भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 143
  • उपनिषद्में युगल स्वरूप * १२९ वह नहीं है' (नेति-नेति) कहकर और उनसे विरागी होकर यह अनुभव किया कि—'वह परमतत्त्व ऐसा है जो न कभी देखा जा सकता है, न ग्रहण किया जा सकता है, न उसका कोई गोत्र है, न उसका कोई वर्ण है, न उसके चक्षु-कर्ण और हाथ-पैर आदि हैं।' 'वह न भीतर प्रज्ञावाला है, न बाहर प्रज्ञावाला है, न दोनों प्रकारकी प्रज्ञावाला है, न प्रज्ञान- घन है, न प्रज्ञ है, न अप्रज्ञ है, वह न देखनेमें आता है, न उससे कोई व्यवहार किया जा सकता है, न वह पकड़में आता है, न उसका कोई लक्षण (चिह्न) है, जिसके सम्बन्ध- में न चित्तसे कुछ सोचा जा सकता है और न वाणीमे कुछ कहा ही जा सकता है। जो आत्मप्रत्ययका सार है, प्रपञ्चसे रहित है, शान्त, शिव और अद्वैत है'— यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणि- पादम् । ( मुण्डक० १ । १ । ६ ) नान्त प्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघन न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य- मव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशम शान्तं शिव- मद्वैतम् । •••• ( माण्डूक्य० ७ ) किसी भी दृश्य, ग्राह्य, कथन करनेयोग्य, चिन्तन करने- योग्य और धारणामें लानेयोग्य पदार्थके साथ उसका कोई भी सम्बन्ध या सादृश्य नहीं है। इसीके साथ, वहीं, उसी क्षण उन्होंने उसी देश-कालातीत, अवस्था-परिणाम-शून्य, इन्द्रिय- मन-बुद्धिके अगोचर शान्त शिव अनन्त एकमात्र सत्तारूप अक्षर परमात्माको ही सर्वकालमें और समस्त देशोंमें नित्य विराजित देखा और कहा कि—'धीर साधक पुरुष उस नित्य पूर्ण, सर्वव्यापक, अत्यन्त सूक्ष्म, अविनाशी और समस्त भूतों- के कारण परमात्माको देखते हैं'— नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ( मुण्डक० १ । १ । ६ ) उन्होंने यह भी अनुभव किया कि 'जब वह द्रष्टा उस सबके ईश्वर, ब्रह्माके भी आदिकारण सम्पूर्ण विश्वके स्रष्टा, दिव्य प्रकाशस्वरूप परम पुरुषको देख लेता है, तब वह निर्मल हृदय महात्मा पा०पुण्यसे छूटकर परम साम्यको प्राप्त हो जाता है— यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । उ० सं० १७-१८- तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ( मुण्डक० ३ । १ । ३ ) यहाँतक कि उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमदेव परमात्माकी उस दिव्य अचिन्त्य स्वरूपभूत शक्तिका भी प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया जो अपने ही गुणोंसे छिपी हुई है। तब उन्होंने यह निर्णय किया कि कालसे लेकर आत्मातक (काल, स्वभाव, नियति, अकस्मात्, पञ्चमहाभूत, योनि और जीवात्मा ) सम्पूर्ण कारणोंका स्वामी प्रेरक सबका परम कारण एकमात्र परमात्मा ही है— ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । य कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येक ॥ ( श्वेताश्वतर० १ । ३ ) ऋषियोंने यह अनुभव किया कि वह सर्वातीत परमात्मा ही सर्वकारण-कारण, सर्वगत, सबमें अनुस्यूत और सबका अन्तर्यामी है। वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म, भेदरहित, परिणामशून्य, अद्वय परमतत्त्व ही चराचर भूतमात्रकी योनि है, एवं अनन्त विचित्र पदार्थोंका वही एकमात्र अभिन्न निमित्तोपादान-कारण है। उन्होंने अपनी निर्भ्रान्त निर्मल दृष्टिसे यह देखा कि जो विश्वातीत तत्त्व है, वही विश्वकृत् है, वही विश्ववित् है और वही विश्व है। विश्वमें उसीकी अनन्त सत्ताका, अनन्त ऐश्वर्य, अनन्त ज्ञान और अनन्त शक्तिका प्रकाश है। विश्व-सृजनकी लीला करके विश्वके समस्त वैचित्र्यको, विश्वमें विकसित अखिल ऐश्वर्य, ज्ञान और शक्तिको आलिङ्गन किये हुए ही वह नित्य विश्वके ऊर्ध्वमें विराजित है। उपनिषद्के मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंने अपनी सर्वकालव्यापिनी दिव्य दृष्टिसे देखकर कहा—'सोम्य ! इस नामरूपात्मक विश्वकी सृष्टिसे पूर्व एक अद्वितीय सत् ही था'— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।' ( छान्दोग्य० ६ । १ । १ ) परन्तु इसीके साथ तुरत ही मुक्तकण्ठसे यह भी कह दिया कि 'उस सत् परमात्माने ईक्षण किया—इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ'— 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति' (छान्दोग्य० ६ । २ । ३ ) यहाँ बहुतोंको यह बात समझमें नहीं आती कि जो 'सबसे अतीत' है, वही 'सर्वरूप' कैसे हो सकता है, परन्तु