भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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१३८ ५. महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सारा मानव-समाज बड़े वेगसे इसी असुरभावकी ओर दौड़ रहा है। व्यक्तिगत सकुचित स्वार्थने उसको महान् लक्ष्यसे च्युत कर दिया है। पता नहीं इसका क्या परिणाम होगा । गीताके १६वें अध्यायमे वर्णित असुर मानवके लक्षणोंका मिलान करनेसे आजका मानव समाज उसमें प्रायः पूरा उतरता है ।] दया और दानके पश्चात् एक त्रुटि शेष रह जाती है । वह है इन्द्रियनिग्रह । देवता अपने देवत्वके पदसे इसीके अभावसे गिर जाता है । एक कामी पुरुषका कहीं मान नहीं होता। जब इन्द्रियाँ अपने विषयसे पृथक् होने लगती है तो उनकी अन्तर्वृत्ति हो जाती है। गीताके १६ वें अध्यायमें कहा है— त्रिविध नरकस्येद द्वारं नाशनमात्मन । काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रय त्यजेत् ॥ (२१) 'काम, क्रोध और लोभ तीनों आत्माके नाशक और नरकके द्वार हैं। इसलिये इनको त्यागना ही चाहिये ।' य शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुख न परा गतिम् ॥ (गीता १६ । २३) 'जोवेद शास्त्रविहित विधिको छोड़कर (कामनासे प्रेरित होकर) मनमाना काम करते हैं, उनको न तो फलकी सिद्धि होती है, न सुख मिलता है, न मोक्षकी ही प्राप्ति होती है।' (४) त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययन दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीय। अत्यन्तमात्मान- माचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति, ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति । (छान्दोग्य० २ । २३ । १) धर्मके तीन भाग हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान मिलकर प्रथम स्कन्ध या भाग होता है । तपस्या ही दूसरा भाग है। आचार्यकुलमें रहता हुआ अपनेको जो तपस्वी बनाता, है यह तीसरा भाग है। वे सभी पुण्यलोकवाले होते हैं, परतु इनमेसे ब्रह्मनिष्ठ मुक्तिको पाता है। यज्ञ यज्ञके सम्बन्धमें मुण्डकोपनिषद्में उपदेश है— यदा लेलायते ह्यर्चि समिद्धे हव्यवाहने । तदाज्यभागावन्तरेणाहुती प्रतिपादयेत् ॥ 'जब अग्नि भलीभाँति जलायी जा चुके और उसमे लौ उठने लगे तब उसमें घी, सामग्री आदिकी आहुतियाँ श्रद्धा- पूर्वक देनी चाहिये । क्योंकि हवनको जलानेवाली अग्नि 'हव्यवाहन' है। अर्थात् हविको सूक्ष्म करके वायुमण्डलमें फैला देती है। इससे वायु शुद्ध होकर रोगके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, और स्वास्थ्यको लाभ पहुँचता है। यज्ञके रसायनशास्त्र (Chemistry के अनुसार Aldehydes नामरू वायु (Gas) पैदा होती है, जो रोगोंको दूर करनेवाली तथा स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। आश्वलायन गृह्यसूत्रमे यज्ञके ये लाभ बतलाये ह— ॐ अयंत इध्म आत्मा जातवेदस्तेन इध्यम्ब वर्धस्व च इद्धय वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन अन्नाद्येन समेधय स्वाहा। (८।२०।२२) 'हे अग्नि ! तू प्रज्वलित होकर हमको प्रज्वलित कर । तू बढ ओर हमको भी बढा प्रजया अर्थात् मतानसे, पशुओसे, आत्मज्ञानसे तथा अन्नमे । यज्ञमे इन चारों पदाथार्की प्राप्ति हो जाती है।' यज्ञमे हव्य पदार्थ सूक्ष्म होकर रोगोंको नाश करते हुए, पुष्टिदायक पदार्थोसे गरीरको पुष्ट करते हैं । पहले हलवाई कभी भी दुबले नहीं देखे जाते थे। क्योंकि वे कढाईके पास बैठकर असली घीकी वाष्पको बराबर ग्रहण करते रहनेसे पुष्ट हो जाते थे। यह है घीके वाष्पका प्रभाव । जब यह बाष्प अन्य ओषधियों तथा सौम्य पदाथंके वाष्पसे युक्त होकर शरीरमें प्रवेश करेगी तो उसके लाभसे गरीर तथा मस्तिष्क पुष्ट होगा और मन शान्त होगा। इनके गान्त होनेपर उपर्युक्त लाभ अर्थात् सन्तान, पशु आदि ऐश्वर्यशाली पदार्थोंकी प्राप्ति होती ही है। मुण्डकोपनिषद्मे कहते हैं— यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुत- मासप्तमास्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वा ॥ एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकाल चाहुतयो ह्याददायन् । त नयन्त्येता. सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥