कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * औपनिषद-दृष्टिसे इसमे कोई भी विरोध या असामञ्जस्य नही है। भगवान्का नित्य एक रहना, नित्य बहुत से रूपोंमे अपने आस्वादनकी कामना करना और नित्य बहुत-से रूपोमे अपने- को आप ही प्रकट करना एव सम्भोग करना—यह सब उनके एक नित्यस्वरूपके ही अन्तर्गत है। कामना, ईक्षण और आस्वादन—ये सभी उनकी निरवच्छिन्न पूर्ण चेतनाके क्षेत्रमे समान अर्थ ही रखते है। भगवान् वस्तुतः न तो एक अवस्थासे किसी दूसरी अवस्थाविशेषमें जानेकी कामना ही करते हैं और न उनकी सहज नित्य स्वरूप-स्थितिमें कभी कोई परिवर्तन ही होता है। उनके बहुत रूपोंमें प्रकट होनेका यह अर्थ नहीं है कि वे एकत्वकी अवस्थासे बहुत्वकी अवस्था- में, अथवा अद्वैत-स्थितिसे द्वैतस्थितिमे चलकर जाते हैं। उनकी सत्ता तथा स्वरूपपर कालका कोई भी प्रभाव नहीं है और इसीलिये विश्वके प्रकट होनेसे पूर्वकी या पीछेकी अवस्था में जो भेद दिखायी देता है, वह उनकी सत्ता और स्वरूपका स्पर्श भी नहीं कर पाता। अवस्था भेदकी कल्पना तो जड जगत्में है। स्थिति और गति, अव्यक्त और व्यक्त, निवृत्ति और प्रवृत्ति, विरति और भोग, साधन और सिद्धि, कामना और परिणाम, भूत और भविष्य, दूर और समीप एव एक और बहुत—ये सभी भेद वस्तुतः जड-जगत्के सकीर्ण धरातलमें ही हैं। विशुद्ध पूर्ण सच्चिदानन्द-सत्ता तो सर्वथा भेदशून्य है। वह विशुद्ध अभेद भूमि है। वहाँ स्थिति और गति, अव्यक्त और व्यक्त, निष्क्रियता और सक्रियतामें अभेद है। इसी प्रकार एक और बहुत, साधना और सिद्धि, कामना और भोग, भूत भविष्य वर्तमान तथा दूर और निकट भी अभेदरूप ही हैं। इस अभेदभूमिमें चैतन्यघन पूर्ण परमात्मा परस्परविरोधी धर्मोंको आलिङ्गन किये नित्य विराजित हैं। वे चलते हैं और नहीं चलते, वे दूर भी है, समीप भी हैं, वे सबके भीतर भी हैं और सबके बाहर भी है— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत ॥ (ईशावास्योपनिषद् ५) वे अपने विश्वातीत रूपमे स्थित रहते हुए ही अपनी वैचित्र्यप्रसविनी कर्मशीला अचिन्त्य शक्तिके द्वारा विश्वका सृजन करके अनादि अनन्तकाल उसीके द्वारा अपने विश्वातीत स्वरूपकी उपलब्धि और उसका सम्भोग करते रहते हैं। उपनिषद्में जो यह आया है कि वह ब्रह्म पहले अकेला था, वह रमण नहीं करता था। इसी कारण आज भी एकाकी पुरुष रमण नहीं करता। उसने दूसरेकी इच्छा की उसने अपनेको ही एकसे दो कर दिया वे पति पत्नी हो गये । 'स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छद् ••••• स इममेवात्मान द्वेधापातयत्त. पतिश्च पत्नी चाभवताम् । • ' (बृहदारण्यक० १।४।३) इसका यह अभिप्राय नहीं है कि इससे पूर्व वे अकेले थे और अकेलेपनमे रमणका अभाव प्रतीत होनेके कारण वे मिथुन (युगल) हो गये। क्योकि कालपरम्पराके क्रमसे अवस्थाभेदको प्राप्त हो जाना ब्रह्मके लिये सम्भव नहीं है। वे नित्य मिथुन (युगल) हे और इस नित्य युगलत्वमे ही उनका पूर्ण एकत्व है। उनका अपने स्वरूपमे ही नित्य अपने ही साथ नित्य रमण—अपनी अनन्त सत्ता, अनन्त ज्ञान, अनन्त ऐश्वर्य और अनन्त माधुर्यका अनवरत आस्वादन चल रहा है। उनके इस स्वरूपगत आत्ममैथुन, आत्मरमण और आत्मस्वादनसे ही अनादि-अनन्तकाल अनादि-अनन्त देशोंमें अनन्त विचित्रतामण्डित, अनन्त रससमन्वित विश्वके सृजन, पालन और महारका लीला प्रवाह चल रहा है। इस युगल रूपमें ही ब्रह्मके अद्वैतस्वरूपका परमोत्कृष्ट परिचय प्राप्त होता है। अतएव श्रीउमा-महेश्वर, श्रीलक्ष्मी नारायण, श्रीसीता-राम, श्रीराधा-कृष्ण, श्रीकाली-रुद्र आदि सभी युगल स्वरूप नित्य सत्य और प्रकारान्तरसे उपनिषत्-प्रतिपादित है। उपनिषदने एक ही साथ सर्वातीत और सर्वकारणरूपमे, स्थितिशील और गतिशीलरूपमें, निष्क्रिय और सक्रियकूपमे, अव्यक्त और व्यक्तरूपमें एव सच्चिदानन्दघन पुरुष और विश्वजननी नारी- रूपमें इसी युगल स्वरूपका विवरण किया है। परतु यह विषय है बहुत ही गहन। यह वस्तुत. अनुभवगम्य रहस्य है। प्रगाढ अनुभूति जब तार्किक्री बुद्धिकी द्वन्द्वमयी सीमाका सर्वथा अतिक्रमण कर जाती है—तभी सक्रियत्व और निष्क्रियत्व, साकारत्व और निराकारत्व, परिणामत्व और अपरिणामत्व एवं बहुरूपत्व और एकरूपत्वके एक ही समय एक ही साथ सर्वाङ्गीण मिलनका रहस्य खुलता है—तभी इसका यथार्थ अनुभव प्राप्त होता है। यद्यपि विशुद्ध तत्त्वमय चैतन्य राज्यमें प्राकृत पुरुष और नारीके सदृश देहेन्द्रियादिगत भेद एव तदनुकूल किसी लौकिक या जडीय सम्बन्धकी सम्भावना नही है, तथापि— जब अप्राकृत तत्त्वकी प्राकृत मन बुद्धि एव इन्द्रियों के द्वारा