कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- उपनिषद् * ७ [बायाँ स्तम्भ] निर्गुण निरञ्जनके सम्बन्धमे उपदेश हुआ है और अन्तमे श्रुति 'नेति-नेति' (यह नहीं, यह नहीं) कहकर उसके सम्बन्धमे समस्त उक्तियोंका खण्डन कर उसे सर्वथा निर्गुण निर्विशेष अवाङ्मनसगोचर प्रतिपादन करती है । इस प्रकार अध्यारोपके सहारे ब्रह्मका परिचय कराती हुई श्रुतियाँ अध्यारोपित समस्त जगत्की वास्तविक सत्ताके निरासार्थ ही बार-बार उपदेश करती हैं कि— 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति'—इत्यादि । इस प्रकार अध्यारोपित जगत्का सर्वथा अपवाद करती हुई श्रुतियाँ एक अद्वितीय अखण्ड ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन करती हैं। इससे यह स्पष्ट ही है कि उपनिषदोंमे यत्र तत्र जगत्की सृष्टि, स्थिति, लय आदि-सम्बन्धी जो द्वैतबोधक श्रुतियाँ पायी जाती हैं, उनका प्रयोजन द्वैतप्रपञ्चके प्रतिपादनमे नहीं है, किन्तु शुद्ध ब्रह्ममे जगत्का अध्यारोप करके उसके अपवादद्वारा एक अखण्ड अद्वितीय निर्गुण ब्रह्मसत्ताकी सिद्धि ही उनका लक्ष्य है। उपनिषद्के उपदेशक्रममे— 'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते ।' यही सिद्धान्त कार्यान्वित हुआ है । इसके अतिरिक्त तत्त्वोपदेशका और कोई प्रकार नहीं है कि जिसके द्वारा (परमार्थदृष्ट्या जीवके अपने ही एक अद्वितीय अखण्डस्वरूपमे अनादि कालसे चला आता हुआ यह ) जगद्भ्रम निवृत्त हो सके और जीव अपने वास्तविक अद्वितीय, अखण्डस्वरूपमे प्रतिष्ठित होकर शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सके । ज्ञानस्वरूप नित्यबोधमय निजरूप आत्मामे प्रतिष्ठित होकर शाश्वत शान्तिमय हो जाना ही जीवका परम पुरुषार्थ है । इस परम पुरुषार्थकी प्राप्ति औपनिषद-ज्ञाननिष्ठाद्वारा ही होती है । बिना तत्त्वनिष्ठ हुए कैवल्यकी प्राप्ति नहीं होती, यही उपनिषद्का सिद्धान्त है— 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।' उपनिषत्तत्त्वज्ञानकी महिमा वर्णन करते हुए मुण्डक- श्रुति कहती है— वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । [दायाँ स्तम्भ] ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ( ३ । २ । ६ ) इसी प्रकार कठ-श्रुतियाँ अपरोक्ष आत्मज्ञानके लिये ही शाश्वत सुख-शान्तिकी प्राप्तिका निर्देश करती हैं और अन्यके लिये उसका सर्वथा निषेध करती हुई कहती हैं— 'तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्' '...तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ।' इस प्रकार उपनिषद्का स्पष्ट उपदेश है कि यदि जीव स्थायी सुख शान्तिकी प्राप्ति करना चाहता है तो उसे आत्मानुभूतिके लिये प्रयत्नशील होना पड़ेगा, अध्यात्मकी ओर बढ़े बिना स्थायी सुख शान्तिकी प्राप्ति असम्भव है। इसीलिये सर्वकल्याणकारी वेद जीवको, कर्म, उपासना और ज्ञानके उपदेशद्वारा अध्यात्म पथपर आगे बढ़ाता है । जो जिस अवस्थामे है, उसे उसी अवस्थामे अध्यात्मकी ओर नियोजित करना ही वेदका लक्ष्य है । वेदके कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्डका चरम उद्देश्य है कि जीव अधिकारानुसार कर्मोपासनामे प्रवृत्त होकर अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा तत्त्व- ज्ञानका अधिकारी बने और परमात्मनिष्ठवान् होकर शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त करे । इस सर्वकल्याणकारी वैदिक उद्देश्यकी पूर्तिके लिये ही वेदमूलक वर्णाश्रम व्यवस्था है । वर्णाश्रम- व्यवस्थामे वैदिक सिद्धान्तोका सक्रिय व्यावहारिक रूप निष्पन्न हुआ है। जगतीतल्पर समाज व्यवस्थाका उज्ज्वल आदर्श- रूप भारतीय वर्णाश्रम धर्म-व्यवस्था, सामाजिक व्यवहारको उच्चतमताके उत्कृष्ट शिखरपर रखती हुई उस ही परमार्थका साधन बनाकर जीवको मतनावृतिके पथपर प्रतिष्ठित रखकर उसे पूर्णताकी ओर ले जाती है । वेदमूलक धर्मशास्त्र वर्णाश्रम- धमर्माका इस प्रकारसे विधान करता है कि जो जिस श्रेणीमे, जिस अवस्थामे, जहाँ है, वहीं अपना धर्म पालन करता हुआ स्वाभाविक रूपस अध्यात्मकी ओर बढता जाय । इसीलिये उपनिषन्मूलक भगवद्गीताका उपदेश है कि धर्मशास्त्रके अनुसार— 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ॥' ( १८ । ४५ ) और—