कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ कल्याण वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डलधारिणे ॥ वल्लवीनयनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नमः ॥ वर्ष २३ } गोरखपुर, सौर माघ २००५, जनवरी १९४९ { संख्या १ पूर्ण संख्या २६६ शरणागति यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ (श्वेताश्वतर० ६। १८) जिन परमेश्वरने ब्रह्माको सर्वप्रथम उत्पन्न किया । जिनने उनको अमित ज्ञानका आकर अपना वेद दिया ॥ आत्मबुद्धिके विमल प्रकाशक अखिल विश्वमे रहे विराज । मैं मुमुक्षु उन परम देवकी शरण ग्रहण करता हूँ आज ॥ उ० सं० १—