कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 17
- औपनिषद्-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा उसके जाननेका फल * ३ सब भूतोंमें छिपे हुए हैं शिव—कल्याणगुणोंसे युक्त, जान उन्हीं प्रभुको होता नर सब भवके बन्धनसे मुक्त ॥ ( ५ ) एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ये ही देव विश्वकर्मा हैं परमात्मा सबके स्वामी, सब मनुजोंके सदा हृदयमें बसे हुए अन्तर्यामी । हृदय, बुद्धि, मनसे चिन्तन हो, तब इनका हो साक्षात्कार, इस रहस्यको जान गये जो जन्म-मृत्युसे होते पार ॥ ( ६ ) तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ता- द्विद्दाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ इन्द्र आदि लोकेश्वर जिनको परम महेश्वर जान रहे, अन्य देवगण भी जिनको निज परम देव हैं मान रहे। पतियोंके भी पूज्य परम पति जगदीश्वर जो स्तुत्य महान्, उन प्रकाशमय परमदेवको समझा हमने सर्वप्रधान ॥ ( ७ ) न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ देह और इन्द्रियसे उनका है सम्बन्ध नहीं कोई, अधिक कहाँ, उनके सम भी तो दीख रहा न कहीं कोई । ज्ञानरूप, बलरूप, क्रियामय, उनकी परा शक्ति भारी, विविध रूपमे सुनी गयी है, स्वाभाविक उनमें सारी ॥ ( ८ ) न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥