भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

१२६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

ही भाँति अश्वके लिये भी कहीं 'भक्षण' शब्द नहीं आया है।' (तात्पर्य यह कि मनुष्यके भोजनमें केवल अन्नका ही उपयोग होता है, गौ और अश्व आदिका नहीं।) आश्वलायन- सूत्रमें स्पष्ट कहा गया है कि हवन-सामग्री मांससे वर्जित होती है—'होमिर्यं च मांसवर्जम्।' कात्यायनका भी यही मत है— 'आहवनीये मांसप्रतिषेध ।'

उपर्युक्त प्रमाणोंसे सिद्ध है कि यज्ञमें मांसका उपयोग कभी शिष्टपुरुषोंद्वारा स्वीकृत नहीं हुआ। कुछ लोग बलि, आलम्भ, मधुपर्क और गोघ्न आदि शब्दोंसे पशु-हिंसाका अर्थ निकालते हैं, परंतु प्राचीन साहित्य या मध्यकालीन साहित्यमें भी इन शब्दोंका कभी हिंसापरक अर्थ नहीं स्वीकृत किया गया है। बलिवैश्वदेवमें जो बलि दी जाती है, वहाँ किसीकी हिंसा नहीं की जाती, अपितु सम्पूर्ण विश्वके प्राणियों- को तृप्त करनेकी भावनासे उन्हें अन्न और जल अर्पण किया जाता है। बलिक्रा अर्थ किरण और कर (टैक्स या लगान) भी होता है। जीव-हिंसाके अर्थमें 'बलि' शब्दका प्रयोग तो पीछे हुआ है और वह भी मांसभक्षी लोगोंके अपने व्यवहार- से। बलिक्रा अर्थ त्याग ही शिष्टसम्मत है। इसी प्रकार 'आलमन' शब्द भी स्पर्श और प्राप्ति-अर्थमें आता है। मीमांसासूत्र (२।३।१७) की सुबोधिनी टीकामें लिखा है 'आलम्भः स्पर्शो भवति' अर्थात् स्पर्शका नाम आलम्भ है। यज्ञोपवीत और विवाह-संस्कारमें 'हृदयमालभते' का प्रयोग आता है। वहाँ गुरु शिष्यके और वर वधुके हृदयका स्पर्शमात्र ही करता है—छातीमें छुरा नहीं भोंकता। 'स्पर्श' शब्द दानके अर्थमें भी आता है। महाकवि कालिदासने 'गा कोटिशः स्पर्शयता घटोनीः' इस पद्यमे 'स्पर्शयता'का प्रयोग 'ददता'के अर्थमें ही किया है। महाभारत अनुशासनपर्वमें स्पर्श-यज्ञकी चर्चा देखी जाती है। पहले जब अदर्शन होता था तो लोग पशु- स्पर्श यज्ञ करते थे*। यही 'पशुका आलम्भन' या 'स्पर्श' कहलाता था। आजकल भी लोग अन्न और पशु आदि छूकर ब्राह्मणोंको देते हैं। यह उसी आलम्भन या स्पर्शयज्ञ का एक रूप है। पशुक्रा ही आलम्भन (छूकर छोड़ देना या दान देना) अधिक प्रचलित था, अतः जहाँ अन्नका स्पर्श, दान या हवन होता है, उस यज्ञमे अन्न ही पशु है,


  • यदि द्वादशवर्षाणि न वर्षिष्यति वासव । स्पर्शयज्ञं करिष्यामि विधिरेष सनातन ॥

यह रूपक दिया गया है। इसीलिये महाभारत अनुशासनपर्व- में कहा गया है— 'श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणा व्रीहिमयाः पशुः।'

इसी प्रकार मधुपर्क भी सर्वथा हिंसारहित और निर्दोष है। तीन भाग दही, एक भाग शहद और एक भाग घीको काँसेके पात्रमें रखनेपर उसकी 'मधुपर्क' सज्ञा होती है। 'मधुपर्क' नाम ही मधुर पदार्थोंका सम्पर्क सूचित करता है। अब रही 'गोघ्नोऽतिथिः' की बात। इसका अर्थ लोग भ्रमवश ऐसा मानने लगे हैं कि अतिथिके लिये गाय मारी जाती थी, परंतु बात ऐसी नहीं है। हन् धातुका प्रयोग हिंसा और गति अर्थमें होता है। गतिके भी ज्ञान, गमन और प्राप्ति आदि अनेक अर्थ हैं। इनमेंसे प्राप्ति अर्थको लेकर ही यहाँ 'गोघ्न'का प्रयोग होता है। वह अतिथि जिसे गौकी प्राप्ति हो—जिसे गाय दी जाय वह 'गोघ्न' कहलाता है। व्याकरणके आदि आचार्य महर्षि पाणिनिने अपने एक सूत्रद्वारा इसी अभिप्रायकी पुष्टि की है। वह सूत्र है—'दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने' (३।४।७३) इसके द्वारा सम्प्रदान अर्थमें 'दाश' और 'गोघ्न' शब्द सिद्ध होते हैं। यदि यहाँ चतुर्थीमात्र ही अभीष्ट होता—अर्थात् अतिथिके उद्देश्यसे गायको मारना ही सूचित करना होता तो 'सम्प्रदाने' न कहकर 'तस्मै' इस विभक्तिप्रतिरूपक अव्ययका ही प्रयोग कर देते, परंतु ऐसा न करके 'सम्प्रदाने' लिखा है, इससे यहाँ दानार्थकी अभिव्यक्ति सूचित होती है। अतः जिसे गाय दी जाय, उस अतिथिको ही 'गोघ्न' कह सकते हैं। पूर्वकालमें अतिथिको गौ देनेकी साधारण परिपाटी थी। आज भी प्राचीन प्रथाके अनुसार विवाहमे घरपर पधारे हुए वरको आतिथ्यके लिये गोदान किया जाता है। आयुर्वेद- में जो मासप्रधान ओषधियाँ हैं, उन्हें भी द्विजोंने कभी नहीं स्वीकृत किया था; अतएव चरकने लिखा है—द्विजोंकी पुष्टिके लिये तो मिश्रीयुक्त घी और दूध ही औषध है*। मास तो 'यक्षरक्ष पिशाचान्नम्'—(यक्ष, राक्षस और पिशाचों- का भोजन है)। यज्ञके नामपर की जानेवाली हिंसाको लक्ष्य करके विष्णुशर्माने पञ्चतन्त्रमे लिखा है कि 'यदि यही स्वर्ग- का मार्ग है तो नरकमें कौन जायगा ?† अतः यही मानना


  • द्विजानामोषधीसिद्ध घृत मासविद्धये । सितायुक्त प्रदातव्य गव्येन पयसा भृशम् ॥ (चरक चि० ८ । १४९) † वृक्षांश्छित्त्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् । यद्येव गम्यते स्वर्ग नरके केन गम्यते ॥