भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 141
  • वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है *- १२७ [बायाँ स्तम्भ] चाहिये कि वेदों और उपनिषदोंमें यज्ञ अथवा भोजनके प्रसग- मे जहाँ कही भी 'पशु'वाचक शब्द आये हैं, उन सबका अर्थ अन्न अथवा औषध है। उदाहरणके लिये बृहदारण्यक उपनिषद्‌के (६।४।१८ वें) मन्त्रपर दृष्टिपात कीजिये। वहाँ सुयोग्य और विद्वान् पुत्र उत्पन्न करनेके लिये दम्पतिको औक्ष अथवा आर्षभके साथ पकायी हुई खिचड़ी खानेका आदेश किया गया है। प्रायः मूँग या उड़दकी दाल मिलाकर ही खिचड़ी बनती है। मूँगकी खिचड़ीको 'मुद्गौदन' और उड़दमिश्रित खिचड़ीको 'माषौदन' कहते हैं। इस 'माषौदन' को सम्भवतः किन्हीं मास- प्रेमियोंने 'मांसौदन' कर दिया है। यदि किसीका यही आग्रह हो कि वहाँ 'मांसौदन' ही पाठ है, तो भी उसका अर्थ वहाँ औषध या अन्न ही है। यह बात पहलेके विवेचनके अनुसार माननी ही होगी। औक्ष या आर्षभ- मिश्रित ओदनके लिये 'माषौदन' या 'मांसौदन' नाम आया है, यही मानना प्रकरणसङ्गत है। अब औक्ष या आर्षभका तात्पर्य क्या है, यह जान लेना आवश्यक है। 'उक्षा' और 'ऋषभ' नामक औषध ही यहाँ 'औक्ष' और 'आर्षभ' नामसे प्रतिपादित हुआ है, उक्षा ऋषभका पर्याय है और सोमको भी उक्ष कहते हैं। 'ऋषभ' एक प्रकारका कन्द है, इसकी जड़ लहसुनसे मिलती-जुलती है। सुश्रुत और भावप्रकाश आदिमें इसके नाम, रूप, गुण और पर्यायोंका विशेष विवरण दिया गया है। इस अङ्कके बृहदारण्यकमे, जहाँ वह प्रसङ्ग है, कुछ प्रमाण भी उद्धृत कर दिये गये हैं। ऋषभके- वृषभ, वीर, विषाणी, गोपति, वृष, शृङ्गी, ककुद्मान् आदि जितने भी नाम आये हैं, सब वृषभ या बैलका अर्थ रखते हैं। इसी भ्रमसे कुछ लोगोंने वहाँ 'वृषभ मास' की वीभत्स कल्पना की है, जो 'प्रस्थं कुमारिकामासम्' के अनुसार 'एक सेर कुमारीकन्याके मास' की कल्पनासे ही मेल खाती है। वैद्यक-ग्रन्थोंमें बहुतसे पशु-पक्षियोंके-से नामवाले औषध देखे जाते हैं। उदाहरणके लिये वृषभ (ऋषभकन्द), श्वान (ग्रन्थिपर्ण या कुत्ता-घास), मार्जार (चित्ता), अश्व (अश्वगन्धा), अज (अजमोदा), सर्प (सर्पगन्धा), मयूरक (अपामार्ग), मयूरी (अजमोदा), कुक्कुटी
  • ऋषभो गोपतिर्वीरो विषाणी धूर्धरो वृष । ककुद्मान् पुङ्गवो वोढा शृङ्गी धुर्यश्च भूपति ॥ (राजनिघण्ड) [दायाँ स्तम्भ] (शाल्मली), मेष (जीवशाक), नकुल (नाकुली बूटी), गौ (गौलोमी), खर (खरपर्णिनी), काक (काकमाची), वाराह (वाराहीकन्द), महिष (गुग्गुल) आदि शब्द द्रष्टव्य हैं। यह भी सबको जानना चाहिये कि फलोंके गूदेको 'मांस', छालको 'चर्म', गुठलीको 'अस्थि', मेदाको 'मेद' और रेशाको 'स्नायु' कहते हैं।* वेदों और उपनिषदोंपर अश्लीलताका भी आरोप लगाया जाता है; परंतु पशुवध और माससम्बन्धी आरोपोंकी भाँति यह आरोप भी निराधार है। पहले अश्लीलता क्या है, यह समझ लेनेकी आवश्यकता है। एक आदमी जब सभ्य-समाजमे कहीं अपने गुप्ताङ्गो या इन्द्रियोंको दिखाता या निर्लज्जतावश कुत्सित चर्चाएँ करता है तो यह सब अश्लील समझा जाता है। परंतु एक रोगी मनुष्य जब डाक्टरके सामने नगा खड़ा होता है, तो उसकी यह क्रिया अश्लील नहीं समझी जाती। वैद्यक या डाक्टरीके ग्रन्थोंमे, जहाँ प्रत्येक अवयवका—गुप्त अङ्गका भी स्पष्ट वर्णन होता है, वह अश्लील नहीं माना जाता। एक व्याख्याता समाज-सुधारके लिये बुराइयोंका नग्न चित्र उपस्थित करता है, उस समय उसकी वह बात अश्लील नहीं समझी जाती। क्रिया एक ही है, पर कहीं वह दोषरूप है और कही गुणरूप। अतः यही निष्कर्ष निकलता है कि स्वरूपतः अश्लील कार्य भी भाव और दृष्टिकोणकी शुद्धिसे शुद्ध बन जाता है और स्वरूपसे अच्छा कार्य भी भावदोषसे दूषित हो जाता है। शल्यचिकित्सादिके लिये विद्यार्थीको स्त्री तथा पुरुषके प्रत्येक अवयवका ही नहीं, उसके सूक्ष्म-से- सूक्ष्म विभागका भी वर्णन पढना पड़ता है, पर वह कभी अश्लील नहीं माना जाता। इसी प्रकार वेद इस विषयकी पूर्ण शिक्षाके लिये ही ऐसी बातें प्रस्तुत करते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद्‌में छठे अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणमे स्त्रियोंके गुप्ताङ्गोंकी और मैथुन-कर्मकी चर्चा आयी है, परंतु वह गर्भाधानका प्रकरण है। मनुष्यकी उत्पत्तिका प्रारम्भिक कृत्य वही है। यदि वही ठीक तरहसे न हो तो अच्छी सन्तान कैसे हो सकती है? प्रकरणके अनुसार वहाँ लिखी हुईं सभी बातोंका महत्त्व बहुत बढ जाता है। मनुष्य
  • सुश्रुतमें आमके प्रसङ्गमें आया है— अपक्वे चूतफले स्नाय्वस्थिमज्जान सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते पक्वे त्वाविर्भूता उपलभ्यन्ते ॥ 'आमके कच्चे फलमें सूक्ष्म होनेके कारण स्नायु, हड्डी और मज्जा नहीं दिखायी देतीं, परंतु पकनेपर ये सब प्रकट हो जाती हैं।'