भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 832 में से

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पृष्ठ 674

ॐ द्वितीय अध्याय जीवन्मुक्ति एवं विदेहमुक्तिका स्वरूप, उनके होनेमें प्रमाण, उनकी सिद्धिका उपाय तथा प्रयोजन तत्पश्चात् श्रीहनुमान्जीने श्रीरामजीसे पूछा- 'भगवन् ! जीवन्मुक्ति क्या है, विदेह-मुक्ति क्या है और इनके होनेमें प्रमाण क्या है ? तथा उनकी सिद्धि कैसे होती है और उस सिद्धिका प्रयोजन क्या है ?' ॥ १ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा-'हनुमान् ! जीवको 'मे भोक्ता हूँ, मे कर्ता हूँ, मे सुखी हूँ और मे दुखी हूँ' - इत्यादि जो ज्ञान होता है, वह चित्तका धर्म है। यही ज्ञान क्लेशरूप होनेके कारण उसके लिये बन्धनका कारण हो जाता है। इस प्रकार- के ज्ञानका निरोध ही जीवन्मुक्ति है। घटरूप उपाधिसे मुक्त घटाकाशकी भाँति प्रारब्धरूप उपाधिके नष्ट होनेपर यह जीव विदेहमुक्त हो जाता है। जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिके होनेमे अक्षोत्तरशत-उपनिषद् ही प्रमाण हैं। कर्तापन और भोक्तापन आदि दु खोंकी निवृत्तिके द्वारा नित्यानन्दकी प्राप्ति ही इनका प्रयोजन है। वह आनन्द प्राप्ति पुरुषके प्रयत्नसे-पुरुषार्थसे सिद्ध होती है। जैसे पुत्रेष्टि यज्ञके द्वारा पुत्रकी, वाणिज्य- व्यापारके द्वारा धनकी एव ज्योतिष्टोम यज्ञके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषके प्रयत्नमे होनेवाले वेदान्त- के श्रवण मनन और निदिध्यासनसे उत्पन्न हुई समाधिसे जीवन्मुक्ति आदिकी सिद्धि होती है और वह सारी वासनाओं- के नाश होनेपर प्राप्त होती है ॥ २ ॥ "पुरुषका प्रयत्न या पुरुषार्थ दो प्रकारका होता है- शास्त्रविरुद्ध और शास्त्रानुकूल । उनमे शास्त्रविरुद्ध पुरुषार्थ अनर्थका कारण होता है और शास्त्रानुकूल पुरुषार्थ परमार्थ- को सिद्ध करनेवाला होता है। लोक वासना, शास्त्र-वासना तथा देह वासनाके कारण प्राणीको यथार्थज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती । अर्थात् ये तीन प्रकारकी वासनाएँ ही ज्ञानकी प्राप्तिमें बाधक हैं। वासनाएँ पुनः दो प्रकारकी होती हैं- शुभ और अशुभ । शुभ वासनाओंके द्वारा, हनूमान् ! यदि तुम ज्ञानका अनुशीलन करते हो तो क्रमशः उसके द्वारा मेरे पदको प्राप्त करोगे, और यदि अशुभ भावोंसे युक्त रहते हो तो वे तुम्हे महान् सकटमें डाल देंगे । कपीश्वर ! पूर्वके सस्कारोंको तुम्हें यत्नपूर्वक जीतना चाहिये । शुभाशुभ मार्गोसे बहती हुई वासनारूपी नदीको अपने पुरुषार्थके द्वारा शुभ- मार्गमें लगाना चाहिये । अशुभ मागोंमें जाते हुए वासना- प्रवाहको शुभ मागोंमें उतारना चाहिये, क्योंकि मनका यह स्वभाव है कि अशुभसे हटानेपर वह शुभकी ओर जाता है और शुभसे हटाये जानेपर अशुभमें प्रवृत्त होता है। मनुष्यको चाहिये कि पुरुषार्थके द्वारा यत्नपूर्वक चित्तरूपी बालकको फुसलाकर - थपथपाकर शुभमे ही लगाये। अभ्यास- के द्वारा जब तुम्हारी दोनो प्रकारकी वासनाएँ जल्दी ही क्षीण होने लगे, तब शत्रुओका मर्दन करनेवाले हनूमान् ! तुम जान लेना कि अभ्यास परिपक्वताको प्राप्त हो गया। पवनकुमार ! जहाँ वासनाके अस्तित्त्वका संदेह भी हो, वहाँ शुभ वासनाओं- में ही बारवार चित्तको लगाये । शुभ वासनाओंकी वृद्धि होनेपर कभी दोष नही उत्पन्न हो सकता ॥ ३-१० ॥ "महामति हनूमान् ! वासनाक्षय, विज्ञान और मनोनाश- इन तीनोंका एक साथ चिरकालतक अभ्यास करनेपर ये फल प्रदान करते ह। जबतक इन तीनोंका बारवार एक साथ अभ्यास न किया जाय, तबतक सैकड़ो वर्ष बीतनेपर भी कैवल्य पदकी प्राप्ति नहीं होती। यदि अलग-अलग इनका चिरकालतक भी खूब अभ्यास किया जाय तो, जिस प्रकार टुकड़े टुकड़े करके जपे हुए मन्त्र सिद्ध नहीं होते, उसी प्रकार इनमे सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होती। यदि इन तीनोका चिरकालतक अभ्यास किया जाय तो हृदयकी दृढ ग्रन्थियाँ भी निःसन्देह उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे कमलकी नालको तोड़नेपर उसके रेशे टूट जाते है। जिस दृढती ससार-वासनाका सैकड़ों जन्मोंसे अभ्यास हो रहा है, वह चिरकालतक साधना किये बिना कदापि क्षीण नहीं होती । इसलिये, प्यारे हनूमान् ! पुरुषार्थके द्वारा प्रयत्न करते हुए विवेकपूर्वक भोगकी इच्छाओंको दूरसे ही नमस्कार करके इन तीनोका सम्यक्रूपसे अवलम्बन करो ॥ ११-१६ ॥ "वासनासे युक्त मनको ज्ञानियोंने बद्ध बतलाया है और जो मन वासनासे सम्यक्रूतया मुक्त हो गया है, वह मुक्त कहलाता है । महाकपि ! मनको वासनाविहीन स्थितिमें शीघ्र ले आओ। भलीभाँति विचार करनेसे और सत्यके अभ्याससे वासनाओंका नाश हो जाता है। वासनाओके नाशसे चित्त उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जैसे तेलके समाप्त हो जानेपर दीपक बुझ जाता है। वासनाओंका भलीभाँति त्याग