डाकूका पैर दया भाव उदय होनेपर आगे ही न बढ़ सकेगा। इसके उदाहरण महात्मा बुद्धके जीवनमें मिलते हैं। महान् घातकों और डाकुओंका भगवान् बुद्धसे सम्पर्क हुआ और महात्मा बुद्धने प्रजापतिके इस 'द' का उच्चारण किया और उनका जीवन शुद्ध हो गया। साधारण मनुष्य निर्दयी नहीं होते, परंतु वे दूसरेके कष्टोंको दूर करनेके लिये त्याग नहीं करते । उनका मत है 'प्रत्येक मनुष्य अपने लिये है और परमात्मा सबके लिये।' उनकी मनोवृत्ति बहुत सकुचित रहती है। यदि उनमे थोड़ा-सा कष्ट उठाकर दूसरोंके कष्ट दूर करनेका स्वभाव आ जाय, तो दया- का भाव सार्थक हो जाय। दूसरोंके कष्ट दूर करनेके भावसे हमारा आत्मा उच्च हो जाता है और हममें विशालताके भाव आ जाते हैं। यही यज्ञ है। इसीके प्रभावसे मनुष्य देवता बन जाते हैं।

शतपथ ब्राह्मणमे कहा है— देवाश्च वा असुराश्च । उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । ततोऽसुरा अतिमानेन एव 'कस्मिन् नु वय जुहुयाम' इति स्वेषु एव आस्येषु जुह्वत चेरु । ते अतिमानेन एव परावभूवुः तस्मात् न अतिमन्येत । पराभवस्य ह एतत् मुखं यत् अति- मान । अथ देवा अन्योन्यस्मिन् एव जुह्वत चेरुः । देवेभ्य प्रजापति आत्मानं प्रददौ । यज्ञो ह एषाम् आस, यज्ञो ह देवानामनन्नम् ॥ ( शतपथकाण्ड ५ ब्राह्मण १। १-२ ) प्रजापतिके दोनों पुत्र देव और असुर आपसमे लड पड़े। उनमे असुर अति अभिमानी थे। वे कहने लगे हमें औरोंकी क्या परवा है। इसलिये वे अपने ही मुँहमे आहुतियाँ डालने लगे। इस अभिमानके कारण वे परास्त हो गये। अभिमान नहीं करना चाहिये। यह पराजयका मूल है। देवता अपने मुँहमें न डालकर प्रत्येक दूसरेके मुँहमे आहुतियाँ डालने लगे। प्रजापति उनसे प्रसन्न हो गये और अपने-आपको उनके भेंट कर दिया। उनका यज्ञ हो गया। यज्ञ ही देवोका अन्न है। अर्थात् जो यज्ञ करता है वह देव हो जाता है। अपने स्वार्थ- को छोड़कर दूसरेका उपकार करना ही यज्ञ है। दया जब एक कक्षा और आगे बढ जाती है तो वह दान- के रूपमें परिवर्तित हो जाती है। दान वही है जिससे हम अन्य प्राणियोंके कष्टोंको दूर कर सकें। कहीं धनका देना दान है, कहीं विद्याका देना दान है। कही अन्य शारीरिक सहायता देना दान है। रोगीको ओषधि देना दान है। भूखेको अन्न देना दान है। परंतु दान वह है जिसमे अन्य लोगोंके कल्याण- की भावना हो। दान इस प्रकारसे दे कि लेनेवाला भी ऊपर उठे, पतित न हो जाय। यही भावना उस दानकी है, जो देवोंने किया। इस दानसे देवोंमें पारस्परिक त्रुटियाँ दूर हुईं, लोगोंके व्यक्तिगत कष्ट और विपत्तियाँ कम हुईं। क्रमशः उनका सघटन दृढ हुआ और समाज बलवान् हो गया। असुर इस कामको न कर सके। उनमेंसे प्रत्येकने यही चाहा कि 'सारे भोग मैं ही भोगूँ, सबका स्वामी मै ही बनूँ।' वे ऐसा ही करने लगे। प्रत्येक असुर सब भोगोंको स्वय ही भोगकर दूसरोंको वञ्चित करने लगे। असुर परास्त हो गये। असुरोंका यह काण्ड इस समय यूरोपके अदर घटित हो रहा है। प्रत्येक राष्ट्र सारी वस्तुएँ स्वय ही हड़प लेना चाहता है। प्रजापति उनसे विमुख हो जायगा और वे पराभवको प्राप्त होंगे।