कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 832 में से
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१४२ ॐ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॐ ही विशेषरूपसे निर्देश किया गया है। पर यह तो असमर्थताके कारण ही, क्योंकि निर्गुण व्यापक रूपसे तो उसका समझाना कुछ सरल भी है। पर उसके दिव्य चिदानन्दमय सौन्दर्य- माधुर्य-सुधा समुद्र सगुण-साकार मगल विग्रहके असमोर्ध्व अचिन्त्यानन्त कल्याण-गुणगण और उसकी मुनि मन हारिणी कमनीय रूप माधुरीका न तो यथार्थतः वर्णन ही किया जा सकता है, न उसे समझाया ही जा सकता है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन न जानइ कोइ । सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ निर्गुण रूप तो विचारगम्य है और विचारका उत्पादन साधनोंसे सभव है। पर सगुण स्वरूप तो बिना प्रेमके समझा ही नहीं जा सकता। और प्रेम साधनसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता। वह तो प्रभु-कृपासे ही सम्भव है। इसलिये जहाँ- तक साधन-बल है, वहाँतकके स्वरूपका निर्देश कर सगुण- स्वरूपका केवल सकेत करते हुए ही उपनिषद् मौन हो जाते हैं। वेद तो स्वय श्रीभगवान्के दर्शन एव उनके प्रेमकी सदा आकाङ्क्षा करते रहते हैं। इसीलिये तो नृपालचूडामणि मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराघवेन्द्रके राज्याभिषेकके अवसर- पर चारों वेद 'बदी वेष' मे प्रभुके स्वरूपका विशद विवेचन करते हुए अन्तमें कहते है— ज ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन-पर ध्यावहीं । ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥ करुनायतन प्रभु सदुनाकर देव यह वर माँगहीं । मन वचन कर्म विकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥ वास्तवमे प्राकृतगुणरहित सगुण ब्रह्म वर्ण्य है ही नहीं। वे तो प्रेम ही करनेयोग्य है। वर्णन तो निर्गुणका ही सम्भव है। इसीसे अगस्त्यजीने प्रभुके चिन्मय स्वरूपका विवेचन करते हुए अन्तमें कहा— जद्यपि ब्रह्म अखड अनता । अनुभवगम्य मजहि जेहि सता ॥ अस तव रूप बखानउँ जानउँ । फिरिफिरि सगुन ब्रह्मरति मानउँ ॥ जबतक प्रभु कृपा किंवा सत-कृपासे हृदयमे प्रेमका प्राकट्य न हो जाय, तबतक प्रभुकी मङ्गलमयी लीलाका वर्णन सार्थक नहीं। गिर्रिजे ! मैं स्वय भी अनधिकारीके प्रति इसका उपदेश नहीं करता। तुम्हे मै अपनी एक चोरी बता रहा हूँ। बात उस समयकी है, जब तुम दक्ष तनया सतीके रूपमे मेरे निकट थी, उस समय तुम्हारा चित्त बड़ा ही सशय-ग्रस्त था। इसीसे जब मैने सुना कि प्रभु अपनी दिव्य लीलाका प्राकट्य करनेके लिये अयोध्यामें अवतरित हो गये है, तब मैंने इस सुखवादका सुनाना तुमसे उचित न समझा। क्योंकि रसका प्रसङ्ग सच्चा रसिक ही समझ सकता है। हाँ, मैने परमप्रभु- प्रेमी काकभुशुण्डिको अवश्य ही साथ ले लिया। औरउ एकु कहउँ निज चोरी। सुनि गिरिजा अति दृढ मति तोरी ॥ कागभुसुडि सग हम दोऊ । मनुज रूप जानइ नहि कोऊ ॥ परमानन्द प्रेम सुख फूले । वीथिन्ह फिरहि मगन मन भूले ॥ पर अयोध्याकी वीथियोंमे विहरण करनेपर भी बिना प्रभु दर्शनके हमारी तृप्ति न हुई। तब हम दोनोंने गुरु-शिष्य- रूपसे ज्योतिषीका बाना बनाया और अपने गुणका ख्यापन करनेके लिये अयोध्याके राजप्रासादकी दासियोंके पुत्रोंके हाथ देखने प्रारम्भ किये। अन्तम दासियोंने जाकर कौसल्या अम्बासे इसकी सूचना दी— अग्रह आजु आगनि एक आयो । बूढो बडो प्रमाणिक ब्राह्मन सकर नाम सुहायो ॥ अन्तमें हम दोनोंकी मनोकामना पूर्ण हुई और कौसल्या अम्बाने अपने लालका भविष्य जाननेकी इच्छासे हमें भीतर बुलवा लिया। गिर्रिजे ! शिशु-ब्रह्मके इस नव-नील- नीरद दिव्य वपुपुको निहारकर नेत्रोंको जो आनन्द हुआ, वह वर्णनातीत है। वह उपनिषत् कथित व्यापक ब्रह्म कौसल्या अम्बाकी नन्ही सी गोदीमें पड़ा मन्द-मन्द मुसकरा रहा था। सर्वतन्त्र-स्वतन्त्रकी यह प्रेमपराधीनता देख मेरे मुखसे बरबस ही निकल पड़ा कि— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन विगत विनोद । सो अज प्रेम-भगति-वस कौसल्या कें गोद ॥ प्रिये ! शिशु ब्रह्मकी यह अद्भुत झाँकी, वाणीका नहीं, नेत्रका विषय है। रूप सरूहि नहि कहि श्रुति सेषा । सो जानइ सपनेहुँ जहि देखा ॥ प्रभु सोभा सुख जानहि नयना। कहि किमि सकहि तिन्हहि नहिं बयना॥ मङ्गलमय प्रभुके श्रीकरारविन्दोंको अपने हाथमें ले मैने कालातीत प्रभुका भविष्य-कथन भी कर डाला। इस सौभाग्य- सुखसे मे कुछ कालमें वञ्चित कर दिया गया। क्यों, उन अनीह प्रभु लीला प्रेम-विहारीको बुभुक्षा सता रही थी और वह पूर्णकाम वात्सल्य सुधारिपूर्ण पवित्र मातृ-स्तनोंका पान करनेके लिये अत्यन्त लालायित हो रहा था। प्रभुकी इस परम कौतूहलमयी लीलाका वार बार स्मरण करता हुआ मे कैलास- शिखरपर लौट आया। पर लौटनेपर भी यह रहस्य मैंने उस समय तुम (सती) से छिपा ही रक्खा और आज उसे तब व्यक्त कर रहा हूँ, जब तुम्हारे हृदयमे प्रभुको पहचाननेकी सच्ची जिज्ञासा जाग्रत् हो गयी है।