भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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उपनिषदोंकी श्रेष्ठता (श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीद्वारकाशारदापीठाधीश्वर अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य स्वामी श्रीअभिनव सच्चिदानन्दतीर्थजी महाराज) [स्तम्भ १] धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार प्रकारके पुरुषार्थोंमें परम निःश्रेयसरूप मोक्ष ही मनुष्यका अन्तिम लक्ष्य है—यह सबके द्वारा सुनिश्चित सिद्धान्त है। चौरासी लाख योनियोंमे बारम्बार जन्म-मरणकी प्राप्तिरूप घोर संसारसे पार होनेके लिये मनुष्यको परम शान्तिस्वरूप मोक्षकी प्राप्तिके निमित्त सतत प्रयत्न करना चाहिये। मोक्ष अमृतरूप है। उसकी प्राप्तिके लिये मानव-जन्म स्वर्ण-सुयोग है, क्योंकि मनुष्यके सिवा और किसी प्राणीको उस योनिमें रहते हुए कैवल्य-मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती। इसीलिये शास्त्रोमे मानव-जन्मको अत्यन्त दुर्लभ बताया गया है— ‘जन्तूना नरजन्म दुर्लभमतरम्’ - —इत्यादि। अत प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह अपने जन्मके प्रधानतम लक्ष्य मोक्षकी सिद्धिके लिये दिन रात प्रयत्न करे। यदि वह ऐसा यत्न नहीं करता, विषय-भोगोंमें फँसकर राग-द्वेषके वशीभूत हो उन विषयभोगोंकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता रहता है तो निश्चय ही उसे दो पैरोंका पशु कहना चाहिये। लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्। यस्त्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधी स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात्॥ ‘यदि किसी प्रकार (पुण्यविशेषसे) परम दुर्लभ मानव- जन्म पाकर उसमें भी सम्पूर्ण श्रुतियोंका आद्योपान्त अनुशीलन करनेवाले पुरुष-शरीरको पा लेनेपर भी जो मूढचित्त मानव अपनी मुक्तिके लिये प्रयत्न नहीं करता, वह आत्महत्यरा है। वह अनित्य भोगोंमें फँसे रहनेके कारण अपने-आपको विनाशके गर्तमें गिरा रहा है।’ —इत्यादि वचनोंके अनुसार मनुष्य अज्ञानके द्वारा अपनी हत्या ही करता है। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले प्रत्येक पुरुषका कर्तव्य है कि वह क्षणमात्र सुख देनेवाले अनित्य सांसारिक विषय-भोगमें न फँसकर आध्यात्मिक साधनमें संलग्न हो सदा आत्मतत्त्वके बोधके लिये ही प्रयत्न- शील बना रहे। ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य.’ [स्तम्भ २] —इस श्रुतिके द्वारा आत्मज्ञानके लिये श्रवण, मनन और निदिध्यासन—ये तीन साधन बताये गये हैं। पहले— परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृत कृतेन। तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्॥ ‘कर्मतः प्राप्त हुए लोकोंकी परीक्षा करके (अर्थात् उनकी अनित्यताको भलीभाँति समझकर) ब्राह्मण उनसे विरक्त हो जाय, क्योंकि कृत (अनित्य कर्म) से अकृत (नित्य आत्म- तत्त्व) की प्राप्ति नहीं हो सकती। वह आत्मज्ञानके लिये हाथमें समिधा लेकर ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रिय गुरुकी ही शरणमें जाय।’ —इत्यादि शास्त्रवचनोंके अनुसार ब्रह्मनिष्ठ गुरुकी शरण लेकर और उनके समीप रहकर वेदोक्त आत्मतत्त्वका, जो दम्भ- अहङ्कार आदि विकारोंसे रहित है, श्रवण करे। वेदके चार भाग बताये जाते हैं—सहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् । सहिता आदि भागोंमें कर्म, उपासना आदि मार्गोंका उल्लेख हुआ है। उपनिषद्में केवल ज्ञानका ही प्रतिपादन है। अतएव उपनिषद्-विद्या अन्य विद्याओंकी अपेक्षा प्रधानतम एव गौरवमयी है। इसी विद्याको लक्ष्य करके कहा जाता है कि ‘सा विद्या या विमुक्तये’ (वही वास्तविक विद्या है, जो मोक्ष दिलानेमें सहायक हो)। अध्यात्मविद्या विद्यानाम् । (गीता १०। ३२) भगवान् कहते हैं—‘मैं विद्याओंमें अध्यात्मविद्या हूँ।’ अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते। (मुण्डक०) ‘परा विद्या वह है, जिससे उस अविनाशी ब्रह्मका ज्ञान होता है।’ इत्यादि सब श्रुतियोंद्वारा इसीको ‘मोक्ष- दायिनी विद्या’ ‘अध्यात्मविद्या’ तथा ‘परा विद्या’ आदि नाम दिये गये हैं तथा यही विद्या सब अनर्थोंके मूलभूत ससारकी निवृत्ति करती हुई परमानन्दरूप मोक्षकी प्राप्तिका मुख्य कारण बतायी गयी है। इसीलिये इसे सबसे श्रेष्ठ कहा गया है।