कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- कल्याण-मार्ग * १३९ एह्येहीति तमाहुतय सुवर्चस सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति। प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्य सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ( १।२।३–६) 'यज्ञ कई प्रकारके हैं। अग्निहोत्र जिसका नित्य साय और प्रातः करनेका विधान है। दूसरी दर्श-इष्टि, जो अमावस्याको की जानी है, और पौर्णमास-इष्टि जो पूर्णिमाको की जाती है। तीसरी चातुर्मास्य-इष्टि जो वर्षाऋतुमे की जाती है। चौथी आग्रयण-इष्टि, पाँचवीं अतिथि-यज्ञ, छठा वैश्वदेवयज्ञ है। जो गृहस्थ इन यज्ञोंको नहीं करता, उसके सात लोक नष्ट हो जाते हैं। काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी, विश्वरुची-ये अग्निकी सात जिह्वाएँ हैं। जो लोग इस प्रकार प्रदीप्त अग्निमें आहुतियाँ देते हैं, उनकी आहुतियोंको सूर्यकी किरणें उस स्थानपर पहुँचा देती हैं, जहाँ देवोंके पति अर्थात् ब्रह्मका निवास है। ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके साथ चलती हुई मानो यजमानको बड़ी मीठी बोलीमें पुण्यलोककी ओर बुलाती हैं। तात्पर्य यह है कि नित्य श्रद्धाके साथ यज्ञ करनेसे जीवन पवित्र होता है और परलोक बनता है।' अध्ययन तैत्तिरीय उपनिषद्में शिक्षाका विषय मुख्यतया प्रतिपादित किया है। उसमें स्वाध्यायके विषयमे लिखा है— ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथीतर । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टि । स्वाध्याय-प्रवचने एवेति नाको मौद्गल्य । तद्धि तपस्तद्धि तप ॥ (१।९।१) 'ऋत अर्थात् सृष्टिके नियमोंको यानी विज्ञान (Science) को पढ़ो-पढ़ाओ। स्वाध्याय कहते हैं स्वय पढनेको एवं प्रवचन कहते हैं दूसरोंके पढ़ानेको। तपके साथ पढ़ो-पढ़ाओ। तप कहते हैं सात्विक श्रमको। इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पढ़ो-पढाओ। शान्तिपूर्वक पढो-पढाओ। अग्नि (शक्ति 'Power' अर्थात् भौतिक विज्ञान एवं इंजिनियरिंग) को पढो-पढाओ। अग्निहोत्रको करते हुए पढो पढाओ। अतिथिकी सेवा करते हुए पढ़ो-पढाओ। मनुष्यमात्रके कल्याणपर विचार करते हुए पढ़ो-पढाओ। प्रजा अर्थात् सर्वसाधारणके हितका ध्यान करते हुए पढो-पढ़ाओ। प्रजन अर्थात् सन्तानवृद्धिकी समस्याओंपर विचार करते हुए पढो पढाओ। इसके अन्तर्गत केवल मनुष्यकी नहीं वर पशु-पक्षी तथा वृक्षादिकी उत्पत्ति तथा वृद्धिके नियम भी आ जाते हैं। अपनी जातिके हितकी कामनासे पढ़े। राथीतर आचार्यका मत है कि सत्यभाषण सबसे बड़ी चीज है। सत्यभाषण कभी न छोड़ना चाहिये। पौरुशिष्टि आचार्यका कथन है कि तप मुख्य हैं, तपपर बल देना चाहिये। मुद्गल आचार्यके शिष्य नाक स्वाध्याय और प्रवचन-पर बहुत बल देते हैं।' स्वाध्यायसे मस्तिष्कवृद्धिके साथ-साथ आत्मिक उन्नति भी होती है। जैसा मन सोचता है, वैसा बोलता है। जैसा बोलता है, वैसा करता है। दूसरे, पुराना अनुभव बराबर प्राप्त होता रहता है और हमें क्षेत्र मिलता है कि उन अनुभवोंमें हम वृद्धि कर सकें। जहाँ पठन-पाठनकी क्रिया नहीं है, वहाँ पैतृक अनुभव न प्राप्त होनेसे क्रमशः ज्ञान-वृद्धि रुक जाती है। यही ऋषि-ऋण है, जो तीन ऋणोंमेसे एक है, जिसके पालनार्थ हम यज्ञोपवीत धारण करते हैं। गृहस्थियोंको प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा स्वाध्याय करते रहना चाहिये। कभी छोड़ना नहीं चाहिये। दान धर्मकी तीसरी शाखा दान है। उपनिषदोंमें कहा है— श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया देयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । 'श्रद्धासे देना चाहिये, अश्रद्धासे देना चाहिये। सौन्दर्यसे देना चाहिये। लोक लज्जासे देना चाहिये। भय अर्थात् पाप-पुण्यके विचारसे देना चाहिये। संविदा अर्थात् ज्ञानपूर्वक दो।' अर्थात् जैसा ऊपर कहा जा चुका है कि मनुष्यमात्रके कल्याणको समझकर देना चाहिये। दान पापोंकी वृद्धि करनेवाला न हो। धर्मका दूसरा स्कन्ध तप है। अर्थात् इन्द्रियदमनके साथ-साथ आत्मोन्नतिके लिये घोर परिश्रम करना तप है। तीसरा स्कन्ध है कि नियमके साथ आचार्यकुलमें नियमित समयके लिये निवास करना। गृहस्थ अपनी सन्तान तथा अन्य बालकोंको शिक्षा-दान कराकर इस नियमका पालन कर सकते हैं।