भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157
  • भगवान् श्रीरामचन्द्र और औपनिषद ब्रह्म * १४३ निर्गुण निराकार ब्रह्मकी उपनिषत्-कथित पद्धतिसे उपासनाके पश्चात् ही प्रभुके पुनीत पाद-पद्मोंमे प्रेम उत्पन्न होता है। उपनिषद्-ज्ञानकी परिसमाप्तिपर ही प्रभु-प्रेमका पावन प्रारम्भ होता है— जहँ लगि साधन वेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी ॥ सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। गमकूपा काहू इक पाई ॥ ज्ञान-वैराग्यके द्वारा जिन्होंने अपने सच्चे नेत्रोको प्राप्त कर लिया है, उपनिषद् केवल उन्हीको रघुवगमणिके इस स्वरूपका सकेत करते हैं। अब मै तुम्हारे प्रश्नोंकी ओर आता हूँ। तुम्हारा यह कथन 'अगुण सगुण कैसे हो सकता है?' इसके लिये केवल जलका उदाहरण देना पर्याप्त है। जैसे जल वर्फ रूपमें परिणत होकर भी जल ही रहता है—उसमे कोई विकृति नहीं आती, उसी तरह निर्गुणका सगुण रूपमे परिणत होना है— जो गुनरहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहि जैसें ॥ तुम्हारा यह कथन भी सर्वथा भ्रान्त ही है—'व्यापक एकदेशीय हुए बिना अवतरित कैसे होसकता है?' वास्तवमें अवतरित होनेपर भी सर्व देश उनमें ही निवास करते हैं। एक देशमें उनका दर्शन तो हमारे नेत्रकी सीमित शक्तिके कारण ही प्रतीत होता है। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो सर्वव्यापकताकी सच्ची सिद्धि तो प्रभुके प्राकट्यकालमें ही सम्भव है, क्योंकि निर्गुण-निराकार रूपसे वह सर्वत्र है ही, इसका क्या प्रमाण ? उसका होना तो केवल माना हुआ ही है, क्योंकि वह रूपवान् तो है नहीं। अवतारकालमे एक देशमें प्रतीत होते हुए भी 'सर्वदेश उसमें है और वह सर्व-देशमें है' यह स्पष्ट रूपसे सिद्ध हो जाता है। एक बार परम भक्त कागजीको ऐसा ही सदेह हो गया था। श्रीदशरथजीके मणिमय प्राङ्गणमें शिशु-ब्रह्म बाल-क्रीड़ामें निमग्न था। महाभाग काग भी कौसल्यानन्दनकी इस मङ्गलमयीलीलाका आनन्द लेनेके लिये 'लघु वायस वपु' धारण कर उनके निकट ही विचरण कर रहा था। अचानक प्रभुको एक विनोद सूझा। कागको और भी निकट बुलानेके लिये अपने हाथका मालपुआ उसकी ओर बढ़ा दिया। पर ज्यों ही प्रसादके लोभसे भुशुण्डि निकट आया, त्यों ही प्रभुने अपने श्रीकरारविन्दोंको खींच लिया। इस प्रकारका विनोद कुछ क्षणोंतक चलता रहा। कागके हृदयमें एक नवीन प्रश्न उठ खड़ा हुआ, प्रभुको न पकड़ सकनेकी इस असमर्थता-को देखकर— प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह । कवन चरित्र करत प्रभु चिदानन्द-सदोह ॥ फिर क्या था। प्रभुने अपनी भुजाएँ फैला दीं पकड़नेके लिये और काग भी अपनी सम्पूर्ण शक्तिके साथ उड़ चला। अपनी इस अवस्थाका वर्णन उसने इन शब्दोंमें किया है— सप्तावरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि । गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयउँ बहोरि ॥ लौटकर आना पड़ा प्रभुके उन्हीं अभयप्रद चरणोंमें। पर प्रभुने सोचा सर्वव्यापकताके दर्शनको अधूरा ही क्यों छोड़ा जाय। मुस्कराकर राघवेन्द्रने मुँह खोला और तुरंत कागको उदरस्थ कर लिया। तब दिखायी पड़ा कागको वह आश्चर्यमय कौतुक, जिसका वर्णन उसने इन शब्दोंमे किया है— उदर माझ सुनु अडजराया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ अति विचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका ॥ कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रवि रजनीसा ॥ अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥ सागर सरि सर विपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि विस्तारा ॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किन्नर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥ जो नहि देखा नहि सुना जो मनहूँ न समाइ । सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि विधि जाइ ॥ एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक । एहि बिधि देखत फिरतँ मैं अंड कटाह अनेक ॥ इस प्रकार रामने भक्त कागको अपनी सर्वकारणता और सर्वाश्रयता दिखला दी। × × × × वास्तवमे अवतार-कालमे भी ब्रह्म एक देशमें सीमित नहीं हो जाता। जैसे सूर्यमण्डल उतना लघु नहीं, जितना हमारे लघु नेत्रोंसे दीखता है, वह तो अकेला ही समग्र ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता रहता है। उसी तरह ब्रह्मका एक देशमें प्रतीत होनेमे भी अपना भ्रम ही मानना चाहिये। वहाँ भी वह सर्व-देशीय ही है, एकदेशीय नहीं। रविमंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु त्रिभुवन तम भागा ॥ तुम्हारा यह कथन कि वह देह कैसे धारण कर सकता है? यह भी ब्रह्म रामके देहका ठीक स्वरूप न जाननेके कारण ही है। क्या उसका शरीर साधारण प्राणियोंका-सा पञ्चतत्त्वोंसे निर्मित है? वास्तवमें प्रभुमें तो देह-देहीका कोई भेद है ही नहीं, इसीलिये उनके देहको भी सच्चिदानन्दघन-विग्रह कहा जाता है।