भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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उपनिषद्

( पूज्य-श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्ज्योतिर्पीठाधीश्वर स्वामी श्रीब्रह्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ) [बायाँ स्तम्भ] धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्दधीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा ब्रह्मविद्याको कहते हैं । वेदका अन्तिम भाग होनेसे इसे वेदान्त भी कहा जाता है और वेदान्तसम्बन्धी श्रुति-सङ्ग्रह-ग्रन्थोंके लिये भी उपनिषच्छब्दका प्रयोग होता है । उपनिषद् वेदका ज्ञानकाण्ड है। यह चिरप्रदीप्त वह ज्ञानदीपक है जो सृष्टिके आदिसे प्रकाश देता चला आ रहा है और लयपर्यन्त पूर्ववत् प्रकाशित रहेगा । इसके प्रकाशमें वह अमरत्व है, जिसने सनातनधर्मके मूलका सिञ्चन किया है। यह जगत्कल्याणकारी भारतकी अपनी निधि है, जिसके सम्मुख विश्वका प्रत्येक स्वाभिमानी सभ्य राष्ट्र श्रद्धासे नतमस्तक रहा है और सदा रहेगा । अपौरुषेय वेदका अन्तिम अध्यायरूप यह उपनिषद्, ज्ञानका आदिस्रोत और विद्याका अक्षय्य भण्डार है । वेद-विद्याके चरम सिद्धान्त— ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ।’ ( त्रिपाद्विभूतिमहाना० ३ । ३ ) —का प्रतिपादन कर उपनिषद् जीवको अल्पज्ञानसे अनन्त ज्ञानकी ओर, अल्पसत्ता और सीमित सामर्थ्यसे अनन्त सत्ता और अनन्त शक्तिकी ओर, जगद्दुःखोंसे अनन्तानन्दकी ओर और जन्म-मृत्यु-बन्धनसे अनन्त स्वातन्त्र्यमय शाश्वती शान्ति- की ओर ले जाती है । उपनिषद् सद्गुरुओंसे प्राप्त करनेकी वस्तु है। वैसे तो अधिकारानधिकारपर विचार न करके स्वेच्छया ग्रन्थरूपमें उपनिषदोंका कोई भी अध्ययन कर सकता है, किंतु इस प्रकारसे किसीको ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति नहीं हो सकती । अनधिकारीके साधनसम्पत्तिहीन वासनावासित अन्तःकरणमे ब्रह्मविद्याका प्रकाश नहीं होता । जिस प्रकार मलिन वस्त्रपर रंग ठीक नहीं चढता और जिस प्रकार बंजर भूमिमे, जहाँ लंबी-लंबी जड़ोंवाली घास पहलेसे जमी हुई है, धान्यबीज अङ्कुरित नहीं होता और कुछ अङ्कुरित हो भी जाय तो वृद्धिंगत होकर फलित नहीं होता, उसी प्रकार अनधिकारीके वासनापूर्ण अन्तःकरणमें ब्रह्मविद्याका उपदेशबीज अङ्कुरित [दायाँ स्तम्भ] नही होता और यदि कुछ अङ्कुरित हो भी जाय तो उसमें आत्मनिष्ठारूपी वृद्धि और जीवन्मुक्तिरूपी फलकी प्राप्ति नहीं होती । इसीलिये शास्त्रोंमे सर्वत्र अधिकारीरूपी क्षेत्र- की सम्यक् परीक्षाका विधान है। श्रुतिका आदेश है— नापुत्राय दातव्यं नाशिष्याय दातव्यम् । सम्यक् परीक्ष्य दातव्यं मास षाण्मासवत्सरम् ॥ जिस प्रकार गुरुके लिये शिष्यकी परीक्षाका विधान है, उसी प्रकार शिष्यके लिये भी गुरुके लक्षणोका स्पष्ट निर्देश करते हुए उपनिषद्का उपदेश है— 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥' ( मुण्डक० १ । २ । १२ ) भगवद्गीता भी विधान करती है— तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन ॥ श्रोत्रिय अर्थात् वेदवेदार्थके ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ अपरोक्षज्ञानी तत्त्वदर्शी गुरुको प्रसन्न करके उनसे उपनिषद्का उपदेश श्रवण करनेका विधान है। श्रवणं तु गुरो. पूर्वं मननं तदनन्तरम् । निदिध्यासनमित्येतत्पूर्णबोधस्य कारणम् ॥ ( शुक्लरहस्य० ३ । १३ ) साधनचतुष्टयसम्पन्न जिज्ञासु श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके द्वारा उपनिषत्तत्त्वका उपदेश श्रवण कर तार्किक युक्तियोंद्वारा उसपर प्रगाढ मनन करते हुए गुरूपदिष्ट ध्यानादिके अभ्यास- द्वारा निदिध्यासनपूर्वक 'अह ब्रह्मास्मि' आदिका निरन्तर विचार करते हुए उसपर निष्ठाारूढ होकर सम्यक् तत्त्वज्ञान- विज्ञानस्वरूप परब्रह्मसत्तामे प्रवेश करके तद्रूप हो जाता है— 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'

  • उपनिषद्का यह उपदेश जीवके लिये परमसौभाग्यास्पद अमूल्य निर्णय है । उपनिषत्तत्त्वोपदेशके निष्कर्षमे जीव-ब्रह्मैक्यप्रतिपादन करते हुए पूर्वाचार्योंने संक्षेपमे कह दिया है— 'जीवो ब्रह्मैव नापर ' जीव ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे पृथक् नहीं है । उपनिषद्का उपदेश है—