भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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औपनिषद-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा उसके जाननेका फल ( १ ) यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ योनि-योनि—कारण-कारणके जो हैं एक अधिष्ठाता, जिनमें सब विलीन होता जग, जिनसे यह उद्भव पाता । वे आराध्य वरद ईश्वर हैं, वे ही देव—अलौकिक कान्ति, उन्हें तत्त्वसे जान यहाँ मानव पाता है शाश्वत शान्ति ॥ ( २ ) सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥ परम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, हृदयकी गहन गुफामें छिप जाने, अति महान् वे, घेर विश्वको एकमात्र ही छवि पाते । वे ही एक जगत्-स्रष्टा हैं, विविध रूपमें वे आते, जान उन्हीं मङ्गलमय प्रभुको शान्ति सनातन नर पाते ॥ ( ३ ) स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥ वे ही स्थितिके समय भुवनके संरक्षक, जगके स्वामी, सब भूतोंमे छिपे हुए हैं, वे ही बन अन्तर्यामी । उनका ही ब्रह्मर्षि, देवगण एक चित्त हो करते ध्यान, जान उन्हें यों मनुज मृत्युके तोड़ डालता पाश महान ॥ ( ४ ) घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ माखनमें स्थित सारभाग-से परम सूक्ष्म जो अतिशय सार, एकमात्र सब ओर व्याप्त जो घेरे हुए सकल संसार ।