भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 22

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

य शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ ( १६ । २३-२४ )

इस प्रकार कर्मक्षेत्रमे, शास्त्रोक्त स्वधर्म-पालन ही समस्त वेदोक्त ज्ञानका सार और सर्वोन्नतिका मूल है । इसीलिये सामान्य धर्म, विशेष धर्म और आपद्धर्म आदिका स्पष्ट वर्णन करता हुआ वेदमूलक सनातन धर्मशास्त्र प्रत्येक जीवको व्यष्टि- रूपमें और समस्त विश्वको समष्टिरूपमें वेदका यह सनातन सन्देश दे रहा है कि यदि सुख शान्ति चाहते हो तो स्वधर्म-पालन करते हुए अध्यात्मपथपर आगे बढ़ो । भगवती श्रुति प्रत्येक जीवको प्रत्येक अवस्थामं अपने पवित्र अङ्कमे उठाकर अध्यात्ममें प्रतिष्ठित करनेको तत्पर है । भारतीयो ! जागो, श्रुति भगवती तुम्हे जगा रही है— 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।' पवित्र भूखण्ड भारतमे तुम्हारा जन्म हुआ है, अध्यात्म विद्या-ब्रह्मविद्या-तुम्हारे घरकी वस्तु हे, उसका समुचित लाभ उठाकर स्वय शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त करो और दुःख- पङ्कनिमग्न विश्वको सुख शान्तिका परसोज्ज्वल पथ प्रदर्शित करो, अन्यथा तुम्हारे हाथमे उपनिषद्की यह ज्ञानराशि कलङ्कित हो रही है।

उपनिषन्महत्ता ( रचयिता—विद्याभूषण, कविवर, श्रीॐकार मिश्र 'प्रणव', व्या० सा० योगाशास्त्री, सिद्धान्तशास्त्री )

उपनिषद्की साधना श्रुतिगान मङ्गल-माधुरी है ॥ शुचि सत्यताका स्रोत निर्मल मन्द मञ्जुल वह रहा है । कर पान अमृत ज्ञान अविरल, विश्व प्रमुदित हो रहा है ॥ परिपूर्ण पुण्य पवित्रताकी सक्तियाका फल कहा है । जो मौन मुनि-मण्डल महत्ताकी चमकत चातुरी है ॥ १ ॥ यह ध्यानियोंके ध्येय धृतिकी है धवल ध्रुव-धारणा । प्रिय पारदर्शी परम पुरुषोंकी अटल व्रत-पारणा ॥ 'वद केन रचित' प्रश्नकी उत्तरभरी सुख-सारणा । उस ईशके कैवल्य-गृहकी वीथि दुर्गम साँकुरी है ॥ २ ॥ इसकी अनेक विचारणामें एकताका रूप है । सिद्धान्त वैदिक 'तत्त्वमसि' का दर्शनीय अनूप है ॥ चितिचिन्तनाका लक्ष्य केवल जग-अचिन्त्य स्वरूप है । दुर्लभ्य परमानन्दको यह कर रही अति आतुरी है ॥ ३ ॥ सत्यं शिवं सौन्दर्यमय जो श्रेय-प्रेय चितान है । उद्गीथकी है गूँज गुरु-गम्भीर ब्रह्म विधान है ॥ ऋषि याज्ञवल्क्य, उपस्ति, वाजश्रवसके आख्यान है । नृप-अश्वपतिकी कीर्ति-स्वरमें बज रही वर बाँसुरी है ॥ ४ ॥ जिसकी महत्तापर कि दारा, मुग्ध शोपनहार है । मन मूल मानी मूलशंकर हो रहे बलिहार हैं ॥ प्रतिक्षण प्रशंसा में 'प्रणव' हृद्वीण-नादित तार है । वह मुक्ति-नभ-आरोहणाको जीव-खगकी पाँखुरी है ॥ ५ ॥