भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 832 में से

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पृष्ठ 154

१४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आध्यात्मिक मार्गमे अग्रसर होनेके लिये आहारशुद्धिमे ओंकारका (भगवन्नामका ) जाप कर रहा होता हूँ । काम चलना चाहिये । और अपने अंदर दया, दान और आता होगा तो मेरे मनकी ड्योढीको बंद पाकर लौट जाता इन्द्रियदमनकी भावनाको बढाना चाहिये । निरन्तर होगा ।' अतः मनको खाली न रखना सबमे उत्तम यज्ञ करते हुए अध्ययनको भी वरावर करते रहना ब्रह्मचर्यका साधन है । चाहिये । आहारशुद्धि, यज्ञ और दान कर्म हैं, जिनको इन साधनों को अपनानेसे मनुष्यका कल्याण होता है, प्रयत्नसे कर सकते हैं । दया स्वयं आहारशुद्धिमे पैदा और राष्ट्रका भी कल्याण होता है । एक विद्वान् धर्मात्मा होने लगती है । आहारका प्रभाव इन्द्रियदमनपर पड़ता है । योगी राष्ट्रकी गतिविधियोको बदल देना है । ऐसे पुरुष देवता दूसरे, अध्ययन मनोविचारोंको भी शुद्ध करता है । हो जाते हैं । जिनमे दिव्य गुण हो, वह देवता है । धन्य है स्वामी दयानन्दमे जब बगालके प्रसिद्ध नेता अश्विनीकुमार- वह राष्ट्र जहाँ ऐसा देव-समाज प्रमुख हो । जहाँ असुर अर्थात् ने ब्रह्मचर्यके साधनोपर प्रश्न करते हुए पूछा कि 'महाराज ! स्वार्थी, क्रूरकर्मा तथा दुराचारी व्यक्तियोंका प्राधान्य है, आपने यह ऊँची स्थिति किस साधना और किस उपायमे वहीं कष्ट है, दुःख है और निश्चित पराभव है। हमारे राष्ट्रके प्राप्त की है ?' तो उन्होंने बड़ा ही सुन्दर उत्तर दिया कि नेता, हमारे राज्यके सूत्रधार इसी उपनिषद् धर्मको पालन 'इसका उपाय बड़ा सरल है। मे कभी अपने मनको खाली करते हुए राष्ट्रको परमोन्नत दशामें पहुँचा सकते हैं । नहीं रहने देता । मै हर समय किसी-न किसी काममें लगा 'ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति' । वेद कहता है कि रहता हूँ । कभी वेदभाष्य, कभी वेदाङ्गप्रकाश लिखना, 'ब्रह्मचर्य और तपसे राजा राष्ट्रकी रक्षा करता है ।' धर्मके कभी दर्शकोंके प्रश्नोंका समाधान, कभी शास्त्रार्थ और कभी इन नियमोंपर चलना ही ब्रह्मचर्य है, तप है । ये ही नियम पत्रोत्तर लिखवाता हूँ। जब कोई और काम नहीं होता तो महाराज जनककी तरह व्यक्तिको विदेह बना सकते हैं । उपनिषत्सार ( रचयिता—श्रीभवदेवजी झा ) यही सब उपनिषदोंका सार । सार-रूप केवल ईश्वर है, यह संसार असार ॥ १ ॥ क्षणभङ्गुर दुर्लभ मानव-तन, विषय सभी निस्सार । बरबस इस मनको वशमें कर, करो आत्म उद्धार ॥ २ ॥ भू-मण्डलके कण-कणमें है, विभुका ही विस्तार । सबमें जीव समान जानकर, करो तुल्य-व्यवहार ॥ ३ ॥ अनासक्त होकर करना है, निज आहार-विहार । अहंकार-परिहार न जबतक, नहीं कर्म-निस्तार ॥ ४ ॥ सत्य-शोध ही भव-रोगोंका, एक मात्र उपचार । आत्म-बोध ही पहुँचाता है, जगन्मुक्तिके द्वार ॥ ५ ॥ देही अजर-अमर-अक्षर है, देह विकारागार । यही देह-देही-विवेक ही, देता पार उतार ॥ ६ ॥ है स्वरूप-विस्मृति ही माया, और ब्रह्म ओंकार । निर्गुण-सगुण एक ईश्वर है, निराकार-साकार ॥ ७ ॥ 'मैं' हूँ निर्व्यापार न मेरा, नाम-रूप-आकार । 'मैं' भी वही ब्रह्म हूँ, सत्-चित्-सुखका पारावार ॥ ८ ॥