कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
कामान्ध होकर विवेक खो बैठते और मर्यादाका त्याग करके पशुवत् आचरण करने लगते हैं। इससे जो सन्तान उत्पन्न होती हैं, उनमें भी वैसे ही दुर्गुण भर जाते हैं। अतः वैदिक रीतिसे गर्भाधान आदि सभी संस्कारोंको करना चाहिये, इसीसे श्रेष्ठ मानवकी, जो अपने बल, पौरुष, ज्ञान और विज्ञानसे स्वयं अपने जीवनको सफल करता है और समाजकी बड़ी भारी सेवा करता है, उत्पत्ति हो सकती है। वेदोंमें जो कुछ कहा गया है, वह सब जगत्के कल्याणके लिये ही है। वेदोंके तात्पर्यपर विचार करनेवाले विद्वानोंको उचित है कि वे मनमाना अर्थ न करके वेद-वेदाङ्गोंके अनुशीलनपूर्वक महर्षियोंद्वारा निर्धारित शैलीके अनुसार वेदरूपी कामधेनुसे कल्याणमय अर्थका ही दोहन करें। वेदके कितने ही मन्त्र काव्यमय हैं। वहाँ रसोद्रेकके लिये सरस रूपकोंका आश्रय लिया गया है। ऐसे स्थलोंपर अश्लीलताका आरोप न करके यथार्थ मर्मको समझनेका प्रयास करना चाहिये।
उपनिषद्में युगल स्वरूप
भारतके आर्य-सनातनधर्ममे जितने भी उपासक-सम्प्रदाय हैं, सभी विभिन्न नाम-रूपों तथा विभिन्न उपासना पद्धतियोंके द्वारा वस्तुतः एक ही शक्तिसमन्वित भगवान्की उपासना करते हैं। अवश्य ही कोई तो शक्तिको स्वीकार करते हैं और कोई नहीं करते। भगवान्के इस शक्तिसमन्वित रूप- को ही युगल-स्वरूप कहा जाता है। निराकारवादी उपासक भगवान्को सर्वशक्तिमान् बताते हैं और साकारवादी भक्त उमा महेश्वर, लक्ष्मी नारायण, सीता-राम, राधा-कृष्ण आदि मङ्गलमय स्वरूपोंमे उनका भजन करते हैं। महाकाली, महा- लक्ष्मी, महासरस्वती, दुर्गा, तारा, उमा, अन्नपूर्णा, सीता, राधा आदि स्वरूप एक ही भगवत्स्वरूपा शक्तिके हैं, जो लीलावैचित्र्यकी सिद्धिके लिये विभिन्न रूपोंमें अपने-अपने धामविशेषमे नित्य विराजित हैं। यह शक्ति नित्य शक्तिमान्- के साथ है और शक्ति है इसीसे वह शक्तिमान् है। और इसलिये वह नित्य युगलस्वरूप है। पर यह युगलस्वरूप वैसा नहीं है, जैसे दो परस्पर-निरपेक्ष सम्पूर्ण स्वतन्त्र व्यक्ति या पदार्थ किसी एक स्थानपर स्थित हों। ये वस्तुतः एक होकर ही पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं। इनमेंसे एकका त्याग कर देनेपर दूसरेके अस्तित्वका परिचय नहीं मिलता। वस्तु और उसकी शक्ति, तत्त्व और उसका प्रकाश, विशेष्य और उसके विशेषणसमूह, पद और उसका अर्थ, सूर्य और उसका तेज, अग्नि और उसका दाहकत्व—इनमे जैसे नित्य युगलभाव विद्यमान है, वैसे ही ब्रह्ममें भी युगलभाव है। जो नित्य दो होकर भी नित्य एक हैं और नित्य एक होकर भी नित्य दो हैं, जो नित्य भिन्न होकर भी नित्य अभिन्न हैं और नित्य अभिन्न होकर भी नित्य भिन्न हैं। जो एकम ही सदा दो हैं और दोमे ही सदा एक हैं। जो स्वरूपतः एक होकर भी द्वैधभावके पारस्परिक सम्बन्धके द्वारा ही अपना परिचय देते और अपनेको प्रकट करते हैं। यह एक ऐसा रहस्यमय परम विलक्षण तत्त्व है कि दो अयुत- सिद्ध रूपोंमे ही जिसके स्वरूपका प्रकाश होता है, जिसका परिचय प्राप्त होता है और जिसकी उपलब्धि होती है। वेदमूलक उपनिषद्मे ही इस युगलस्वरूपका प्रथम और स्पष्ट परिचय प्राप्त होता है। उपनिषद् जिस परम तत्त्वका वर्णन करते हैं, उसके मुख्यतया दो स्वरूप हैं—एक 'सर्वातीतः और दूसरा 'सर्वकारणात्मक' । सर्वकारणात्मक स्वरूपके द्वारा ही सर्वातीतका सन्धान प्राप्त होता है और सर्वातीत स्वरूप ही सर्वकारणात्मक स्वरूपका आश्रय है। सर्वातीत स्वरूपको छोड़ दिया जाय तो जगत्की कार्य-कारण- शृङ्खला ही टूट जाय, उसमें अप्रतिष्ठा और अनवस्थाका दोष आ जाय। फिर जगत्के किसी मूलका ही पता न लगे। और सर्वकारणात्मक स्वरूपको न माना जाय तो सर्वातीतकी सत्ता कहीं नहीं मिले। वस्तुतः ब्रह्मकी अद्वैतपूर्ण सत्ता इन दोनों स्वरूपोंको लेकर ही है। उपनिषद्के दिव्य-दृष्टिसम्पन्न ऋषियोंने जहाँ विश्वके चरम और परमतत्त्व एक, अद्वितीय, देशकाल अवस्था परिणामसे सर्वथा अनवच्छिन्न सच्चिदानन्द- स्वरूपको देखा, वहीं उन्होंने उस अद्वैत परब्रह्मको ही उसकी अपनी ही विचित्र अचिन्त्य शक्तिके द्वारा अपनेको अनन्त विचित्र रूपोंमे प्रकट भी देखा और यह भी देखा कि वही समस्त देशो, समस्त कालों, समस्त अवस्थाओं और समस्त परिणामोंके अदर छिपा हुआ अपने स्वतन्त्र सच्चिदानन्दमय स्वरूपकी, अपनी नित्य सत्ता, चेतना और आनन्दकी मनोहर झाँकी करा रहा है। ऋषियोंने जहाँ देशकाल-अवस्था- परिणामसे परिच्छिन्न अपूर्ण पदार्थोंको 'यह वह नहीं है, यह