भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

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भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म

( लेखक—प० श्रीरामकिङ्करजी उपाध्याय )


[बायाँ स्तम्भ]

गिरिराज हिमालयके सर्वोच्च शिखरका नाम है—कैलास (आनन्दका निवास स्थान) । सचमुच आनन्द यहाँ मूर्तिमान् होकर निवास करता है। यह है भगवान् भूतभावन शिवकी, क्रीडास्थली । इस शिखरके ही एकान्त शान्त प्रदेशमें एक है विशाल वट-वृक्ष, जिसे भगवान् शिवका विश्रामस्थल कहा जाता है। पर यह विश्राम शब्द भी है सांकेतिक ही—

सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा ॥

—मानकर शम्भु विश्रामके मिस यहाँ आकर प्रभु-प्रेममे तन्मय हो उनके नाम-रूपका स्मरण करते रहते हैं ।

एक दिन शशाङ्कशेखर अपने गणोंसे बिना कुछ कहे ही वटकी सुशीतल छायामें व्याघ्रचर्म बिछा सहज ही जा विराजे । गिरिराज-नन्दिनी भवानी सुअवसर देख अनिमन्त्रित होनेपर भी भगवान् शिवके चरणोंमे जाकर प्रणत हुईं । परम कृपालु महेशने उनके मानरहित प्रेमको देखकर उनका सत्कार करते हुए बैठनेको आसन दिया । शैलजाके हृदयमें पूर्वजन्मसे ही एक सन्देह गूँज रहा था। उसको पूर्ण रीतिसे निवृत्त कर लेना ही उन्हें उचित जान पड़ा। प्रमथेशकी आज्ञा पाकर उन्होंने प्रश्न किया—'प्रभु ! मैने वेदवक्ता मुनियोंके मुखसे ब्रह्मका जो वर्णन सुना है, उसमें उन्हें व्यापक, विरज, अज, अकल, अनीह और अभेद आदि नामोंसे सम्बोधित किया गया है। क्या ऐसे ब्रह्मका अवतार सम्भव है ?'

ब्रह्म जो व्यापक विरज अज अकल अनीह अभेद । सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानन वेद ॥

हाँ, त्रैलोक्य पालक भगवान् विष्णुका अवतार राम-रूपमे होता है। यह मैने ऋषियोंके मुखसे सुना है। परंतु ब्रह्मका अवतार तो बुद्धिमे न आनेवाली बात है। उपनिषदोंमे भी विशेषरूपसे निर्गुण निर्विशेषका वर्णन आता है, यह भी मैंने सुना है। क्या उपनिषत्-कथित निर्गुण-निर्विशेष ब्रह्म और रघुवंशशिरोमणि राममें कोई भेद नहीं ? आस्तिकोंके लिये तो श्रुति ही परम प्रमाण है। और जब वह निर्गुण ब्रह्मके वर्णनको ही विशेषरूपसे अपना लक्ष्य बनाती है, तब सगुण-साकार रामके प्रति आपका यह प्रेममय भाव कुछ समझमें नहीं आता। राम ही ब्रह्म है, क्या यह आपका स्वतन्त्र मत है ? आपसे बढ़कर वेदार्थका ज्ञाता और कौन है ?


[दायाँ स्तम्भ]

तुम्ह त्रिभुवन गुर वेद बखाना । आन जीव पांवर का जाना ॥ अस्तु । प्रभु जे मुनि परमारथवादी । कहहि राम कहँ ब्रह्म अनादी ॥ रामु सो अवध नृपनि सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई ॥ जौं अनीह व्यापक विभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥

अपर्णाकी छलविहीन वाणी सुनकर कामारि परम प्रसन्न हुए, क्योंकि इसी मिससे उन्हे प्रभुके गुणानुवाद गानेका एक सुअवसर प्राप्त हो गया । प्रभुके रूप-गुणका स्मरण होते ही गङ्गाधरके नेत्रोंमे प्रेमाश्रु छलक पड़े। हृदयसे भक्तिकी एक नव-मन्दाकिनी निकलकर भगवती भवानीको आप्लावित और शीतल करने लगी—

मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह । रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह ॥

उत्तर देते हुए भगवान् शिवने कहा—उमा ! प्रभु-विषयक प्रश्न तो सदा ही परम कल्याणकारी है। पर तुम्हारा यह कहना मुझे रुचिकर नहीं लगा कि क्या 'वेद-प्रतिपादित ब्रह्म ही राम है ?' ऐसा सन्देह तो वेदार्थका ठीक ज्ञान न रखनेवाले ही करते हैं।

कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच । पाषंडी हरि-पद विमुख जानहि झूठ न साँच ॥

शिवे ! वास्तवमें 'ब्रह्म-तत्त्व' अचिन्त्य ही है। इसीलिये वेदोंने भी उसका वर्णन 'नेति, नेति' रूपसे ही किया है ।

नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥

तुमने कहा कि 'राम ही ब्रह्म हैं। क्या यह आपका स्वतन्त्र मत है ?' पर तुम्हारा यह कथन समीचीन नहीं। श्रुति-विरुद्ध तो भगवत्-कथन भी आस्तिकोंको मान्य नहीं। इसीसे तो बुद्ध भगवान्‌के प्रति श्रद्धाका भाव रखते हुए भी उनकी वेद विरुद्ध कथित बातोको कोई भी आस्तिक स्वीकार नहीं करता—

अतुलित महिमा वेद की तुलसी कीन्ह विचार । ज निन्दत निन्दित भयो विदित बुद्ध अवतार ॥

इसलिये मै जो कुछ कहूँगा, वह श्रुति-सम्मत ही कहूँगा। जैसा मैने पूर्वमें ही कहा कि वेद भी उस ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ निर्देश करनेमें मौन ही रहते हैं। तुम्हारा यह कथन किसी अंशमें यद्यपि ठीक ही है कि उपनिषदोंमें निर्गुण अचिन्त्यरूपका