कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ ६२९ इसके बाद उनको भी छोड़कर, अथवा उन भव्य वासनाओं- को व्यवहारमें रखते हुए भी भीतरसे शान्त अर्थात् सब प्रकारकी वासनाओंसे मुक्त रहकर सबके प्रति समान स्नेह रखते हुए एकमात्र चित्स्वरूपमें अपनी वासना लगाओ । 'मारुति ! फिर उस चिद्वासनाको भी मन और बुद्धिके साथ परित्याग करके अन्ततोगत्वा तुम मुझमे पूर्णतया समाहित हो जाओ । जो शब्दरहित, स्पर्श्वरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित है, जो कभी विकारको नहीं प्राप्त होता, जिसका न कोई नाम है और न कोई गोत्र है तथा जो सब प्रकारके दुःखोंको हरनेवाला है—पवनतनय ! इस प्रकारके मेरे स्वरूपका तुम भजन करो ॥ ६५-७० ॥ "हनूमान् ! जो साक्षिस्वरूप है, आकाशके समान अनन्त है, जिसे एक बार जान लेनेपर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता, जो अजन्मा, एक—अद्वितीय, निर्लेप, सर्वव्यापी एवं सर्वश्रेष्ठ है; जो अकार-उकार-मंकाररूप तीन कलाओंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कलाओंसे विमुक्त अद्वय-तत्त्व है, वह ओंङ्काररूप अक्षर—अविनाशी ब्रह्म मैं ही हूँ। मैं द्रष्टा हूँ, शुद्धस्वरूप हूँ, कभी विकारको प्राप्त नहीं होता और मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, जो मेरा विषय बने । अर्थात् मेरा द्रष्टापन भी कहनेके लिये ही है। मै आगे-पीछे, ऊपर-नीचे— सर्वत्र परिपूर्ण हूँ। मे भूमा हूँ, मुझमें किसी प्रकारकी कमी नहीं है। हे हनूमान् ! तुम मेरे इस स्वरूपका चिन्तन करो । मैं अज हूँ, अमर हूँ, अजर हूँ, अमृत हूँ, स्वयंप्रकाश हूँ, सर्वव्यापी हूँ, अव्यय—अविनाशी हूँ, मेरा कोई कारण नहीं—मैं स्वयम्भू हूँ, समस्त कार्य-कलापसे परे मैं शुद्धस्वरूप हूँ, नित्यतृप्त हूँ—इस प्रकार तुम चिन्तन करो। इस प्रकार चिन्तन करते-करते जब कालवश शरीरपात होगा, तब वायुके स्पन्दनके समान तुम जीवन्मुक्त पदका भी परित्याग करके निर्वाण मुक्ति—विदेह-मुक्तिकी अवस्थामें पहुँच जाओगे । यही बात ऋचामे भी कही गयी है— 'जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परमव्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परमधामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामें सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परमपद कहते हैं। वह परमपद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है ।' जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है । यह महा-उपनिषद् है" ॥ ७१-७६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ ॥ शुक्लयजुर्वेदीय मुक्तिकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मन ही बन्ध-मोक्षका कारण है मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ॥ ( ब्रह्मविन्दु० २ । ३ ) मनुष्योंके बन्ध और मोक्षमें मन ही कारण है, विषयासक्त मन बन्धनके लिये है और निर्विषय मन ही मुक्त माना जाता है ।