भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

१२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * और उस प्रणवका तात्पर्य किसमें है ? अद्वैत शिव-तत्त्वमे । —इस वाक्यद्वारा वृहदारण्यक उपनिषद्मे जिसके लिये क्योंकि एकमात्र प्रणवके अर्थका ही निरूपण करनेवाली प्रस्ताव किया गया है, माण्डूक्योपनिषद् प्रणवके चतुर्थ पादके अर्थका उपसहार करती 'वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषम् ।' हुई कहती है— —इस श्लोकद्वारा महाकवि कालिदासने जिसका अनुवाद 'शान्त शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय ।' किया है, 'जो शान्त, शिव, अद्वैत ब्रह्म है, उसीको ज्ञानीजन 'स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम उमा हैमवती तां प्रणवस्वरूप परमात्माका चतुर्थ पाद मानते हैं। वह आत्मा है, होवाच किमेतद् यक्षमिति । सा ब्रह्मेति होवाच ।' और वही जानने योग्य है।' इस केनोपनिषद्के प्रसङ्गमे जिसका 'ब्रह्म' के नामसे इसलिये— उपदेश किया गया है तथा उपर्युक्त माण्डूक्योपनिषद्में 'तं त्वा औपनिषदं पुरुष पृच्छामि ।' जिसका चतुर्थ पादके रूपमें उपसहार किया गया है, उस परम कल्याणमय अद्वैत ब्रह्ममें ही सम्पूर्ण उपनिषदो का परम तात्पर्य है। ज्योति-पुंज वह पाया मैंने ( रचयिता—श्रीभागवतप्रसादसिंहजी ) रक्त, मांस, हड्डीसे निर्मित काया जिसको दुलराया था, समझ रहा था जिसको अपना जीवन तक आश्रय पाया था। था मेरा संसार मनोरम, लघुतम थे जब जीवनके क्षण, कण-कणको चूमा था मैने, उलझा था कुन्तलमे यौवन । कितने बार चला छुप-छुपकर, जब थी तितली रानी मेरी. नेह लगाया निर्मम मिट्टीसे जब थी नादानी मेरी। आज खुलीं आँखें, पाता हूँ दिग-दिगन्तमें अन्धकार घन, समझ सका हूँ आज, नहीं कुछ भी अपना, वे थे स्वप्निल क्षण । दूर हुआ ज्यों ही, भूला वह, जिसको मैने प्यार किया था. उसे देखता नहीं कहीं अब, जिसपर सब कुछ वार दिया था। आज दूर मैं उस मिट्टीसे एकाकी पथपर जाता हूँ, शून्य मार्ग, आधार नहीं कुछ, कहीं न आदि-अन्त पाता हूँ। मेरे पद-तलमें आलोकित हैं ये सारे रवि, शशि, उड्डुगण, दूर व्योमकी किरण-डोरसे सभी बँधे पाते हैं जीवन । डोर पकड़ ली मैने भी वह, अपना मार्ग बनाया मैने, खोज रहा था जिसे तिमिरमे, ज्योति-पुंज वह पाया मैने। १ आपसे उस उपनिषत्प्रतिपाद्य परम पुरुषके विषयमें प्रश्न करता हूँ । २ वेदान्तों ( उपनिषदों ) में जिन्हें एकमात्र अद्वितीय 'पुरुष' कहा गया है। ३ वे इन्द्र उसी आकाशमें, जहाँ यक्ष अन्तर्धान हुआ था, एक स्त्रीके पास जा पहुँचे । वह स्त्री साक्षात् हिमवान्-कुमारी उमा थीं, उनसे इन्द्रने पूछा—'वह यक्ष कौन था ?' उन्होंने कहा—'वे परब्रह्म हैं।'