भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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[उपनिषदोंका एक अर्थ है, एक परमार्थ है] ३१


उपदेश किया था । शास्त्रदृष्टिका अर्थ है 'तत्त्वमसि' 'सोऽहमस्मि' आदि महावाक्योंसे उत्पन्न अखण्ड परा बुद्धि । वेदोंके पूर्व भागमे अर्थात् कर्मकाण्डमें ज्ञानसे भिन्न कर्ममात्रका वर्णन है । वे समस्त कर्म क्रियामात्र हैं, उन्हें 'दृष्टि' नहीं कह सकते । सब प्रकारकी उपासनाएँ भी क्रियामात्र ही हैं, 'दृष्टि' नहीं। कर्मकाण्डोक्त क्रियाओंसे ध्यानादि उपासनाओमें इतना ही अन्तर है कि वे मानसिक क्रियाएँ है, इन्हें श्रेष्ठ महात्मा पुरुषोंने दृष्टान्तपूर्वक सिद्ध किया है। वे क्रियाएँ की जा सकती हैं, अन्यथा की जा सकती हैं, और नहीं भी की जा सकती हैं । उनका अनुष्ठान विकल्पयुक्त है, परतु दृष्टि वस्तुके अधीन होती है, अतएव उसमें विकल्प सम्भव नहीं है । उपर्युक्त ब्रह्मसूत्रमें शास्त्रदृष्टिके दृष्टन्तरूपमें वामदेवका नाम आया है । यजुर्वेदीय उपनिषद् ( बृहदारण्यक० १ । ४ । १० ) में वामदेवको ऐसी दृष्टि प्राप्त होनेका वर्णन मिलता है, जो उनके लिये सूर्य और मनुके साथ अपना अत्यन्त अभेद सूचित करनेवाली थी । जिस प्रकार देह-देहीका सम्बन्ध होता है, तदनुसार यह दृष्टि नहीं उत्पन्न होती । वामदेव मुनि सूर्य और मनुके शरीर हैं, ऐसा मानना यहाँ अभिप्रेत नहीं है और न यही अभीष्ट है कि वामदेवके ही ये दोनों शरीर थे । शास्त्ररूप उपनिषद्के यथार्थ ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली जो परमार्थदृष्टि है, वह सबमें आत्मदर्शनको लेकर है, यही मानना अभीष्ट है । उस दृष्टिके अनुसार सबका आत्मरूपमें ही बोध होता है । वामदेवके सर्वात्मा होनेपर ही उनकी मनु और सूर्यसे अभिन्नता होनी सम्भव है । 'शास्त्रदृष्ट्या तु' कहनेसे लोकदृष्टिका बाध हो जाता है । देह और देही ( आत्मा ) में अभेद-प्रतीतकी रीतिसे जो कहीं-कहीं ब्रह्म और आत्मामे विशिष्ट-अद्वैतभावका उल्लेख किया जाता है, उस प्रकारके अभेदरूप अर्थका भान तो लोकदृष्टिसे ही सम्भव होता है । इस विषयमें यह दृष्टान्त दिया जाता है— 'जैसे मै मोटा हूँ, मै श्याम हूँ' इत्यादि । ऐसे स्थलोंमें शरीरमें ही आत्मदृष्टि होनेके कारण देहात्मवादका भ्रम होता है, जो सर्वथा हेय है, यह बन्धनका ही हेतु है । यह बात लोकदृष्टिसे भी सिद्ध ही बतायी गयी है । देह-देहीमें अभिन्नताका बोध त्याज्य है, क्योंकि यह मोक्षके लिये उपयोगी नहीं है । शास्त्र शब्दका मुख्य अर्थ साक्षात् उपनिषद् ही है, ऐसा उक्त ब्रह्मसूत्रसे अभिव्यक्त होता है । उससे भिन्न जो शास्त्र है, वह तत्त्व-साक्षात्कार करानेमें समर्थ नहीं है । जिस प्रकार 'अह वै त्वमस्मि' ( मैं ही तुम हो ) यह महावाक्य है, उसी प्रकार 'त्व वा अहमस्मि' यह भी है । ऐसी ही 'भगवो देवता' इत्यादि श्रुति भी है । यह श्रुति परस्पर व्यतिहारसे अर्थात् आत्माके स्थानपर ब्रह्मको और ब्रह्मके स्थानपर आत्माको रखनेसे दोनोंकी एकता सिद्ध करती हुई उनमें देह-देहि-सम्बन्धकी कल्पनाका विरोध करती है, क्योंकि उस देह-देहि-सम्बन्धकी कल्पना करनेपर तो अवश्य ही ईश्वर भी शरीररूप माना जायगा तथा जीवात्मा भी उस ईश्वरमय शरीरका शरीरी ( आत्मा ) माना जाने लगेगा । इस तरहकी अनेकों असङ्गत आपत्तियाँ उठ खड़ी होंगी ।

यदि कहें, तब तो कर्ममार्गकी कोई उपयोगिता नही है, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि जैसे मनुष्य पहले असत्य मार्गपर खड़ा होकर ही सत्यको प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है, उसी प्रकार पहले कर्ममार्गपर चलनेवाला साधक कर्मद्वारा अन्तःशुद्धिका सम्पादन करके फिर सत्यस्वरूप ज्ञानका आश्रय ले उपनिषद्-गति ( वेदान्तवेद्य ब्रह्म ) को प्राप्त कर लेता है । सारी श्रुतियोंका एक ही तात्पर्य है, यह बात कठोपनिषद्मे यमराजके मुखसे कहलायी है । यथा—

'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि, ओमित्येतत् ।'

'सम्पूर्ण वेद जिस पदका बारम्बार प्रतिपादन करते हैं उस पदको संक्षेपसे तुम्हें बतलाता हूँ । वह ओम् है'—इस वाक्यद्वारा समस्त श्रुतियोंकी एकार्थताका स्पष्टतः प्रतिपादन किया गया है । माण्डूक्योपनिषद्का उद्देश्य एकमात्र ॐकारके अर्थका विवेचन करना ही है । उसमें अ, उ और म—इन तीन मात्राओंके विवेचनके बाद जो चतुर्थ पादका वर्णन आया है, उसका वास्तविक अर्थ इस प्रकार बताया गया है— 'वह ब्रह्म परम शान्त, परम कल्याणमय तथा अद्वैत ( भेदशून्य ) है । वही आत्मा है ।' क्योंकि वह आत्मा सैकड़ों उपनिषदोंके द्वारा भी एक रूपसे ही जानने योग्य है । जो ब्रह्मको जानता है वह निश्चय ब्रह्म ही हो जाता है ।

सारे वेदोंका एक ही तात्पर्य है, जैसा कि 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' इस कठोपनिषद्की श्रुतिसे सिद्ध होता है । कहाँतक कहा जाय, श्रुतिके शीर्ष-स्थानमें अवस्थित समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य एक तत्त्वमें ही है । यदि पूछो, वह तात्पर्य कहाँ है ? तो इसका उत्तर यह है कि 'प्रणवमे ही है'—यही भाव कठोपनिषद्का वाक्य भी व्यक्त करता है । जैसे—

'तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि, ओमित्येतत् ।'