कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 832 में से
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उपनिषदोंका एक अर्थ है, एक परमार्थ है ( लेखक—श्रीकाञ्चीकामकोटिपीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्यजी महाराज )
प्राणियोंके बाह्य अर्थोंका प्रकाश करनेवाली तथा नाना प्रकारसे उपकार करनेवाली अनेक विद्याएँ हैं; परंतु परम पुरुषार्थको प्रकाशित करनेवाली, परमार्थको दिखलानेवाली तथा परम उपकारिणी विद्या उपनिषद् है। जिससे तत्त्व-जिज्ञासु पुरुषोंको परम शान्ति प्राप्त होती है, वह परमार्थ कहलाता है। क्लेशग्रस्त जीवोंके समस्त क्लेशोंका निवारण जिससे हो, वह परम उपकार कहलाता है। ‘तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।’ यह ईशावास्योपनिषद्वाक्य एकत्वके साक्षात्काररूपी उपनिषद्विद्यासे युक्त पुरुषके समूल शोकनाशको उद्घोषित करता है। ‘मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः।’ (गौड० आग० १७) तथा— ‘तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि।’ (छान्दोग्य० ६।८।७) —इत्यादि श्रुतियाँ उस उपनिषद्विद्याकी परमार्थताको घोषित करती हैं। फिर यह उपनिषद्विद्या क्लेशोंके पात्र सांसारिक प्राणियोंको हठात् प्राप्त होनेवाले क्लेशोंका उन्मूलन किस प्रकार करती है? इसका उत्तर श्वेताश्वतर उपनिषद् देती है— ‘ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः।’ (१।११) ‘परमात्मदेवको जानकर सारे बन्धन कट जाते हैं, क्लेशोंके क्षीण होनेपर जन्म और मृत्युसे छुटकारा मिल जाता है।’ दुःखोंके मूलका नाश हुए बिना दुःखोंका आत्यन्तिक नाश नहीं बनता। यद्यपि कर्म-उपासना आदि धर्म अथवा खेत- घर आदि विषय तत्काल प्राप्त होनेवाले कुछ-न-कुछ दुःखोंकी निवृत्ति तो करते हैं, तथापि जिससे दुःखकी पुनः उत्पत्ति न हो, इस प्रकारकी समस्त दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति तो त्रिविध दुःखोंके मूलकी निवृत्ति हुए बिना सम्भव नहीं। दुःखका मूल क्या है? विचारक लोग कहते हैं कि दुःखका मूल जन्म है। ‘न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति।’ (छान्दोग्य० ८।१२।१) ‘निश्चयपूर्वक जबतक यह शरीर बना हुआ है तबतक सुख और दुःखका निवारण नहीं हो सकता।’ इस प्रकार श्रुति मुख्यतः जन्मको ही दुःखका मूल कारण प्रतिपादन करती है। तब फिर जन्मका मूल कारण क्या है? वे ही तत्त्व- परीक्षक उत्तर देते हैं कि जन्मका मूल कर्म है। यदि मनुष्य कर्मसे विराम ले ले, तो उसके लिये अत्यन्त दुःख-निवृत्ति हस्तामलकवत् हो जाय। अतः मुमुक्षुजनोंको दूसरे उपायोंके अनुसरणमें संलग्न नहीं होना चाहिये, परंतु इसमें यह संदेह उठ सकता है कि पूर्वजन्मोंमें और इस जन्ममें अबतक किये जानेवाले कर्मोंका जो मूल है उसका नाश किये बिना कर्मविरामका सङ्कल्प केवल कथनमात्र ही रह जायगा। तब सामान्यतः कर्मका मूल क्या है? इसके उत्तरमें रागका नाम लिया जाता है। राग और उससे उपलक्षित द्वेष, भय आदिको भी दोष शब्दसे ग्रहण करते हैं। जिस किसी वस्तुमें जबतक राग या द्वेष होता है, तबतक उस वस्तुकी प्राप्ति या परित्यागके लिये प्रयत्नरूप कर्म करते हुए ही लोग देखे जाते हैं, जिस प्रकार जबतक भय रहता है, तबतक मनुष्य उस भयसे छुटकारा पानेके लिये प्रयत्न करता ही है। इस दोषका मूल क्या है? अपनेसे अतिरिक्त दूसरेका भान होना ही दोषका मूल है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं। जैसा कि बृहदारण्यक उपनिषद्का वाक्य है— ‘द्वितीयाद्वै भयं भवति।’ (१।४।२) ‘निश्चय ही दूसरेसे भय होता है।’ यदि दूसरी वस्तुका भान ही नहीं होगा तो कर्मके मूलभूत भय, द्वेष अथवा रागका कोई आधार न रह जानेके कारण भय आदिका प्रसङ्ग ही नहीं प्राप्त होगा। ‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्, तत्केन कं जिघ्रेत्, तत्केन कं शृणुयात्, तत्केन कं विजानीयात्।’ (२।४।१४) ‘जिस अवस्थामें इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता है, उस समय किसके द्वारा किसको देखे, किसके द्वारा किसको सूँघे, किसके द्वारा किसको सुने तथा किसके
उ० अं० २-३-