भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

वेदों और उपनिषदोंमें मांस-भक्षण और अश्लीलता नहीं है * १२५


पशु क्या है ? इसका उत्तर शतपथ-ब्राह्मणके एक प्रश्नोत्तरसे स्पष्ट हो जाता है—'कतमः प्रजापति. ?' प्रजापति अर्थात् प्रजाका पालन करनेवाला कौन है ? उत्तर मिलता है—'पशुरिति'—पशु ही प्रजापालक है । तात्पर्य यह कि जो पदार्थ या शक्तियाँ प्रजाका पोषण करनेवाली हैं; उन्हें पशु कहा गया है । इसीलिये भिन्न-भिन्न प्रकारके पशुओंकी यज्ञमें चर्चा की गयी है । 'नृणां व्रीहिमयं पशुः'—मनुष्योंके यज्ञमें अन्नमय पशुका उपयोग होता आया है। 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः' देवताओंने यज्ञसे ही यज्ञ किया था, उनका यज्ञमय पशु था। निरुक्तमें इस मन्त्रका अर्थ करते हुए यास्काचार्य-ने लिखा है—'अग्निः पशुरासीत्तं देवा अलभन्त' 'अग्नि ही पशु था, उसीको देवता प्राप्त हुए।' इतना ही नहीं, अग्नि, वायु और सूर्यको भी 'पशु' नाम दिया गया है—

अग्नि. पशुरासीत्तेनायजन्त । वायु. पशुरासीत्तेनाय-जन्त । सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त ।

'अबध्नन् पुरुषं पशुम्' इस मन्त्रमे पुरुषको ही पशु कहा गया है। वहाँ सात परिधि और इक्कीस समिधाओंकी भी चर्चा है—

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रि.सप्त समिध. कृता. ।

इसके दो अर्थ किये जाते हैं—शरीरगत सात धातु ही सात परिधि हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, दस प्राण और एक मन—ये ही इक्कीस समिधाएँ हैं, इनको लेकर 'आत्मा' रूपी पुरुषसे देवताओंने 'शरीर-यज्ञ' किया । इन सबके सहयोगसे ही मानव-शरीरकी सम्यक् सृष्टि हुई ।

दूसरा अर्थ सङ्गीत-यज्ञपरक होता है। उसमें सात स्वर ही सात परिधि और इक्कीस मूर्छनाएँ ही समिधाएँ हैं । नाद ही वहाँ पशु है । इनसे 'सङ्गीत-यज्ञ' सम्पन्न होता है ।

इसी प्रकार यदि विवेकको साथ रखते हुए वेदार्थपर विचार किया जायगा तो वेद भगवान् ही ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर देंगे, जिससे सत्य अर्थका भान हो जाय। जहाँ द्वयर्थक शब्दोंके कारण भ्रम होनेकी सम्भावना हो सकती है, वहाँ बहुतेरे स्थलोंपर स्वयं वेदने ही अर्थका स्पष्टीकरण कर दिया है—

'धाता धेनुरभवद्, वत्सोऽस्यास्तिल ।' (अथर्ववेद १८ । ४ । ३०)

अर्थात् धान ही धेनु है और तिल ही उसका बछड़ा हुआ है। अथर्ववेदके ११ । ३ । ५ तथा ११ । ३ । ७ मन्त्र-में कहा है—चावलके कण ही अश्व हैं । चावल ही गौ हैं । भूसी ही मशक है । चावलोंका जो श्यामभाग है, वह मास है और लालभाग ही रुधिर है*। यहाँ दिग्दर्शनमात्र कराया गया है ।

इन सब प्रमाणोंसे सिद्ध है कि हवन-प्रकरणमें जहाँ कहीं भी अश्व, गौ, अजा, मास, अस्थि और मज्जा आदि शब्द आते हैं, उनसे अन्नका ही ग्रहण होता है, पशुओं और उनके अवयवोंका नहीं । 'शतपथ ब्राह्मण' आदिमें भी ऐसे स्थलोंका स्पष्टीकरण किया गया है—केवल पीसा हुआ सूखा आटा 'लोम' है । पानी मिलानेपर वह 'चर्म' कहलाता है । गूँधनेपर उसकी 'मास' सज्ञा होती है। तपानेपर उसीको 'अस्थि' कहते हैं । घी डालनेपर उसीका 'मज्जा' नाम होता है। इस प्रकार पककर जो पदार्थ बनता है, उसका नाम 'पाक्तपशु' होता है।†

अथर्ववेदके अनुसार व्रीहि और यव क्रमशः प्राण और अपान हैं‡। 'अनड्वान्' भी प्राणका नाम है। अतः अनड्वान् शब्दसे भी जौको ग्रहण किया जा सकता है। मीमांसासूत्रमें तो पशु-हिंसा और मास पाकका स्पष्टतः निषेध मिलता है—

मांसपाकप्रतिषेधश्च तद्वत् । ( १२ । २ । २ )

'यज्ञमें जैसे पशुहिंसाका निषेध है, उसी प्रकार मास-पाकका भी निषेध है।' 'धेनुवच्च अश्वदक्षिणा' (मीमांसा० १० । ३ । ६५) 'गौकी भाँति घोड़ा भी यज्ञमें दक्षिणाके लिये ही उपयोगमें लाया जाता है।'

अपि वा दानमात्र स्याद् भक्षशब्दानभिसम्बन्धनात् । ( मीमांसा० १० । ७ । १५ )

'अथवा वह केवल दानमात्रके लिये ही है, क्योंकि गौकी


पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):

* अश्वा कणा गावस्तण्डुला मशकास्तुषा ।    श्याममयोऽस्य मांसानि लोहितमस्य लोहितम् ॥

† 'यदा पिष्टान्यथ लोमानि भवन्ति । यदाप आनयत्यथ त्वग् भवति । यदा स यौत्यथ मास भवति । सतत इव हि तर्हि भवति सततभिव हि मासम् । यदा शृतोऽथास्थि भवति । दारुण इव त.र्हि भवति । दारुणमित्यस्थि । अथ यदुद्वासयन्नभिघारयति तं मज्जान ददाति । एषा सा सम्पद् यदाहु' पाक पशुरिति ।' ऐतरेय ब्राह्मणमें भी इसी तरहका स्पष्टीकरण देखा जाता है—'स वा एष पशुरेवालभ्यते यत्पुरोडाशस्तस्य । यानि किंशारूपाणि तानि रोमाणि। ये तुषा सा त्वक् । ये फलीकरणास्तद् असृग् यत्पिष्ट तन्मासम् । एष पशूनां मेधेन यजते ।' इस मन्त्रमें पुरोडाशके अन्तर्गत जो अन्नके दाने हैं, उन्हे अन्नमय पशुका रोम, भूसीको त्वचा, टुकड़ोंको मींग और आटेको मास नाम दिया गया है।

‡ प्राणापानौ व्रीहियवौ अनड्वान् प्राण उच्यते ।    ( अथर्ववेद ११ । ४ । १३ )