भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

जैन उपनिषदोंका सार ( रचयिता—श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी' ) आनन्द शान्तिमय हम, मंगल-स्वरूप पायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ध्रु०॥ कल्याणमय शरण है परमात्म-भाव अपना। जगका ममत्व सारा, समझा अनित्य सपना ॥ हम हैं सदा अकेले, क्यों मुग्ध मन बनायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ १ ॥ अपवित्र देहमें अब आसक्ति छोड़ देंगे। मिथ्यात्व अव्रतोंसे निज वृत्ति मोड़ देंगे ॥ सम्यक्त्व धर्म संयम तपमें हृदय रमायें। अविचल विमल सुपदमै अविलम्ब जा समायैं ॥ २ ॥ परदेश लोक सारा, निज देश सिद्धि-थल है। लोकाग्र स्थित हमारा प्यारा अनन्त थल है ॥ निर्ग्रन्थ गुरु मिले जब सत्पन्थ क्यों भुलायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ३ ॥ अर्हन्त देवका जब रूपस्थ ध्यान ध्याया। पद और पिंडको भी उस रूपमें मिलाया ॥ सब नाम रूप तज कर फिर लोकमें न आये। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ४ ॥ निश्चय अवाच्य ही है, व्यवहार सब कथन है। पर्याय दृष्टिसे ही, यह आगमन गमन है ॥ द्रव्यार्थ नय अपेक्षा हम मुक्त ही कहायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ५ ॥ जब तक स्वदेहमें हम, तब तक न ध्येय पूरा। आलस्य भावसे क्यों, कर्तव्य हो अधूरा ॥ पर तुच्छ वासनाका बन्धन नहीं लगायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ६ ॥ क्या सूर्य-चन्द्रने भी कुछ अंधकार जाना। अज्ञान तम हटाया, यह लोक शब्द माना ॥ निजमें अकर्म बनकर, भव कर्म भय मिटाये। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समायैं ॥ ७ ॥ आनन्द शान्तिमय हम, मंगल-स्वरूप पायें। अविचल विमल सुपदमैं अविलम्ब जा समाये ॥