कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 683, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३५
ठहरें; जीव हिंसासे बचनेके लिये केवल वर्षाकालमें भ्रमण न करे। "इस विषयमें दूसरे श्लोक भी हैं, जिनका भाव इस प्रकार है—'सन्यासीको चाहिये कि वह कुण्डिका, चमस तथा शिक्य (झोली) आदिको, तथा तिपाई, जूते, शीतको दूर करनेवाली कन्था (कथरी), कौपीनके ऊपर अङ्ग ढकनेवाला वस्त्र, कुशका बना पवित्र, स्नानके अनन्तर धारण करनेका वस्त्र तथा उत्तरीय वस्त्र, यज्ञोपवीत एव वेदाध्ययन—सबका त्याग कर दे। वह अपना स्नान, पान तथा शौच पवित्र जलके द्वारा सम्पादन करे। नदीके किनारे जाकर सोये या देवमन्दिरमें सोये। अत्यधिक आराम न करे अथवा आयासके द्वारा शरीरको व्यर्थ कष्ट न दे, दूसरोंके द्वारा अपनी स्तुति सुनकर प्रसन्न न हो और निन्दा सुनकर गाली या शाप न दे। सन्यासी प्रमादरहित होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक जीवन बिताये। स्त्रियोंका दर्शन, स्पर्श, केलि—क्रीडा, चर्चा, गुह्य (कामसम्बन्धी) विषयोंकी बातचीत, काम-सङ्कल्प, सम्भोगके लिये प्रयत्न तथा सम्भोगकी क्रिया— ये आठ प्रकारके मैथुन विचारवान् पुरुषों ने गिनाये हैं। उपर्युक्त अष्टविध मैथुनके त्यागरूप ब्रह्मचर्यका पालन मुमुक्षुजनोंको करना चाहिये ॥ १—६ ॥ "जो जगत्का प्रकाशक है, नित्य प्रकाशके रूपमें अपनेद्वारा ही प्रकाशित है, वही जगत्का साक्षी है, निर्मल आकृति- वाला सबका आत्मा है। वह प्रज्ञानघनरूप है, सब प्राणी उसीमें प्रतिष्ठित हैं। मनुष्य न कर्मके द्वारा, न सन्तानके द्वारा और न अन्य किसी साधनके द्वारा—बल्कि ब्रह्मानुभवके द्वारा ही ब्रह्मको प्राप्त कर सकता है। वह सत्य-ज्ञान-आनन्द- रूप अद्वितीय ब्रह्म इस माया, अज्ञान, गुहा आदि नामोंसे कहे जानेवाले संसारमें व्याप्त है तथा केवल विद्याके द्वारा जाना जाता है। जो परम व्योम नामक नित्य धाममे विराजमान इस ब्रह्मको जानता है, वह द्विजश्रेष्ठ क्रमशः सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है—पूर्णकाम हो जाता है। अज्ञान और मायाशक्तिके साक्षी प्रत्यगात्माको जो 'मै एक ब्रह्मस्वरूप हूँ' यों जानता है, वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है ॥ ७-१२ ॥ "पूर्वोक्त शक्तियुक्त इस ब्रह्मस्वरूप आत्मासे उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द-तन्मात्र उत्पन्न हुआ, जैसे रज्जुमें सर्पका भान होता है। पुनः आकाशसे वायुसञ्ज्ञक अपञ्ची- कृत स्पर्श-तन्मात्र उत्पन्न हुआ। वायुसे अग्नि, अग्निसेज ल और जलसे पृथिवी उत्पन्न हुई। उन सूक्ष्म भूतोंको शिवरूप ईश्वरने ८ पञ्चीकृत करके उन्हींसे ब्रह्माण्ड आदिकी सृष्टि की। ब्रह्माण्ड- के भीतर प्राणियोंके पुराकृत कर्मोंके अनुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियोंकी सृष्टि हुई तथा अस्थि, स्नायु आदिसे निर्मित यह प्राणियोंका शरीर भी कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। समस्त शरीरधारियोंका यह जो अन्नमय आत्मा—स्थूल शरीर प्रकाशित हो रहा है, उससे भिन्न एक प्राणमय आत्मा और है, जो इस अन्नमय आत्माके भीतर स्थित है। उससे भी सूक्ष्म दूसरा विज्ञानमय आत्मा है, जो प्राणमय आत्माके भी भीतर स्थित है। उससे भी सूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्माके भी भीतर है। अन्नमय आत्मा प्राणमयमे भरा है, उसी प्रकार प्राणमय आत्मा स्वभावतः मनोमय आत्मासे पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञान- मयसे पूर्ण है। सदा सुखरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दसे पूर्ण रहता है। उसी प्रकार आनन्दमय आत्मा अपनेसे भिन्न साक्षिरूप सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी ब्रह्मके द्वारा पूर्ण है। वह ब्रह्म किसी दूसरेके द्वारा नहीं, बल्कि स्वतः सब ओरसे पूर्ण है। जो यह सत्य एव ज्ञानस्वरूप अद्वितीय ब्रह्म है, वही सबका पुच्छ— आधार है। वह सबका सार एव रसमय (आनन्दस्वरूप) है। उस सनातन तत्त्वको प्राप्तकर यह देही सर्वत्र सुखी होता है। इसके सिवा अन्यत्र सुखता कहाँ है? अखिल प्राणियोंके आत्मस्वरूप इस परानन्द ब्रह्मके न होनेपर कौन मानव जीता रह सकता है अथवा कौन प्राणी नित्य चेष्टा करता है? अतएव सर्वान्तर्यामीरूपसे जो चित्तमे भासित होता है, वही परमपुरुष दुःखोंसे घिरे हुए जीवात्माको सदा आनन्द प्रदान करता है ॥ १३-२५ ॥ "जो अदृश्यत्व आदि लक्षणोंसे युक्त इस परतत्त्वसे अभेद- रूप परमाद्वैतको प्राप्त कर लेता है, वही महासन्यासी है। सद्रूप परब्रह्म जो देश-काल-वस्तुसे अपरिच्छिन्न है, वही अभयपद है, परम कल्याणस्वरूप है, परम अमृत है। जबतक मनुष्यको इससे थोड़ा भी अन्तर—व्यवधान दीख पड़ता है, तबतक उसे (जन्म मृत्युका) भय है—इसमे सदेह नहीं। भगवान् विष्णुसे लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृणपर्यन्त सभी तारतम्यके अनुसार नित्य इसी आनन्दकोषसे आनन्द प्राप्त करते हैं। इस लोक तथा परलोकके भोगोंसे विरक्त, प्रसन्न चित्तवाले श्रोत्रियको यह स्वरूपभूत आनन्द स्वय ही अनुभूत होता है—उसी प्रकार जैसे स्वयं परमात्माके अन्दर होता है। शब्दकी प्रवृत्ति किसी निमित्तको लेकर होती है। परतत्त्वमें निमित्तका अभाव होनेसे वाणी वहाँसे लौट आती