भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 832 में से

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पृष्ठ 158

१४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * चिदानंदमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी ॥ सच्चिदानन्दमय होनेसे उनको इन मायिक नेत्रोंसे देखा भी नहीं जा सकता। प्रभुका स्वरूप इन्द्रियोंका विषय है ही नहीं, इसीसे वाल्मीकिजीने प्रभुकी वन्दना करते हुए कहा— गम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर । अविगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥ गिरिजे ! सृष्टिकी एक भी वस्तुका समग्र रूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर सर्वमय और सर्वकारण एव साथ ही सर्वपर तथा सर्व कारणकारणातीत ब्रह्म रामका विवेचन बुद्धि या वाणीसे कैसे सम्भव है। प्रकाश्य प्रकाशकको प्रकाशित करे, क्या यह कभी देखा-सुना गया है ? राम तो इन्द्रिय, मन, देवता—सभीके प्रकाशक, जीवके भी परम प्रकाशक हैं। फिर अपनी उस बुद्धिसे हम उनके ठीक स्वरूप समझने या समझानेकी चेष्टा करें, यह कितनी हास्यास्पद बात है ? विषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥ सव कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥ इसीलिये कहना पड़ता है— राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥ वे अवतार ही क्यों लेते हैं ? इसका भी ठीक उत्तर नहीं दिया जा सकता ? यह है भी उनके स्वरूपके अनुरूप ही । यदि ठीक बताया जा सकता तो वे भी ज्ञात विषयोंकी श्रेणीमें आ जाते । उनके अवतरित होनेके विषयमे प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाके अनुरूप ही अर्थ लेता है। देवता समझते हैं— हमारी रक्षाके लिये, धार्मिक मुनि समझते हैं धर्मरक्षाके लिये और राक्षसोंको भी यह सोचनेका अधिकार है कि वे उन्हें गति देनेके लिये आते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो प्रभुके अवतार लेनेसे सभी जीवोंको कुछ-न कुछ प्राप्त होता है। वे तो कारणातीत होनेसे सहज ही अवतरित होते हैं, पर उनके इस सहज कारुण्यसे असंख्य जीवोंको सन्मार्ग और कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि जिन अमलात्मा परमहंसोंने निर्गुणोपासनासे अपने कर्म-बन्धनोंका सर्वथा उच्छेद कर डाला है और ज्ञाननिष्ठामें सर्वथा परिनिष्ठित हैं, उनके ऊपर प्रसन्न होकर उनको अपने इस सच्चिदानन्द- विग्रहका प्रत्यक्ष दर्शन और भक्तियोगमें प्रवृत्त करानेके लिये ही प्रभु अवतरित होते हैं। शुभे ! सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमारोंको तो तुम जानती ही हो, उनका दिव्य-देह भौतिक नहीं, जिनकी सदा एकही-सी बाल्यावस्था बनी रहती है और नित्य निरन्तर ब्रह्मानन्दमे सर्वथा परिनिष्ठ हैं, जिन्हें मूर्तिमान् वेद कहना भी अत्युक्ति न होगी— ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुरूपारीना ॥ रूप धरे जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि विगत बिभेदा ॥ उन्होने भी जिस समय आनन्दकन्द प्रभुका श्रीअवध धाममे दर्शन किया, सारी ज्ञाननिष्ठाको बहा दिया । करते भी क्या, प्रभुके कोटि-कन्दर्प कमनीय श्रीअङ्गके दर्शनका प्रभाव ही ऐसा है। उन्होंने मनको निष्ठायुक्त बनाये रखनेकी बड़ी चेष्टा की, पर— मुनि रघुवर छवि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥ नेत्र स्थिर हो गये, पलके भी नहीं गिरतीं, प्रेमसे प्रभुके श्रीचरणोंमें बार-बार प्रणाम करते हैं और फिर तो उन्हें इस स्वरूपमें इतना अधिक आनन्द आया कि उन्होने सदा-सर्वदाके लिये प्रभुसे प्रेमभक्तिकी ही कामना की। परमानद कृपायतन मन परिपूरन काम । प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ क्या ब्रह्मविद्वरिष्ठ सनकादि-जैसे परम तत्त्वज्ञ और वेदार्थके यथार्थ ज्ञाता किसी साधारण राजकुमारको किंवा किसी लौकिक रूपको देखकर इस प्रकार विह्वल हो सकते हैं ? इससे तुम समझ सकती हो कि मै ही नहीं, अपितु अन्य सभी वेदान्तपरिनिष्ठ महापुरुष रघुवंशशिरोमणि सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराघवेन्द्रको ब्रह्मसे अभिन्न ही नहीं—उनसे बढ़कर मानते हैं और ब्रह्मानन्दको भुलाकर उनकी भक्तिमे सलग्न हो जाते हैं। भेद तो उनको ही जान पड़ता है जो वासनामलिन और ज्ञाननेत्रविहीन हैं। यदि ऐसे लोग वेदका नाम लेकर भी भेदका प्रतिपादन करें तो उन्हें नास्तिक और वेदज्ञानशून्य ही समझना चाहिये । उनकी बातपर ध्यान न देना ही उचित है। अज्ञ अकोविद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ सत सभा नहि देखी ॥ कहहि ते वेद असमत बानी । जिन्ह कें सूझ न लाभु नहि हानी ॥ और तब भगवान् पञ्चमुख शङ्करने अपना दृढ मत व्यक्त करते हुए पाँचों मुखोंसे कहा कि 'जिन्हें वेद ऐसा