कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * दार्शनिक विद्वान् 'उपनिषद्' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतलाते हैं—'उप + नि' इन दो उपसर्गोंके साथ 'सद्' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय करनेपर 'उपनिषद्' इस रूपकी सिद्धि होती है। सद् धातुके तीन अर्थ हैं—विशरण (विनाश), गति (ज्ञान और प्राप्ति) तथा अवसादन (शिथिल करना)। इन अर्थोंके अनुसार— उपनिषादयति सर्वानर्थकरसंसारं विनाशयति, संसार- कारणभूतामविद्यां च शिथिलयति, ब्रह्म च गमयति इति उपनिषद्। 'जो समस्त अनर्थोंको उत्पन्न करनेवाले संसारका नाश करती, संसारकी कारणभूत अविद्या- को शिथिल करती तथा ब्रह्मकी प्राप्ति कराती है, वह उपनिषद् है।' इस प्रकार ब्रह्मविद्याको ही 'उपनिषद्' नामसे कहा गया है तथा इसका यह 'उपनिषद्' नाम सर्वथा सार्थक है। 'उपनिषद्' का दूसरा नाम 'वेदान्त' भी है। यह वेदके अन्तमें है, इसलिये वेदान्त है अथवा वेदका सिद्धान्त—चरम तात्पर्य उपनिषद्में ही वर्णित हुआ है, इस कारण इसे 'वेदान्त' नाम दिया गया है। रहस्यके अर्थमें भी 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग हुआ है। जैसे 'इत्युपनिषत्' (तै०) अर्थात् यह उपनिषद् है—परम रहस्यभूत आत्मतत्त्वका बोध करानेवाली विद्या है। यह आत्मतत्त्व अन्य सब रहस्योंसे अधिक रहस्य- भूत है, क्योंकि यह हमारे भीतर अत्यन्त निकट है। तथापि मनुष्य मायासे मोहित होनेके कारण इसे नहीं जान पाता। इसके सिवा इस आत्मतत्त्वरूपी रहस्यका ज्ञान हो जानेपर संसारमें दूसरी कोई वस्तु जानने योग्य शेष नहीं रह जाती। जैसा कि श्वेताश्वतर-उपनिषद्में कहा है— 'एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थ नात परं वेदितव्य हि किञ्चित् ।' छान्दोग्यमें भी कहा है—एक आत्माको भलीभाँति जान लेनेपर यहाँ सब कुछ ज्ञात हो जाता है।* ऐसा ही अन्य श्रुतियाँ भी कहती हैं। चारों वेदोंकी प्रत्येक शाखासे सम्बन्ध रखनेवाली एक-एक उपनिषद् है। वेद स्वयं अनन्त हैं, अतः उनकी शाखाएँ भी अनन्त ही होंगी। शाखाओंकी अनन्तताके कारण उपनिषदोंकी भी अनन्तता ही सिद्ध होती है। वेदोंकी अनेक शाखाएँ इस समय विलुप्त हैं तथा उनसे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत सी उपनिषदें भी आज उपलब्ध नहीं हैं। इस समय एक सौ आठ उपनिषदें प्रकाशित हैं *। उनमें ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक—ये दस उपनिषदें ही गम्भीरतर अर्थका प्रतिपादन करनेवाली हैं तथा इन्हींको सब आचार्योंने ब्रह्म- विद्याके लिये प्रमाणभूत माना है। इन दसोंमें माण्डूक्य उपनिषद् सबसे छोटी और बृहदारण्यकोपनिषद् सबसे बड़ी है। सभी उपनिषदें सरल और रोचक हैं तथा सभी प्रायः अध्यात्म तत्त्वका ही बोध कराती हैं। बृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद्में यद्यपि कुछ अन्य उपासनाओंका भी उल्लेख है, तथापि ब्रह्म और आत्माके एकत्वका बोध ही प्रधान रूपसे उनका भी विषय है। सबसे अधिक रहस्यभूत आत्मतत्त्वका बोध करानेके कारण ही उपनिषदोंका स्थान सब शास्त्रोंमें अधिक ऊँचा है। उपनिषदोंमें प्रतिपादित ज्ञान ही सबसे उत्कृष्ट है। उपनिषदोंमें जिस तत्त्व-ज्ञानका विवेचन हुआ है, उससे आगे एक पग भी अबतक कोई तत्त्वज्ञानी नहीं बढ़ सका है। ऐसी उपनिषदोंके अपार ज्ञानकी निधिसे परिपूर्ण होनेके कारण ही 'यह भारतवर्ष आज सब देशोंमें परम श्रेष्ठ है' इस बातको निष्पक्ष बुद्धि रखनेवाले पाश्चात्त्य विद्वान् भी पूर्णतः स्वीकार करते हैं। इस समय संसारमे भौतिकवाद ओर नास्तिकताके भाव बढ़ गये हैं। इससे शान्तिका कहीं दर्शन नहीं होता। यदि वर्तमान समयमे तथा आगे भी जगत्मे पूर्णरूपसे वास्तविक शान्ति अपेक्षित है तो उसके लिये उपनिषदोंकी ही शरण लेनी चाहिये। उनमें बताये हुए साधनोंको ही अपनाना उचित है। जबतक उपनिषदोंके श्रवण, मनन और निदिध्यासन होते थे, तबतक देशमें सर्वत्र सुख-शान्तिमयी संपदा सुशोभित होती थी। जबसे भारतवर्ष उपनिषदोंके उपदेशपर ध्यान न देकर पाश्चात्त्य राष्ट्रोंकी भाँति भौतिकवाद और नास्तिकताका अन्धानुकरण करनेमे तत्पर हुआ, तभीसे यहाँ दरिद्रता, राग द्वेष आदि दोष, अशान्ति तथा दु समय कोलाहल बढ़ने लगे हैं। यदि अब भी भारतके मनुष्य समझसे काम लेकर अपने पूर्वज महर्षियोंके बताये हुए मार्गका आश्रय लें और उपनिषदोंकी शरण ग्रहण करें तो निश्चय ही सब प्रकारकी उन्नति और परम शान्ति उन्हें प्राप्त हो सकती है। उपनिषदोंमें ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकार बताया गया है—
- एकस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति ।
- अडियारसे लगभग १७९ उपनिषदोंका प्रकाशन अबतक हो चुका है—सम्पादक