कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१० -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :-
[बायाँ स्तम्भ]
द्वारा किसको जाने'—यह बात भी वही (बृहदारण्यक) उपनिषद् कहती है। तत्र द्वैतके भानका हेतु क्या है ? तत्त्वपरीक्षक कहते है कि द्वैतभानका हेतु मिथ्या ज्ञान है और वह मिथ्या ज्ञान ही समस्त संसारका बीज है, ऐसा न्यायवेत्ता आचार्योने निश्चय किया है । इसका निवारण एकत्वदर्शनरूपी औपनिषद ज्ञानके द्वारा ही होता है, इसलिये यह उपनिषद्-विद्या प्राणियोंका परम उपकार करती है। ज्ञान ही अज्ञानका विरोधी है । द्वितीय वस्तुकी प्रतीतिमें कारणभूत अज्ञानको दूर करनेवाला एकत्वसाक्षात्काररूप ज्ञान ही है । मनोनिग्रह और भगवदुपासना आदि अन्य सारे ही शास्त्रप्रसिद्ध साधन एकत्वसाक्षात्कारकी उत्पत्तिमें ही प्रयोजक होनेके कारण पहली सीढ़ीमें आते हैं। 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ।' —इस श्रुतिवाक्यमें जिसकी जिज्ञासा की गयी है; वह उपनिषद् वर्णित ब्रह्मतत्त्व— 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म।' (छान्दोग्य० ३ । १४ । १) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्।' (तैत्तिरीय० ३ । ६ । १) तथा— 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।' (बृहदारण्यक० ३ । ९ । २८) —इत्यादि श्रुतियोंद्वारा बारवार गाया जानेवाला परम आनन्दघन ही है, अतः यह प्राणियोंके लिये परम पुरुषार्थ- स्वरूप है। इसका ज्ञान करानेवाली उपनिषद् भी प्राणियोंके लिये सहस्रों माता-पिताओंकी अपेक्षा भी परम प्रिय है, अतएव परम उपकार करनेवाली है। सहस्रों माता पिताकी अपेक्षा भी मनुष्यका परम हित चाहनेवाली उपनिषद् विद्या स्वयं ही औपनिषद ब्रह्मतत्त्वकी नित्यता एव यथार्थतामें इस प्रकार उपपत्ति (युक्ति) प्रदर्शित करती है। कारणसे कार्यमें जो भेद जान पड़ता है, वह केवल नाम और रूपको लेकर ही है। 'घट' यह नाम- भेद है और 'मोटी पेंदी एव पेटवाला' यह आकारभेद है। यही नाम और रूप श्रुतियोंमें भिन्न-भिन्न स्थलोंपर त्याग देने योग्य बताये गये हैं—सर्वत्र इनको त्यागनेके लिये ही सूचित किया गया है। 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म।' (छान्दोग्य० ८ । १४ । १) 'निश्चयपूर्वक आकाश ही नाम और रूपका निर्वाह
[दायाँ स्तम्भ]
करनेवाला अर्थात् उनका आधार है, वे दोनो जिसके भीतर है, वह ब्रह्म है।' 'नामरूपे व्याकरवाणि।' (छान्दोग्य० ६ । ३ । २) 'मै नामरूपको विशेषरूपसे व्यक्त करूँ।' तथा— सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते। 'बुद्धि-प्रेरक परमेश्वर सब रूपोंकी रचना करके उनके नाम रखकर उन नामोंके द्वारा स्वय ही व्यवहार करता हुआ स्थित है।' मृत्तिका ही घट है, कारण ही कार्य है। नाम भेद अथवा आकार-भेद केवल काल्पनिक है । अतएव श्रुति कहती है— 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।' (छान्दोग्य० ६ । १ । ४) 'विकार (कार्य) वाणीका विलासमात्र है, वह नाम मात्र- के लिये है। वास्तवमे वह घटरूप विकार नहीं, केवल मृत्तिका ही है—ऐसा मानना ही सत्य है।' 'मृत्तिकेत्येव' इस पदमें 'एव' शब्दसे समस्त विकारोंका मिथ्यात्व तथा कारणका सत्यत्व स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार कारण-परम्पराका विचार करते करते सबका परम कारण ब्रह्म ही है, यह निश्चित होता है । एकमात्र ब्रह्म ही बिना किसी उपचारके परमार्थ सत्य है तथा ब्रह्मके अतिरिक्त समस्त पदार्थ मिथ्या एव कल्पित है। यह बात श्रुतिके द्वारा तात्पर्यनिर्णय करनेवाली युक्तियोंके प्रदर्शनपूर्वक स्पष्टरूपसे कह दी गयी है। परमार्थका ज्ञान और पुरुषार्थका अनुभव करानेके कारण हमपर उपनिषदोंका परम उपकार सिद्ध होता है। सारी विद्याओके ज्ञाता देवर्षि नारदजी भी जन्मजात महासिद्ध योगी सनत्कुमारके पास ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके लिये गये—इस छान्दोग्योपनिषद्की आख्यायिकासे तथा— 'स ब्रह्मविद्या सर्वविद्याप्रतिष्ठाम् ।' —इस मुण्डकोपनिषद्के वाक्यसे भी यह सिद्ध होता है कि परमार्थरूप परम पुरुषार्थका अनुभव करानेके कारण उपनिषद्- विद्या परम उपकारिणी है। बादरायण मुनि श्रीव्यासजीने ब्रह्मसूत्रमें कहा है— 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ।' पूर्वजन्मके शास्त्राभ्याससे स्वतः प्राप्त हुई ज्ञान- दृष्टिसे भी उपदेश करना सम्भव है, जैसे वामदेव मुनिने