भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 18

५ ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ वे ही पति, इस जगमें कोई उनका अधिपति शेष नहीं, शासक भी न, कहींपर उनका कोई चिह्न-विशेष नहीं। वे ही एक परम कारण हैं, इन्द्रिय-देवोंके अधिनाय, जनक न उनका, अधिप न कोई, उनसे ही सब विश्व सनाथ॥ (९) एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥ सब भूतोंमें छिपे हुए वे एक देव हैं परमात्मा, सबमे व्यापक, सब जीवोंके वे अन्तर्यामी आत्मा। कर्मोंके अधिपति, फलदाता, सबके ही आश्रय-आवास, साक्षी हैं, केवल, निर्गुण हैं, चेतन हैं—चैतन्य-प्रकाश॥ (१०) एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ जो असंख्य निष्क्रिय जीवोंके शासक और नियन्ता एक, एकमात्र इस प्रकृति बीजको देते हैं जो रूप अनेक। उन प्रभुको निज हृदयस्थित जो सदा देखते धीर प्रवीन, उन्हें सनातन सुख मिलता है, नहीं उन्हें जो साधनहीन॥ (११) नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥* चेतन परम चेतनोंमें, नित्योंमें भी जो नित्य महान्, करते एक अनेक जीवके कर्मफलोंका भोग-विधान। वे सबके कारण हैं, होता सांख्ययोगसे उनका ज्ञान, पाता मोक्ष सभी बन्धनसे नर उन परमदेवको जान॥

  • ये सभी मन्त्र श्वेताश्वतर-उपनिषद्के हैं, इनमें पहले मन्त्रकी संख्या ४।१९, दूसरेसे पाचवें- तककी ४।१४ से ४।१७, छठेसे आठवेंतककी ६।७ से ६।९ और नवेंसे ग्यारहवेंतककी मन्त्रसंख्या ६।११ से ६।१३ है।