कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ उपनिषदोंकी श्रेष्ठता ❊ १५ 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' (तैत्तिरीय०) 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व।' (तैत्तिरीय० ३।१।१) 'ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप एवं अनन्त हैं।' 'जिनसे ये सम्पूर्ण प्राणी जन्म लेते, जन्म लेकर जिनसे जीवन धारण करते तथा प्रलयके समय जिनमें पूर्णतः प्रवेश कर जाते हैं, वे ब्रह्म हैं, उनको जाननेकी इच्छा करो।' 'यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्। नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं ᠂ परिपश्यन्ति धीराः॥' (मुण्डक० १।१।६) 'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि॥' (केन० १।५) 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणत- श्चोत्तरेण।' (मुण्डक० २।२।११) 'जिसका नेत्रोंद्वारा दर्शन तथा हाथोंद्वारा ग्रहण नहीं हो सकता, जिसमें कोई रूप-रंग नहीं है, जो आँख-कान और हाथ-पैर आदिसे रहित है, उस नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म एव अविनाशी ब्रह्मतत्त्वको धीर पुरुष ही सब ओर देखते हैं।' 'जिसका मनके द्वारा मनन नहीं होता, जिसकी शक्तिसे ही मन मनन-व्यापारमें समर्थ होता है, उसी- को तुम ब्रह्म जानो।' 'यह सब कुछ अमृतमय ब्रह्म ही है। आगे ब्रह्म है, पीछे ब्रह्म है तथा दायें और बायें भी ब्रह्म है।' उपनिषदोंमें जीव और ब्रह्मका सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है— यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाक्षराद् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति॥ (मुण्डक० २।१।१) 'सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि' (छान्दोग्य०) 'जैसे जलती हुई आगसे उसीके समान रूपवाली सहस्रों चिनगारियाँ निकलती रहती हैं, उसी प्रकार हे सोम्य! अविनाशी ब्रह्मसे नाना प्रकारके भाव (जीव) उत्पन्न होते और उन्हींमें लीन होते हैं।' 'हे सोम्य! ये सारी प्रजा 'सत्' रूपी कारणसे ही उत्पन्न हुई हैं, 'सत्' में ही निवास करती हैं और अन्तमें भी 'सत्' में ही प्रतिष्ठित होती हैं।' 'यह सब कुछ ब्रह्मरूप ही है। वह ब्रह्म ही सत्य है, वही आत्मा है। वह ब्रह्म तू है।' जीव और जगत्के सम्बन्धको लेकर उपनिषदोंका कथन इस प्रकार है—'जैसे मकड़ी अपने स्वरूपसे ही जालेको बनाती और पुनः उसे निगल लेती है, जैसे पृथ्वीसे अन्न आदि ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, जैसे जीवित पुरुषसे ही केश लोम आदि उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अक्षर-ब्रह्मसे यहाँ सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है।' (मुण्डक०) 'यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म ही है।' (मुण्डक०) 'यह सब कुछ एतदात्मक (ब्रह्मस्वरूप) है।' (छान्दोग्य०) उपनिषदोंमें 'अक्षि' ब्रह्म और 'आकाश' ब्रह्मकी उपासना आदि साधनोंका भी वर्णन हुआ है। आत्मतत्त्वका सुगमतापूर्वक बोध हो, इसके लिये परम सुन्दर, बोधसुलभ आख्यायिकाओं और दृष्टान्तोंका उल्लेख किया गया है। इस प्रकार सर्वाङ्ग-परिपूर्ण, सर्वसुलभ और सबके लिये हितकर इन उपनिषदोंका आश्रय लेना सबका कर्तव्य है। उपनिषदों- के अर्थका निर्णय करनेके लिये महर्षि बादरायण (व्यास) ने ब्रह्मसूत्रोंका निर्माण किया है तथा श्रीशङ्कर भगवत्पाद आचार्यने इन उपनिषदोंपर भाष्य लिखे हैं। इन्हीं उपनिषदों- के सारभूत अर्थका भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको गीतामें उपदेश दिया है। उपनिषदोंका अभिप्राय सब लोग सुगमता- पूर्वक समझ सकें—इसीके लिये पुराण-इतिहास आदि ग्रन्थोंका प्राकट्य हुआ है। 'उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, गीता—ये वेदान्त-दर्शनके तीन प्रस्थान हैं। इन्हें प्रस्थानत्रयी कहते हैं। इनमें उपनिषद् श्रवणात्मक, ब्रह्मसूत्र मननात्मक और गीता निदिध्यास- नात्मक है। उपनिषदोंमें मुख्यतः आत्मज्ञानका निरूपण होनेपर भी द्विजके लिये उनमे जिन कर्त्तव्योका उपदेश दिया गया है, वे निश्चय ही सबके लिये परम हितकर हैं। तैत्तिरीय उपनिषद्- में उनका बहुत सुन्दर रूपसे वर्णन हुआ है। इस लेखके अन्तमे उन उपदेशोंका स्मरण कराया जाता है— वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर आचार्य अपने शिष्यको उपदेश देते हैं—१. सत्य बोलो। २. धर्मका आचरण करो। ३ स्वाध्यायसे कभी न चूको। ४ आचार्यके लिये