भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' यह समस्त (भासमान द्वैतप्रपञ्च ) वास्तवमें ब्रह्म ही है। वही (ब्रह्म) तू है। यह उपनिषद्‌के तत्त्वज्ञानोपदेशका सारांश है। इसमें निष्ठा न होना ही अज्ञान है। जीव ब्रह्मसे अभिन्न होते हुए भी अविद्याके कारण अपने वास्तविक, अजन्मा, अविनाशी, शुद्ध बुद्ध मुक्त सच्चिदानन्दमय आत्मस्वरूपको विस्मृत कर अपनेको जन्म मरणधर्मा, कर्ता, भोक्ता, सुखदुःखवान् मान बैठा है और मिथ्या जगत्में सत्यबुद्धि करके स्वनिर्मित कर्मपाशमें स्वयं बँधकर जन्म मरण संसृतिमें फँसा हुआ अनन्त दुःख भोग रहा है। जीवके सकल दुःखोंके कारण- इस अविद्याकी निवृत्तिके लिये उपनिषदोंमें जीव-ब्रह्मकी एकताके प्रतिपादनके साथ साथ जगत्‌के मिथ्यात्वका उपदेश भी हुआ है, जिसे पूर्वाचार्योंने- 'ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या' -इन सरल शब्दोंमें स्पष्ट कर दिया है। ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है। जिस प्रकार मन्दान्धकारमें रज्जु ही सर्परूप दिखलायी देती है, उसी प्रकार अविद्यामे निर्गुण निराकार ब्रह्म सत्ता ही सगुण साकार जगद्रूप दिखलायी देती है। जिस प्रकार मन्दान्धकारके कारण वास्तविक रज्जु नहीं दिखलायी पड़ती, प्रत्युत वास्तविक सत्ताहीन सर्प ही प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार अविद्याके कारण वास्तविक (पारमार्थिक) सत्तामय ब्रह्म नहीं प्रतीत होता और वास्तविक सत्ताहीन व्यावहारिक जगत् ही प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। वस्तु एक ही है-जो रज्जु है, वही (भ्रमावस्थामे ) सर्परूप है। उसी प्रकार (ज्ञानावस्थामें ) जो ब्रह्म है वही ( भ्रमावस्था, अज्ञानकी अवस्थामें ) जगद्रूप है। जगत्‌की सत्य-प्रतीति और ब्रह्मकी अप्रतीति तबतक होती रहती है, जबतक अविद्यान्धकारकी निवृत्ति नहीं होती । विचाररूपी प्रकाशद्वारा अधिष्ठानका निश्चय होते ही स्पष्ट हो जाता है कि सर्वाधिष्ठान ब्रह्मसत्ता ही (पारमार्थिक) सत्य है और रज्जुमे आपन्न सर्पके समान ब्रह्ममे अध्यस्त जगत् मिथ्या है। इस प्रकार सद्‌गुरुओंगे दृष्टान्तादिके द्वारा औपनिषद- ज्ञान भलीप्रकार श्रवण कर जिज्ञासु उसपर मनन करते हुए वैराग्यादि साधन सम्पत्तिके सहयोगमे जगत्‌के मिथ्यात्वकी पुष्टि और निदिध्यासनादि अन्तरङ्ग साधनोके सहयोगसे जीवब्रह्मैक्यनिष्ठा-सम्पादनद्वारा स्वात्मानुभूतिमय ज्ञानदीपक प्रदीप्त कर अनादिकालीन अविद्यान्धकारकी निवृत्तिद्वारा निश्चय कर लेता है कि एकमात्र अद्वितीय स्वगत-सजातीय- विजातीय भेदशून्य त्रिकालाबाधित ब्रह्मसत्ता ही सत्य है। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी पारमार्थिक सत्य नहीं है । इस प्रकार दृढ बोधवान् ज्ञानीके लिये अन्य कुछ ज्ञातव्य एव प्राप्तव्य शेष नहीं रह जाता । कृतकृत्य होकर वह नित्य- बोधमय निजस्वरूपमे प्रतिष्ठित हो सच्चिदानन्दका सर्वत्र अनुभव करता हुआ जीवन्मुक्तिका परमानन्द लाभ कर ब्रह्मकी अद्वितीय चिन्मय सत्तामें प्रवेश कर जाता है । ऐसे ब्रह्म- स्वरूप विज्ञानीके लिये उपनिषद्‌का निश्चय है कि- 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति' 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ।' (बृहदा० ४ । ४ । ६) जीव-ब्रह्मैक्य-ज्ञान-निष्ठाकी यह चरम सीमा ही औपनिषद- ज्ञानकी पराकाष्ठा है। उपनिषत्तत्त्व, निर्गुण निराकार ब्रह्म अवाङ्मनसगोचर है । श्रुति उसके लिये कहती है- 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।' इसी अवाङ्मनसगोचर परमाद्वितीय निर्गुण परम तत्त्वका बोध करानेके लिये उपनिषच्छ्रुतियाँ- 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते--' -इत्यादिके द्वारा इस नानागुणधर्मवान् इन्द्रियग्राह्य (शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध आदिमय ) जगत्प्रपञ्चका ब्रह्ममें अध्यारोप करती हैं और फिर इन्हीं इन्द्रियग्राह्य ( एव इन्द्रियानुभवद्वारा परिचित ) गुणधर्मोंके निषेधरूपमें उस निर्गुण निर्व्यपदेश्य निर्विशेष ब्रह्म-सत्ताका परिचय कराती हैं । उदाहरणार्थ कठश्रुति उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस आदि कहकर उसका उपदेश करती है- 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् • • • •' इसी प्रकार माण्डूक्य श्रुति उसके सम्बन्धमे कहती है- 'नान्त प्रज्ञ न बहिःप्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञ न प्रज्ञानघन न प्रज्ञ नाप्रज्ञम् ।' 'अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म- प्रत्ययसार प्रपञ्चोपशम शान्त शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय ।' इसी प्रकार अन्यत्र भी उपनिषदोंमे निषेधरूपमें ही उस