कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * —-------------------------------------------------------------------------------------------------------
वैदिक यज्ञोंमें तो मासका इतना विरोध है कि मास जलानेवाली आगको सर्वथा त्याज्य निश्चित कर दिया गया है। प्रायः चिताग्नि ही मास जलानेवाली होती है। जहाँ अपनी मृत्युसे मरे हुए मनुष्योंके अन्त्येष्टि-संस्कारमे उपयोग की हुई आगका भी बहिष्कार है, वहाँ पावन वेदीपर प्रतिष्ठापित विशुद्ध अग्निमें अपने मारे हुए पशुके होमका विधान कैसे हो सकता है? आज भी जब वेदीपर अग्निकी स्थापना होती है, तो उसमेंसे थोड़ी-सी आग निकालकर बाहर कर दी जाती है। इसलिये कि कहीं उसमें क्रव्याद (मास-भक्षी या मास जलानेवाली आग) के परमाणु न मिल गये हों। अतएव 'क्रव्यादामं त्यक्त्वा' (क्रव्यादका अंश निकालकर ही) होमकी विधि है। ऋग्वेदका वचन है— क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन् ॥ (ऋ० ७ । ६ । २१ । ९)
'मैं मास खाने या जलानेवाली आगको दूर हटाता हूँ, यह पापका भार ढोनेवाली है, अतः यमराजके घरमें जाय। इससे भिन्न जो ये दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव हैं, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ। ये इस हविष्यको देवताओंके समीप पहुँचायें, क्योंकि ये सब देवताओंको जाननेवाले हैं।'
यजुर्वेदके अनेक मन्त्रोंमें भगवान्से प्रार्थना की गयी है कि वे हमारे पुत्रों, पशुओं—गाय और घोड़ोको हिंसाजनित मृत्युसे बचावें— 'मा नस्तनये मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः।'
कुछ मन्त्रोंके वाक्यांश इस प्रकार हैं— पशून् पाहि, गां मा हिंसी., अजा मा हिंसी, अविं मा हिंसी.। इमं मा हिंसीर्द्विपादं पशुम्, मा हिंसीरेकशफं पशुम्, मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ।
'पशुओंकी रक्षा करो।' 'गायको न मारो।' बकरी- को न मारो।' 'भेड़को न मारो।' 'इन दो पैरवाले प्राणियो- को न मारो।' 'एक खुरवाले घोड़े गधे आदि पशुओंको न मारो।' 'किसी भी प्राणीकी हिंसा न करो।'
ऋग्वेदमें तो यहाँतक कहा गया है कि जो राक्षस मनुष्य, घोड़े और गायका मास खाता हो तथा गायके दूध- को चुरा लेता हो, उसका मस्तक काट डालो— य पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः । यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च ॥ (८ । ४ । ८ । १६)
अब प्रश्न होता है कि वेदमे यदि मासका वाचक या पशुहिंसाका बोधक कोई शब्द ही प्रयुक्त न हुआ होता तो कोई भी कैसे उस तरहका अर्थ निकाल सकता था ? इसके उत्तरमें हम महाभारतसे एक प्रसङ्ग उद्धृत कर देना चाहते है। एक बार ऋषियों तथा दूसरे लोगोंमें 'अज' शब्दके अर्थ- पर विवाद हुआ। एक पक्ष कहता था 'अजेन यष्टव्यम्' का अर्थ है "अन्नसे यज्ञ करना चाहिये। अजका अर्थ है— उत्पत्तिरहित, अन्नका बीज ही अनादि-परम्परासे चला आ रहा है, अतः वही 'अज' का मुख्य अर्थ है, इसकी उत्पत्तिका समय किसीको ज्ञात नहीं है, अतः वही अज है।" दूसरा पक्ष अजका अर्थ बकरा करता था। पहला पक्ष ऋषियोंका था। दोनों राजा वसुके पास निर्णय करानेके लिये गये। वसु अनेक यज्ञ कर चुका था। उसके किसी भी यज्ञमे मासका उपयोग नहीं हुआ था। वह सदा अन्नमय यज्ञ ही करता था, परन्तु म्लेच्छोंके संसर्गसे पीछे चलकर वह ऋषियोंका द्वेषी बन गया था। ऋषि उसकी बदली हुई मनोवृत्तिसे परिचित न थे। वे विश्वास करके गये। राजा सहसा निर्णय न दे सका। उसने पूछा 'किसका क्या पक्ष है?' जब उसे मालूम हुआ कि ऋषिलोग 'अज'का अर्थ अन्न करते हैं, तो उसने उनके विरोधी पक्षका ही समर्थन करते हुए कहा 'छागेनाजेन यष्टव्यम्।' असुर तो यह चाहते ही थे। वे उसके प्रचारक बन गये; परन्तु ऋषियोंने उस मतको ग्रहण नहीं किया; क्योंकि वह पूर्वोक्त चारो हेतुओंसे असङ्गत ठहरता है।
संस्कृत-वाङ्मयमें अनेकार्थक शब्द बहुत हैं। 'शब्दाः कामधेनव' यह प्रसिद्ध है। उनसे अनन्त अर्थोंका दोहन होता है। परंतु कौन-सा अर्थ कहाँ लेना ठीक है, इसका निश्चय विवेकशील विद्वान् ही कर सकते हैं। कोई यात्रापर जा रहा हो और सवारीके लिये 'सैन्धव' लानेका आदेश दे तो, उस समय नमक लानेवाला मनुष्य मूर्ख समझा जाता है, वहाँ सिन्धुदेशीय अश्व ही लाना उचित होगा। इसी प्रकार भोजनमे सैन्धव डालनेका आदेश देनेपर नमक ही डाला जायगा, अश्व नहीं। इसी प्रकार वेदके यज्ञ-प्रकरणमे आये हुए शब्दका वहाँके सात्त्विक वातावरणके अनुरूप ही अर्थ ठीक हो सकता है। जहाँ दवा बनानेके लिये 'प्रस्थं कुमारिकामासम्' की आज्ञा है, वहाँ सेरभर घीकुआरका गूदा ही डाला जायगा। कुमारी-कन्याका एक सेर मास डालनेकी बात तो कोई पिशाच ही सोच सकता है।
यज्ञमें पशु बाँधनेकी बात आती है। प्रश्न होता है, वह